Mamata Banerjee Resignation: चुनावी रण को जीतने और वोटर्स को लुभाने के लिए सियासी पार्टियां वादों का पिटारा खोलती हैं, ताकि जनता को अपने पाले में कर चुनावी रण में अपना झंडा लहरा सकें। लेकिन क्या हो जब तमाम कोशिशों के बावजूद हाथ सिर्फ ‘शिकस्त’ लगे? पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। चुनावी नतीजों ने ममता बनर्जी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। नतीजों में मिली हार ने उन्हें बड़ा झटका दिया है, लेकिन असली ‘पॉलिटिकल ट्विस्ट’ तब आया जब दीदी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से ही साफ इनकार कर दिया।
ममता के पास कानूनी और राजनीतिक विकल्प
चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देने से इनकार करना ममता बनर्जी के लिए एक राजनीतिक विरोध का तरीका तो हो सकता है, ममता बनर्जी ने चुनाव परिणामों को “साजिश” और “धोखा” करार देते हुए अब कानूनी और राजनीतिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। वे चुनाव आयोग की भूमिका को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) दायर कर अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं।
साथ ही उन्होंने आगे की रणनीति तय करने के लिए ‘INDIA’ गठबंधन के नेताओं से विमर्श करने की बात कही है और वे जनता के बीच जाकर चुनावी प्रक्रिया के खिलाफ राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन भी कर सकती हैं।
बाधा बनी संवैधानिक सीमाएं (Mamata Banerjee Resignation)
वहीं संवैधानिक नियमों के अनुसार, विधानसभा का कार्यकाल 7 मई, 2026 को समाप्त होते ही ममता बनर्जी की सरकार का कानूनी अस्तित्व अपने आप खत्म हो जाएगा। यदि वे इस्तीफा नहीं देती हैं, तो राज्यपाल के पास अनुच्छेद 164 के तहत उन्हें बर्खास्त करने और बहुमत वाली पार्टी (बीजेपी) को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का पूरा अधिकार है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि इस्तीफा देना महज एक शिष्टाचार है; जैसे ही राज्यपाल नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाएंगे, ममता बनर्जी तकनीकी रूप से पदमुक्त मान ली जाएंगी, क्योंकि एक राज्य में एक समय पर दो मुख्यमंत्री नहीं हो सकते।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी का इस्तीफा देने से इनकार करना केवल एक राजनीतिक दिखावा है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है। पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी अचारी के अनुसार, अनुच्छेद 172(1) के तहत विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त होते ही उनकी सरकार की शक्तियाँ स्वतः खत्म हो जाएँगी।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों का तर्क है कि अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री को बर्खास्त कर सकते हैं और जैसे ही वे नई सरकार को शपथ दिलाएंगे, ममता बनर्जी तकनीकी रूप से पदमुक्त हो जाएंगी क्योंकि एक राज्य में दो मुख्यमंत्री नहीं हो सकते। इसके अलावा, चुनावी नतीजों को अदालत में चुनौती देने के विकल्प से भी नई सरकार के गठन की प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगेगी।
ममता बनर्जी का इस्तीफा देने से इनकार करना केवल एक राजनीतिक संदेश हो सकता है, लेकिन यह नई सरकार के गठन को नहीं रोक सकता। Jagran Josh के अनुसार, संविधान मुख्यमंत्री को बहुमत खोने के बाद पद पर बने रहने की इजाजत नहीं देता। जैसे ही 7 मई, 2026 को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होगा, उनकी शक्तियाँ कानूनी रूप से खत्म हो जाएंगी।
इसके बाद राज्यपाल अनुच्छेद 164 का उपयोग कर उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं और बहुमत वाली पार्टी को शपथ दिला सकते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का जनादेश और संवैधानिक नियम किसी भी व्यक्तिगत निर्णय से ऊपर हैं, जिसके कारण सत्ता का हस्तांतरण अनिवार्य है।




























