राजस्थान का सबसे अनोखा गांव, यहां हर कोई अपने नाम के आगे लगाता है एक ही सरनेम

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 30 जून 2024, 05:30 AM Updated: 30 जून 2024, 05:30 AM
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अब तक आपने ऐसे कई गांवों के बारे में सुना होगा जहां चूहों की पूजा की जाती है तो कुछ में बाइक की पूजा की जाती है, तो कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां के लोग शहरी लोगों से ज्यादा करोड़ो में पैसा कमाते हैं, वो भी सिर्फ खेती करके। जाहिर सी बात है इन सभी गांवों के बारे में जानने के बाद आप भी हैरान हो गए होंगे कि भारत में कितने अनोखे गांव हैं, लेकिन थोड़ा रुकिए, इससे पहले कि आप सोचें कि आपने सभी अनोखे गांव देख लिए हैं, आज हम आपके लिए एक ऐसे गांव की जानकारी लेकर आए हैं, जिसके बारे में जानने के बाद आपके मन में सवाल उठेगा कि क्या ऐसा भी होता है? दरअसल, आज हम आपको राजस्थान के एक ऐसे अनोखे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं जहां के लोग एक ही सरनेम का इस्तेमाल करते हैं। इस गांव के लोग धर्म और जाति को परे रखकर सालों से एक ही सरनेम का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। यहां पहले के हिंदू और मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोग भी अपने नाम के आगे एक ही सरनेम का इस्तेमाल करते हैं और उनके सरकारी दस्तावेजों में भी यही स्थिति है।

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सबका सरनेम ईनाणियां

दरअसल, इस गांव का नाम इनाणा है और यह राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इनाणा में सभी जाति और धर्म के लोग रहते हैं, चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान, इनमें कुम्हार, मेघवाल, सेन, जाट और राजपूत समुदाय के लोग शामिल हैं। ये सभी अपने नाम के बाद इनाणियां उपनाम लगाते हैं।

ऐसे बना था ये गांव

जानकारी के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि 1358 में शोभराज नामक व्यक्ति के बेटे इंदर सिंह ने इस गांव को बसाया था। उस समय 12 खेड़ों में 12 जातियां थीं और उन सभी को मिलाकर इनाणा बना। दिलचस्प बात यह है कि यह नाम इंदर सिंह के नाम से ही पड़ा। और तब से सभी लोग अपनी जाति की जगह इनाणियां लिखते आ रहे हैं।

इस गांव में कई चीजें हैं वर्जित

अगर इस गांव की आबादी की बात करें तो यहां कुल 4400 मतदाता हैं और यहां की कुल आबादी दस हजार के आसपास है। इन सभी लोगों के सरकारी दस्तावेजों में उनके नाम के आगे इनानिया उपनाम का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा इस गांव में कई ऐसी चीजें हैं जो प्रतिबंधित हैं।

डीजे बंद : इस गांव में 20 साल से डीजे पर पाबंदी है। न तो वे शादियों में डीजे ले जाते हैं और न ही किसी को लाने देते हैं। कारण यह है कि इससे मूक पशु-पक्षियों को परेशानी होती है।

ओढ़ावणी -मृत्युभोज बंद: पिछले 15 सालों से ओढवणी और मृत्युभोज बंद है। गांव वाले सिर्फ गंगाप्रसादी करते हैं।

शराबबंदी : गांव की सीमाएं 14 किलोमीटर में फैली हुई हैं और यहां एक भी शराब की दुकान नहीं है।

पटाखे नहीं बजाते : होली पर रंग और दीपावली पर पटाखे भी यहां के लोग शगुन के तौर पर ही बजाते हैं।

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