Jaswant Singh Khalra: “मुझे बचाओ… प्लीज थोड़ा पानी दे दो…” ये शब्द आज भी पंजाब के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गूंजते हैं। कहा जाता है कि पानी की आखिरी गुहार लगाने वाले इस शख्स को पानी नहीं, बल्कि गोलियां मिलीं। यह कहानी है मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की, जिन्होंने 1980 और 90 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी एनकाउंटर, लापता लोगों और गुपचुप किए गए अंतिम संस्कारों के गंभीर आरोपों को दस्तावेजों के साथ सामने लाकर पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया था। अब उनकी जिंदगी और संघर्ष पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम ‘पंजाब 95’) ओटीटी पर रिलीज हो चुकी है, जिसने एक बार फिर उस दौर के अनसुलझे सवालों और दर्दनाक यादों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
जब पंजाब हिंसा की आग में जल रहा था| Jaswant Singh Khalra
1980 और 1990 का दशक पंजाब के इतिहास के सबसे कठिन दौरों में गिना जाता है। उस समय खालिस्तानी उग्रवाद अपने चरम पर था। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे देश का माहौल बदल दिया। इसके बाद हुए सिख विरोधी दंगों ने हालात को और अधिक भयावह बना दिया।
BIBI PARAMJIT KAUR KHALRA JI 🙏🏽🙏🏽 https://t.co/jsiygVNf7u
— DILJIT DOSANJH (@diljitdosanjh) July 4, 2026
इसी दौरान पंजाब पुलिस पर गंभीर आरोप लगने लगे कि कई मामलों में लोगों को बिना पर्याप्त सबूत के आतंकवादी बताकर फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया गया। यही वह पृष्ठभूमि है, जिस पर फिल्म ‘सतलुज’ की कहानी आधारित है और जिसमें जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष को दिखाया गया है।
25 हजार लापता लोगों का दावा और ‘लावारिस’ शवों का सवाल
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में हजारों लोगों के कथित रूप से लापता होने का मुद्दा उठाया। उनका दावा था कि इस अवधि में करीब 25 हजार सिख रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हुए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लगभग 2,000 लोगों के शवों को पुलिस ने ‘लावारिस’ घोषित कर गुपचुप तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया या फिर नदियों में बहा दिया।
दिवंगत राजनीतिक कार्यकर्ता राम कुमार नारायण ने भी ऑस्ट्रेलियाई डॉक्यूमेंट्री ‘India Who Killed The Sikhs’ में दावा किया था कि उस समय कई युवाओं को घरों से उठाकर झूठे मामलों में फंसाया जाता था और परिवारों से रिहाई के बदले भारी रकम मांगी जाती थी।
एक बैंक अधिकारी की मौत से खुला बड़ा राज
इस पूरे मामले ने नया मोड़ तब लिया जब 1992 में अमृतसर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के डायरेक्टर पियारा सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार किया। बाद में उनके कथित एनकाउंटर में मारे जाने और अमृतसर के दुर्गियाना मंदिर श्मशान घाट में बिना परिवार को सूचना दिए अंतिम संस्कार किए जाने की जानकारी सामने आई। जसवंत सिंह खालड़ा, जो उसी बैंक में कार्यरत थे, इस घटना से विचलित हो गए। उन्होंने मामले की तह तक जाने का फैसला किया। अपनी पत्नी परमजीत कौर के अनुसार, जब वे श्मशान घाट पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वहां लगभग हर दिन 8 से 10 अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा था।
इसके बाद उन्होंने अकाली दल की मानवाधिकार इकाई के तत्कालीन चेयरमैन जसपाल सिंह ढिल्लों के साथ मिलकर श्मशान घाट के रिकॉर्ड खंगाले। जांच में सामने आया कि केवल 1992 में ही एक श्मशान घाट में 300 से अधिक अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार दर्ज था। आगे की पड़ताल में ऐसे मामलों के अन्य श्मशान घाटों से भी जुड़े होने के संकेत मिले।
एक बैंक कर्मचारी से मानवाधिकार कार्यकर्ता बनने तक का सफर
अमृतसर के खालरा गांव में जन्मे जसवंत सिंह खालड़ा शुरुआत में एक साधारण बैंक कर्मचारी थे। लेकिन जब उनके कई परिचित और साथी अचानक लापता होने लगे, तो उन्होंने इस मुद्दे की जांच शुरू की। लंबे समय तक दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड की पड़ताल के बाद उन्होंने अमृतसर नगर निगम के ऐसे रिकॉर्ड जुटाए, जिनमें कथित रूप से उन लोगों का विवरण दर्ज था जिनका अंतिम संस्कार अज्ञात शवों के रूप में किया गया था। इन खुलासों के बाद उनका नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया।
दिनदहाड़े अपहरण और फिर हत्या
सितंबर 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा को आखिरी बार उनके घर के बाहर कार साफ करते हुए देखा गया था। आरोप है कि वहीं से उनका दिनदहाड़े अपहरण कर लिया गया। कई प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस की भूमिका को लेकर बयान भी दिए।
1996 में सीबीआई जांच के दौरान ऐसे सबूत सामने आए जिनसे यह निष्कर्ष निकाला गया कि उन्हें तरनतारन पुलिस स्टेशन में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में तत्कालीन एसएसपी अजीत सिंह संधू और डीएसपी जसपाल सिंह की भूमिका की जांच हुई। बाद में लंबे समय तक चले मुकदमे के बाद अदालत ने अपहरण और हत्या के मामले में कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। उल्लेखनीय है कि एसएसपी अजीत सिंह संधू ने बाद में आत्महत्या कर ली थी।
परिवार ने नहीं रुकने दी इंसाफ की लड़ाई
जसवंत सिंह खालड़ा की हत्या के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उनकी पत्नी बीबी परमजीत कौर खालड़ा ने न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया और वर्षों तक इस मुद्दे को जीवित रखा। उनके दोनों बच्चे, नवकिरण कौर और जनमीत सिंह भी इस संघर्ष का हिस्सा बने। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले 1995 में कनाडा में दिए गए एक भाषण में जसवंत सिंह खालड़ा ने कहा था कि जब अंधेरा सच्चाई पर हावी होने की कोशिश करेगा, तब भी स्वाभिमानी पंजाब की रोशनी उसे चुनौती देती रहेगी। उन्होंने प्रार्थना की थी कि सत्य की यह लौ कभी बुझने न पाए।
दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि पंजाब के उस दौर की याद है, जिस पर आज भी बहस होती है। यह फिल्म एक ऐसे अध्याय को सामने लाती है जिसने मानवाधिकार, न्याय और जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े किए थे। जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी आज भी इस बात की याद दिलाती है कि सच की तलाश अक्सर सबसे कठिन रास्तों से होकर गुजरती है।































