Punjabi Cinema History: क्या आपने कभी सोचा है कि अगर मुम्बई फिल्म नगर नहीं होती तो भारत का कौन सा शहर आज माया नगरी होता.. असल में अगर मुम्बई नहीं होता तो वो शहर होता आज के पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी लाहौर.. लाहौर जी हां, कभी पंजाब भारत का हिस्सा रहने वाले एक फेमस शहर.. जो बंटवारे के कारण पाकिस्तान चला गया.. लेकिन बहुत कम लोगो को पता है कि मुम्बई से पहले लाहौर फिल्म नगरी बनी थी.. जो भारत की पहली फिल्म इंडस्ट्री कहलाती है.. जहां पंजाबी फिल्मों ने पहली बार जन्म लिया,. जहां की हवाओ में पहली बार पंजाबी फिल्मों ने सांस ली थी। पंजाबी एक ऐसी भाषा है जो एक तरफ तो सुनने वालों को बेहद सुकून पहुंचाती है, तो वहीं इसका जोश आपको अंदर कर रोमांचित कर जाता है। एक एनर्जेटिक भाषा.. भले ही सबको ये समझ न आये, लेकिन पंजाबी संगीत की तरह ही आज पंजाबी फिल्मों ने भी दुनिया का दीवाना किया हुआ है। जैसे जैसे पंजाबी म्यूजिक सुपरहिट हुआ.. वैसे ही पंजाबी फिल्मो का भी दायरा भी बढ़ा.. जहां पहले साल में मुश्किल से 5-6 फिल्में बना करती थी वहीं अब 60 से 70 फिल्में बन रही है.. पंजाबी सितारो की पहचान अब केवल पंजाब तक ही सिमित नहीं है बल्कि ग्लोबली उन्हें शौहरत मिलने लगी। लेकिन पंजाब फिल्म इंडस्ट्री ने एक छोटी सी इंडस्ट्री से लेंकर इतनी बड़ी फिल्म इंडस्ट्री बनने का सफर कैसे तय किया.. अपने इस लेख में इसी सफर को जानेंगे।
पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास
पंजाब में हर साल 29 मार्च को पंजाबी सिनेमा दिवस के रूप में मनाया जाता है.. 29 मार्च 2026 को पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री को शुरु हुए पूरे 98 साल हो गए थे। 2021 में मोहाली में नार्थ जोन फिल्म एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन ने पहली राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता फिल्म चौधरी करनैल सिंह को दिखा कर पहली बार पंजाबी सिनेमा दिवस की शुरुआत की गई थी.. जिसके बाद से पंजाबी फिल्म और सितारो के सम्मान में हर साल तीन दिवसिय समागम किया जाता है। एक पंजाबी फिल्म को राष्ट्रीय पुरुस्कार मिलना पूरे पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के लिए बेहद गर्व की बात है। लेकिन पंजाबी फिल्मों का दायरा इतनी आसानी से नहीं बढ़ा.. यहा तक कि पहली पंजाबी फिल्म को रीलिज करने में ही फिल्म के निर्माता को 3 सालो की मशक्कत करने पड़ी थी।
लाहौर में पहली फीचर फिल्म बनाने की शुरुआत
साल 1924 की बात है, लाहौर पंजाब की आर्थिक राजधानी थी.. लाहौर में होने वाली कोई भी घटना का असर तब पूरे भारत पर पड़ता था.. ऐसे में जहां दूसरे व्यापार वहां फलफूल रहे थे, इसी दौरान पहली बार पंजाबी फिल्मों के मशहूर निर्माता निर्देशक जी के मेहता के दिमाग में लाहौर में फिल्म निर्माण करने का ख्याल आया.. जी के मेहता कोई पेशेवर फिल्म निर्माता नही थे, बल्कि वो तो रेलवे के रिटायर अधिकारी थे, जो रिटायरमेंट के बाद लाहौर में रह रहे थे.. चुंकि तब तक भारत में बोलती फिल्मों