History of Lahore Fort: जब आप सिखो का इतिहास उठा कर देखेंगे.. और सिखों के दसवे गुरु की जीवनगाधा कहने वाले दशम ग्रंथ का बचित्र नाटक वाला हिस्सा पढेंगे तो पायेंगे कि लाहौर जिसे इस्लामिक शासको का गढ़ कहा गया वो असल में श्रीराम के बेटे लव द्वारा बसाया गया था। लेकिन कभी सिखों के लिए उनकी शान रहा लाहौर 15 अगस्त 1947 में बंटवारे के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। भले ही वहां सिख और हिंदू धरोहरो को संभाल कर न रखा गया हो लेकिन वहां एक किला ऐसा है जिसे काफी अहमियत दी जाती है, जो मुगलो के लाहौर में स्थापित होने की कहानी कहता है तो वहीं सिखों के लाहौर विजय की कहानी का सबूत है। ये सबूत है लाहौर का ऐतिहासिक किला.. अपने इस लेख में हम पाकिस्तान पंजाब के लाहौर किला के गौरवपूर्ण इतिहास के बारे मे जानेंगे.. साथ ही क्यों है ये किला हर सिख के लिए इतना खास.. क्या है सिखों के इसका रिश्ता।
लाहौर के किले का इतिहास
लाहौर किला इस वक्त न केवल पाकिस्तान की शान है, बल्कि इतना इतिहास कई सदियों पुराना है। अलग अलग इतिहासकार अलग अलग समय में इस किले के निर्माण और उसके ध्वस्त होने की कहानी बताते है। इस वक्त आप जिस किले को देख सकते है वो असल में मुगल शहंशाह मोहम्मद जलालुद्दिन अकबर ने करवाया था। इतिहास के हिसाब से अकबर कभी दिल्ली नहीं गया था बल्कि उसने आगरा में अपनी राजधानी बनाई थी, और विदेशी हमलावरो से भारत को सुरक्षित करने के लिए उसने भारत के प्रवेश द्वारा लाहौर में एक भव्य किले का निर्माण करवाया था, जहां मुगलो की बेहद क्रूर और ताकतवर सेना को नियुक्त किया गया, ताकि वो बाहरी ताकतो से भारतीय सीमा को सुरक्षित कर सकें। बाद में ये स्मारक बन गया, मौजूदा समय में भव्य किले के अंदर 21 बड़े स्मारक मौजूद है। ये किला मुगलो की भव्यता और वास्तुकला का प्रतीक भी माना जाता है।
लेकिन लाहौर में ये किला पहला किला नहीं है, इससे पहले भी यहां कई किले बनाये गए थे, जिसमें सबसे पहले 11वी सदी में महमूद गजनी ने किला बनवाया था, जिसे मिट्टी से जोड़ कर बनाया गया था, लेकिन 1241 ई॰ में क्रूर शासक चंगेज खान की सेना ने उसकी मौत के करीब 14 साल बाद भी लाहौर के बाहरी हिस्से पर हमला कर दिया था, और जैसी की उनकी नीति थी, वो केवल लूट पाट ही नहीं करते थे, पूरा शहर तबाह कर देते थे, उन लोगो ने लाहौर में लूटपाट की और किले पर कब्जा कर लिया और बुरी तोड़ फोड़ की गई.. हालांकि समय के साथ ये खंडहर बनता उससे पहले दिल्ली सल्तनत के तुर्किक मामलुक वंश के सुल्तान गियासुद्दीन बलबन जिसने 1266 से लेकर 1287 तक राज किया था, उसने लाहौर के किले को 1267 में फिर से बनावाना शुरू किया था।
तब से लाहौर का किला भारक के रक्षक के रूप में कार्य करता रहा था, लेकिन 1398 ईसवी में क्रूर शासक तैमूर लंग ने सिँधु नदी पार की और सबसे पहले उसकी सेना ने लाहौर के किले को ही तबाह किया.. ताकि सेना के लिए कोई अवरोध न हो। तैमूर लंग ने भारत में भारी तबाही मचाई थी। लेकिन एंट्री हुई बाबार की.. 1526 में मुगल सम्राट बाबर ने लाहौर पर कब्जा कर लिया, और इस तरह के ध्वस्त किला मुगलो के अधीन चला था। लेकिन 7 जुलाई 1799 को महाराजा रणजीत सिंह ने भंगी मिसल के तीनो सरदारों को हरा कर लाहौर किले पर कब्जा किया और 12 अप्रैल 1801 में लाहौर के किले में ही उनका भव्य राज्यभिषेक हुआ था। इतना ही नहीं महाराजा रणजीत का देहांत 27 जून 1839 को लाहौर के किले में ही हुआ था.. जो सबूत है कि कई दशको तक लाहौर किला सिखों का बहादुरी का भी प्रतीक रहा है।
किले की खास बातें
ये किला केवल स्मारक स्थल ही नही बल्कि इतिहास को समेटे अनगिनत साक्ष्य है। करीब 49 एकड़ में फैले इस किले में ख़िलवत ख़ाना, शाहजहाँ का चतुर्भुज, माई जिंदन हवेली, मोती मस्जिद, जहाँगीर का चतुर्भुज जैसे कई भव्य स्थान मौजूद है। आज यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल लाहौर का किला मुगलो के बाद सिख सम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह का प्राशासनिक राजधानी बना। दो खंडो में बंटा लाहौर किला प्रशासनिक खंड और निजी और छुपा आवासीय खंड कहलाता है, जिसमें पहले खंड में उद्यान और दीवान-ए-खास है जो आम लोगो को देखने के लिए खुला रहता है। दूसरे खंड में जाने के लिए हाथी गेट का इस्तेमाल किया जाता है और यहां शीश महल, विशाल बेडरूम और छोटे बगीचे मौजूद है, जहां सबको जाने की इजाजत नहीं है।
फेयरी पैलेस जिसे लाहौर किला का भूलभुलैया कहा जाता
यहां मौजूद धरोहर मुगलो के साथ सिखों के किले में शासन करने के सबूत है। बाहरी दीवारों को फ़ारसी काशी की टाइलों से सजाया गया है तो वहीं मैन गेट पर मरियम ज़मानी मस्जिद है । किले के अंदर शाहजहां का 1633 में बनावाया गया नौलखा मंडप है, यहां मौजूद पिक्चर वॉल” सबसे शानदान कलाओं में से एक मानी जाती है। जिसे मुगल सम्राट जहाँगीर ने बनवाया था। वहीं फेयरी पैलेस जिसे लाहौर किला का भूलभुलैया कहा जाता है, वहीं एक साथ बहने वाली 42 झरनों की खूबसूरत प्रणाली भी देखने को मिलेगी.. जो पैलेस की सुंदरता में चार चांद लगा देते है।
पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों
पर्यटन की दृष्टि से काफी अहम माना जाने वाला लाहौर किला 1981 में युनेस्को की लिस्ट में आने का बाद ज्यादा प्रसिद्ध हुआ। लाहौर का किला सही मायने में हमारे साहस भले इतिहास की कहानी कहता है, लेकिन हैरानी की बात है कि इतनी सारी खुबियों के बाद भी उसे वो पहचान नहीं मिली.. जो मिलनी चाहिए थी। जिसका कारण कहीं न कहीं पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों में शामिल होना है। केवल इस्लामिक नहीं बल्कि सिख इतिहास की इस धरोहर को लोगों से दूर कर रहा है।





























