Kamaljeet Sandhu: आमिर खान की फिल्म दंगल तो अपने देखी ही होगी, जिसमें उनका बहस फेमस डायलॉग है म्हारी छोरिया छोरो से कम है कै।। इए इकलौता डायलॉग काफी है हमारे देश की बेटियों ने जज्बा भरने के लिए ।। महिलाये किसी भी मामले में कमतर नहीं है, अगर वो चाह जाए तो तारे तोड़ लाए, फिर स्वर्ण पदक जीतना तक का सफर भला वो कैसे न पूरा करती। देश की सभी महिला को अपने ऊपर गौरव करने का मौका देने वाली थी भारत की पहली महिला गोल्ड मेडलिस्ट में कमलजीत संधू। जिन्होंने न केवल एथलेटिक्स में अपना दम दिखाया बल्कि पहली बार भारत के गोल्ड मेडल जीत कर पुरुषों को भी उन्हें सराहने पर विवश कर दिया। अपने इस लेख में हम कमलजीत संधू के बारे में जानेंगे, कैसे बनी वो भारत की पहली महिला स्वर्ण पदक विजेता, और कैसे पंजाब की गलियों से निकल तक तय किया उन्होंने इतना लंबा सफर।
भारत में महिलाओं को एक समय में घर की दहलीज पार करने की भी इजाजत नहीं थी, लेकिन अगर जिद तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है.. एक महिला क्या क्या कर सकती है.. इसका उदाहरण देखने को मिला पहली बार 1970 के बैंकॉक एशियाई खेलों में… जहां महिलाओं की 400 मीटर दौड़ को मात्र 57.3 सेकंड में पूरा करके भारत को स्वर्ण दिलाने वाली धावक कमलजीत संधू ने न केवल भारत का गौरव बढ़ाया बल्कि उन्होंने महिलाओं की सिर भी सम्मान से उंचा कर दिया।
कौन है Kamaljeet Sandhu?
20 अगस्त 1948 को पंजाब के फिरोजपुर जिले में जन्मी कमलजीत कौर संधू एक सिख परिवार से आती है। उनके पिता मोहिंदर सिंह कोरा आर्मी के ऑफिसर थे, इस कारण घर में काफी अनुशासन का माहौल था। कमलजीत अपने 4 बहनो में दूसरे नंबर पर है, और वो बचपन से ही लड़कियों के बजाये लड़को की तरह रहना पसंद करती थी। कमलजीत को बचपन से ही दौड़ने का शौक था.. और स्कूल के दिनो में अक्सर खेल प्रतियोगिताओं में वो जीता करती थी.. इस कारण उन्होंने एथलेटिक्स में जाकर धावक बनने का फैसला किया। जिसमें उनके पिता का भी पूरा सहयोग मिला,, हालांकि उनकी मां संधू के खेलने के पक्ष में नही थी, वो चाहती थी संधू बाकि लड़कियों की तरह चूल्हा चौका सीखा.. पिता की आर्मी की नौकरी के कारण उनके घरवालों ने उनका दाखिला मध्य प्रदेश के ग्वालियर के एक फेमस बोर्डिंग स्कूल सिंधिया कन्या विद्यालय में करवा दिया, जहां वो हॉस्टल मे रहा करती थी.. और वहीं अपनी पूरी स्कूलिंग की थी। जिसके बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी के फिजीकल एजुकेशन के डिपार्टमेंट में दाखिला ले लिया।
एशियाई खेल में संधू जलवा
अपनी फिटनस के प्रति उनकी रूचि और एथलेटिक्स में जाने के सपने को देखकर उनके पिता ने ग्वालियर के ही लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन सेंटर में उनका दाखिला करा दिया.., जहाँ से उनकी पेशेवर ट्रेनिंग की शुरुआत हुई थी। उनके कोच अजमेर सिंह ने भी संधू का हौसला बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.. जिनकी छत्रछाया में संधू ने स्टेट लेवल पर 200 और 400 मीटर दौड़ में कई नेशनल पदक जीते थे। 1970 में एशियाई खेल में सेलेक्ट होने से पहले भी संधू ने 1969 और 1970 में दो अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र टूर्नामेंट में हिस्सा लिया और जीत हासिल की थी, जिसके बाद एशियाई खेल में संधू ने वो कारनामा कर दिखाया, जिसने उनके नाम को स्वर्णिम अक्षरो से लिख दिया।
गोल्ड जीतने वाली पहली महिला संधू
14 दिसंबर 1970 को बैकॉंक के रेस के मैदान पर 400 मीटर की दौड़ में प्रतियोगिता में संधू की मुकाबला ताइवान की ची चेंग से था..जैसे ही रेस शुरु हुआ संधू ने तेजी पकड़ी लेकिन एक वक्त आया जब ची चेंग संधू ने 10 मीटर आगे निकल गई थी, लेकिन अचानक ची चेंग गिर पड़ी और संधू ने सबको पछाड़ने हुए फिनिशिंग लाइन पार ली.. ये तारीख भारतीय एथलैटिक्स में एक ऐसा दिन बन गया.. जिसने उन लोगो की सोच पर करारा तमाचा जड़ दिया जो कहते थे कि लड़कियां अच्छी धावक नहीं होती। संधू ने भारत को गोल्ड मेडल जीताया था.. और गोल्ड जीतने वाली वो पहली महिला बन गई थी और भारत की गोल्डन गर्ल और स्प्रिंट क्वीन के नाम से मशहूर हुई। संधू को उनकी इस जीत के खुद प्रधानमंत्री इंदिरागांधी ने फोन करके बधाई दी थी औऱ एक हफ्ते के लिए राजकीय अथिति बनाया था.. उनकी उपलब्धि के लिए उन्होंने 1971 में नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। संधू दौड़ने के अलावा वो नेशनल लेवल पर बास्केट बॉली खिलाड़ी थी, साथ ही वो फील्ड हॉकी में भी काफी निपुण थी।
महिलाओ को खेल के प्रति कोई जागरूकता
हालांकि संधू ने 1973 में ही सन्यास ले लिया और हरदयाल सिंह कूनर से शादी कर ली.. सन्यास लेने के बाद वो 1975 में नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान (NIS), पटियाला में एक एथलेटिक्स कोच के रूप में चुनी गई.. जिस दौर में महिलाओ को खेल के प्रति कोई जागरूकता नहीं थी,, संधू ने महिलाओं को एथलेटिक्स के लिए जागरूक किया.. इसके बाद 1982 में वो भारतीय महिला स्प्रिंट टीम की कोच भी चुनी गई थी।, उनके नेतृत्व में टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था। उन्होंने महिलाओं के लिए Dedicated women’s training camps शुरु करावाय, जिससे महिलाओं को भी पुरुषों की तरह पर्याप्त ट्रेनिंग और सुविधायें मिलने लगी। इस वक्त भी वो एक स्पोर्ट्स साइटिस्ट के रूप में महिला खिलाड़ियों ट्रेनिंग देती है। खेल जगत में संधू ने जो योगदान दिया.. उसे हर महिला खिलाड़ी बड़े गर्व के साथ देखती है। आज महिला खिलाड़ियों को उनके ही कारण इतना सम्मान मिलता है। आप क्या सोचते है कमलजीत कौर संधू के एथलेटिक्स बनने के सफर को लेकर हमें कमेंट करके जरूर बतायें।












