का दौर शुरु नहीं हुआ था.. इसलिए जाहिर है कि लाहौर में भी ऐसा स्टूडियो नहीं बन पाया जहां बोलती फिल्म बने.. लेकिन जीएस मेहता ने लाहौर में पहली फीचर फिल्म बनाने की शुरुआत कर दी.. और पहली बार लाहौर फिल्म निर्माण का पहला सबसे बड़ा केंद्र बन गया, जिसे लॉलीवुड नाम दिया गया। जी के मेहता ने एक फिल्म बनानी शूरू की.. जिसका नाम था डॉटर्स ऑफ टूडे.. जरा सोचिये कि सिख समुदाय में महिलाओ को किस तरह से बराबरी पर रखा जाता है कि पहली पंजाबी फिल्म भी बनी तो बेटियों पर.. साल 1924 में जी के मेहता ने शंकरदेव आर्य के साथ मिलकर फिल्म निर्माण करने के लिए एक कैमरा विदेश से आयात करवाया।
1924 में पहली बार लाहौर में फिल्म की शूटिंग शुरु हुई
शंकरदेव आर्य ने फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी ली। फिल्म पूरी तरह के मूल थी.. आवाज न होने के कारण डॉयलॉग भी नही थे। लेकिन पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री की ये नींव बनने वाली थी। फिल्म में काम करने के लिए विलायत बेगम, ए आर कादर, हीरालाल, विजय कुमार, एम, इस्मायल जैसे कलाकारो को साइन किया गया। और 1924 में पहली बार लाहौर में फिल्म की शूटिंग शुरु हुई। लेकिन जो फिल्म कुछ महीनों में बन कर तैयार होने वाली थी, वो आर्थिक तंगी के कारण 3 सालो तक अटकी रही। जी के मेहता ने तब भी फिल्म को डिब्बे में बंद करने के बजाय धीरे धीरे फिल्म पर काम जारी रखा। और आखिरकार 3 सालो की कड़ी मेहनत और मशक्कत के बाद फिल्म बन कर तैयार हुआ और 1928 में पहली बार पंजाब के सिनेमाघरों में रीलिज की गई.. और शायद किसी को उम्मीद नहीं थी कि एक मूक फिल्म पंजाब फिल्म इंडस्ट्री की ही नहीं बल्कि फिल्म सितारों की भी किस्मत बदलने वाली है।
डॉटर्स ऑफ टूडे ने पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री को पहचान दी
ए आर कादर जहां 20 सालो तक मुम्बई में बड़े सितारे बने रहे तो वहीं एम इस्माइल का करियर तो 50 सालो से भी बड़ा रहा। हालांकि इस फिल्म के रीलीज के कुछ ही सालो बाद 1932 में हीर रांझा के जरिए पहली बोलती पंजाबी फिल्म भी रीलिज हुई.. लेकिन डॉटर्स ऑफ टूडे ने पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री और लाहौर दोनो को एक साथ बड़ा पहचान दी। उसके बाद लाहौर में कई फिल्में सलाना बनने लगी.. लेकिन 1947 में बंटवारे के बाद लाहौर औऱ पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री दोनो ही पंजाब से दूर चले गए.. औऱ उन्हें फिर से खुद को स्थापित करना पड़ा.. जिसके बाद 1948 को शौर द्वारा निर्देशित फिल्म चमन पहली आजाद भारत की पंजाबी फिल्म बनी..जो कि बड़ी हिट भी हुई थी। 1960 में जब चौधरी करनैल सिंह को राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला.. तब पंजाबी इंडस्ट्री की किस्मत चमक गई..उसके बाद इस इंडस्ट्री को बूम मिला और ज्यादा फिल्में बनने लगी। आज पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री किसी पहचान की मोहताज नहीं है.. जो उनकी सालो के डेडीकेशन की देन है।












































