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जानिए IPC की धारा 61 के बारे में जिसे 1921 में निरस्त कर दिया गया था

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 21 Jun 2024, 12:00 AM | Updated: 21 Jun 2024, 12:00 AM

भारतीय दंड संहिता (IPC) हमारे देश का एक बहुत ही मजबूत हिस्सा है। इस वजह से देश में कानून को महत्व दिया जाता है और लोग देश के कानून का सम्मान भी करते हैं। देश में होने वाले अपराधों की व्याख्या और सजा का प्रावधान सब कुछ भारतीय दंड संहिता में वर्णित है। फिर भी IPC में कई धाराएं ऐसी हैं जिनके बारे में आम जनता को जानकारी नहीं है। इसलिए हम आपके लिए हर रोज एक नई धारा का विवरण लेकर आते हैं ताकि आप अपने कानून के बारे में और अधिक जागरूक हो सकें। ऐसे में आज हम आपके लिए आईपीसी की धारा 61 लेकर आए हैं।

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IPC की धारा 61 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 61 के अनुसार जब्ती का दण्ड भारतीय दण्ड संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1921 (1921 का 16) की धारा 4 द्वारा निरसित किया गया।

सरल शब्दों में कहें तो यह धारा ब्रिटिश शासन के दौरान लागू की गई थी। इस धारा में कहा गया था कि अगर सरकार किसी जगह पर कब्ज़ा करना चाहती है तो उस जगह के मालिक से पूछने की ज़रूरत नहीं है। उदाहरण के लिए अगर सरकार कोई प्रोजेक्ट पास करती है कि वो किसी जगह पर पुल या बांध बनाना चाहती है तो वो जगह सरकार के अधीन आ जाएगी और उस जगह का मालिक सरकार के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। अगर सरकार कहती है कि ज़मीन उनकी है तो ऐसी स्थिति में ज़मीन के मालिक को झुकना पड़ता था और वो जगह छोड़नी पड़ती थी।

भारत में किसने लागू की भारतीय दंड संहिता

भारतीय दंड संहिता ब्रिटिश काल में लागू की गई थी। आईपीसी की स्थापना 1860 में ब्रिटिश भारत के पहले विधि आयोग के प्रस्ताव पर की गई थी। इसके बाद 1 जनवरी, 1862 को इसे भारतीय दंड संहिता के रूप में अपनाया गया। वर्तमान दंड संहिता, जिसे भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जाना जाता है, से हम सभी परिचित हैं। इसका खाका लॉर्ड मैकाले ने तैयार किया था। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए हैं।

अगर पुलिस अधिकारी FIR लिखने से करें मना

वहीं अगर कोई पुलिस अधिकारी कभी भी आपकी कोई FIR लिखने से इनकार करता है तो यह सीधे तौर पर गैरकानूनी होगा। अगर FIR दर्ज नहीं हुई तो आप एसपी से शिकायत कर सकते हैं। अगर आपकी शिकायत को नजरअंदाज किया जाता है तो आप कोर्ट में किसी भी मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकते हैं। क्योंकि यदि कोई लोक सेवक कानूनी गलती करता है तो वह न्यायालय द्वारा क्षमा योग्य नहीं है।

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