China crude oil refining news: कच्चे तेल से हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में चलने वाली गाड़ियां, पेट्रोल, डीजल और गैस हासिल करते हैं। यहां तक कि प्लास्टिक से लेकर कई औद्योगिक सामान भी इसी कच्चे तेल की बदौलत बनते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कच्चे तेल से इन अलग-अलग चीजों को अलग करने में अरबों रुपये की एनर्जी सिर्फ ईंधन के रूप में जलकर खाक हो जाती है। अब चीन के वैज्ञानिकों ने तेल रिफाइनिंग का पूरा गणित ही बदलकर रख दिया है। उन्होंने कच्चे तेल को अलग-अलग हिस्सों में बांटने की एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक ईजाद की है, जिससे रिफाइनिंग प्रोसेस में लगभग 91 फीसदी तक ईंधन की बचत होगी। जानकारों का मानना है कि अगर यह तकनीक भारत के हाथ लग जाए, तो देश की तेल कंपनियों के हर साल अरबों रुपये बच सकते हैं और इसका सीधा फायदा आम जनता को पेट्रोल-डीजल के दामों में राहत के रूप में मिल सकता है।
अब तक क्या था तरीका और क्यों होती थी इतनी बर्बादी? China crude oil refining news
कच्चा तेल जमीन से निकलने के बाद सीधे इस्तेमाल के लायक नहीं होता। इसमें कई तरह के रासायनिक घटक मिले होते हैं। अब तक दुनिया भर की रिफाइनरियों में ‘थर्मल डिस्टिलेशन’ तरीका अपनाया जाता है। यानी तेल को विशालकाय भट्टियों में बेहद ऊंचे तापमान पर बार-बार खौलाया जाता है। अलग-अलग पदार्थ अलग-अलग तापमान पर उबलकर भाप बनते हैं, फिर उन्हें ठंडा करके वापस तरल रूप में छांटा जाता है। इस पूरे चक्र में बेतहाशा बिजली और ईंधन खर्च होता है, जो रिफाइनिंग प्रक्रिया का सबसे खर्चीला हिस्सा है।
चीन ने कैसे बदला खेल: नैनोमीटर वाली झिल्ली से मॉलिक्यूल की छंटनी
चीन के डालियान इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल फिजिक्स के वैज्ञानिकों ने तेल को भट्टी में उबालने का झंझट ही खत्म कर दिया है। उन्होंने विशेष नैनो-मेम्ब्रेन (अल्ट्रा-थिन झिल्लियों) का इस्तेमाल करके मॉलिक्यूल्स के आकार और उनके रासायनिक गुणों के आधार पर उन्हें सीधे अलग करने की विधि तैयार की है।
इस तकनीक में मॉलिक्यूल्स के बीच का अंतर इतना बारीक होता है कि जिसे सामान्य नजरों से देखना नामुमकिन है:
- पहला चरण: इसमें लगभग 0.1 नैनोमीटर के मामूली अंतर वाले मॉलिक्यूल्स को छांटा जाता है। पहली झिल्ली छोटे और सीधे मॉलिक्यूल्स को अलग करती है, जिनका उपयोग बड़े औद्योगिक रसायन बनाने में होता है।
- दूसरा चरण: बचे हुए तेल को दूसरी खास झिल्ली से गुजारा जाता है। यहां अंतर 0.01 नैनोमीटर से भी कम का होता है। यह झिल्ली प्लास्टिक, रेजिन और सिंथेटिक फाइबर बनाने वाले घटकों को अलग कर देती है, जबकि बाकी बचे हिस्से को सीधे पेट्रोल बनाने के काम में लिया जा सकता है।
लैब में हल्के कच्चे तेल के 15 घटकों वाले मिश्रण पर जब इसका परीक्षण किया गया, तो 85 से 90 प्रतिशत तक उपयोगी उत्पाद सफलतापूर्वक हासिल हुए। सबसे बड़ा करिश्मा यह रहा कि इस प्रक्रिया में पारंपरिक तरीके के मुकाबले 91 प्रतिशत कम ऊर्जा खर्च हुई।
भारत के लिए क्यों गेमचेंजर साबित हो सकती है यह तकनीक?
भारत इस समय दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं और रिफाइनर्स में से एक है। देश की सालाना रिफाइनिंग क्षमता 27 करोड़ टन से भी ज्यादा है। कच्चे तेल को साफ करने में भारतीय रिफाइनरियां हर एक लाख बैरल पर भारी-भरकम पूंजी ईंधन पर खर्च करती हैं। अगर भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल भारतीय संयंत्रों में संभव हुआ, तो कंपनियों की उत्पादन लागत में ऐतिहासिक गिरावट आएगी। इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी, बल्कि देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को काबू में रखने में भी बहुत बड़ी मदद मिलेगी।












































