गरीब की शादी कैसे होती है? मजाक में चुभे इस सवाल ने बदल दी 162 बेटियों की जिंदगी; 16 साल से बाबुल बन रही ये संस्था| Gugga Peer Welfare Society

Nandani | Nedrick News Punjab Published: 16 सितम्बर 2026, 06:15 PM Updated: 16 सितम्बर 2026, 06:15 PM
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Gugga Peer Welfare Society: कहते हैं कि अगर नीयत साफ हो तो हंसी-मजाक में निकला एक छोटा सा ख्याल भी किसी की पूरी जिंदगी संवारने का जरिया बन जाता है। पंजाब और हरियाणा के अंचल में गुग्गा नवमी मेले के साथ धर्म और सेवा की अलख जगाने वाली ‘गुग्गा पीर वेलफेयर सोसाइटी’ ने कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया है। कभी मेले के दौरान दोस्तों की हंसी-ठिठोली में चुभा एक तीखा सवाल आज 162 गरीब और बेसहारा बेटियों के जीवन का सबसे मजबूत संबल बन चुका है। यह संस्था पिछले 16 सालों से उन कन्याओं के लिए सगे बाबुल का फर्ज निभा रही है, जिनके सिर से पिता का साया उठ चुका है या फिर घर की तंगहाली जिनकी डोली उठने में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई थी।

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एक जुमला जो दिल में गहरे तक चुभ गया| Gugga Peer Welfare Society

इस नेक पहल की शुरुआत की कहानी किसी को भी भावुक कर सकती है। संस्था के प्रधान राजेंद्र पाल वर्मा बताते हैं कि साल 2010 के गुग्गा नवमी मेले में संस्था के कार्यकर्ता आपस में हंसी-मजाक कर रहे थे। ठिठोली में ही एक साथी को दूल्हा बना दिया गया। ठहाकों के बीच अचानक किसी ने तंज कसते हुए कह दिया ‘गरीब की शादी भला कैसे होती है?’

यह बात भले ही मजाक में कही गई थी, लेकिन वहां मौजूद साथियों के सीने में तीर की तरह चुभ गई। सबके जेहन में एक ही सवाल कौंधने लगा कि जिसके पास दो वक्त की रोटी के लाले हों, वह अपनी लाडली के हाथ कैसे पीले करेगा? बस, उसी पल सबने मिलकर फैसला कर लिया कि अब गुग्गा नवमी मेले का दूसरा दिन किसी और काम के लिए नहीं, बल्कि बेबस परिवारों की बेटियों की खुशियों के नाम रहेगा।

गुरुद्वारा साहिब में आनंद कारज, हर शादी पर सवा लाख का बजट

संस्था के महासचिव मक्खन सिंह और प्रधान राजेंद्र पाल वर्मा के अनुसार, विवाह की सारी रस्में गुरुद्वारा साहिब में पूरे धार्मिक विधि-विधान और मर्यादा के साथ पूरी की जाती हैं। कन्यादान करने से लेकर बेटी की विदाई तक, संस्था का हर सदस्य पिता और भाई की तरह खड़ा रहता है ताकि किसी भी बेटी की आंख में बेबसी का आंसू न आए।

  • लागत और इंतजाम: संस्था हर शादी पर करीब सवा लाख रुपये का बजट तय करती है। इसमें बेटी को विदाई के समय दिए जाने वाले जरूरी घरेलू उपहारों से लेकर शादी की तमाम रस्मों का खर्च शामिल होता है।
  • 3 महीने पहले से होमवर्क: इस बड़े आयोजन के लिए करीब 3 महीने पहले से जमीन पर काम शुरू हो जाता है। इसमें जरूरतमंद और अनाथ बेटियों की पहचान करना, उनकी पारिवारिक स्थिति की जांच करना, दानदाताओं से फंड जुटाना और विवाह की व्यवस्थाएं जुटाना शामिल है।

3 से शुरू हुआ कारवां 162 तक पहुंचा

साल 2010 में जब यह शुरुआत हुई थी, तब पहले साल केवल 3 जरूरतमंद परिवारों की बेटियों का विवाह कराया गया था। लेकिन धीरे-धीरे लोगों का भरोसा और कारवां बढ़ता गया। अब हर साल मेले के दूसरे दिन 12 से 13 जरूरतमंद कन्याओं का सामूहिक विवाह धूमधाम से करवाया जाता है। जब कोई लाचार पिता या बेसहारा मां हाथ जोड़कर नम आंखों से कहती है कि ‘आज से आप ही इसके बाबुल हो’, तो मंडप में मौजूद हर शख्स की आंखें भर आती हैं। बिना किसी दिखावे या आडंबर के 16 साल से चल रहा यह सिलसिला समाज के सामने इंसानियत की एक अनोखी मिसाल पेश कर रहा है।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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