Saptamrittika Durga puja tradition: शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का त्योहार सिर्फ मां भगवती की उपासना और महिषासुर पर अच्छाई की विजय का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने आप में समानता, सम्मान और सामाजिक समावेश का एक गहरा संदेश भी समेटे हुए है। जब भी कारीगर मां दुर्गा की भव्य और ममतामयी प्रतिमाओं को आकार देना शुरू करते हैं, तो एक अनोखी परंपरा की चर्चा हर साल सामने आती है। मान्यता है कि मां की पावन प्रतिमा को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में वेश्यालय की चौखट या उसके आंगन की मिट्टी जरूर मिलाई जाती है। इस परंपरा को लेकर अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासा रहती है कि आखिर देवी की सबसे पवित्र मूर्ति के निर्माण में इस जगह की मिट्टी का क्या महत्व है और इसके पीछे क्या धार्मिक व सामाजिक कारण हैं।
वेश्यालय की चौखट की मिट्टी से जुड़ी क्या है धार्मिक लोकमान्यता? Saptamrittika Durga puja tradition
बंगाल की पारंपरिक दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए वेश्यालय की चौखट से मिट्टी लाने का विशेष उल्लेख मिलता है। इसे लेकर एक बेहद चर्चित लोकविश्वास यह है कि जब कोई व्यक्ति वेश्यालय के भीतर कदम रखता है, तो वह अपनी सारी पवित्रता, शील और पुण्य उस चौखट के बाहर ही छोड़ जाता है।
इस मान्यता के अनुसार, उस दहलीज पर समाज की पवित्रता का वास हो जाता है और इसी कारण वहां की मिट्टी को प्रतिमा निर्माण के लिए बेहद खास माना जाने लगा। हालांकि, यह स्पष्ट होना जरूरी है कि यह एक लोकमान्यता और आस्था पर आधारित विश्वास है, कोई प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं। अलग-अलग विद्वान और पुरोहित इसकी अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करते हैं, लेकिन दुर्गा पूजा के संस्कारों में यह परंपरा आज भी बेहद खास स्थान रखती है।
‘सप्तमृत्तिका’ का विधान और 7 खास स्थानों की मिट्टी
हिंदू अनुष्ठानों में मां दुर्गा की मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया को ‘सप्तमृत्तिका’ की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। सप्तमृत्तिका का सीधा अर्थ सात अलग-अलग विशेष स्थानों की मिट्टी से है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इन अलग-अलग जगहों की मिट्टी प्रकृति, पर्यावरण, जीव-जंतु और समाज के विविध अंगों का प्रतिनिधित्व करती है।
पारंपरिक विवरणों के अनुसार, सप्तमृत्तिका के तहत आमतौर पर इन सात स्थानों की मिट्टी शामिल की जाती है:
- गोशाला की मिट्टी: कामधेनु और पवित्रता का प्रतीक
- घुड़साल (अश्वशाला) की मिट्टी: गति और पराक्रम का प्रतिनिधित्व
- हाथीशाला (गजशाला) की मिट्टी: शक्ति और गरिमा का प्रतीक
- पवित्र नदियों के संगम की मिट्टी: जीवनदायिनी जल और पावनता
- सांप की बांबी या दीमक के टीले की मिट्टी: प्रकृति और भूमि से जुड़ाव
- राजद्वार या राजभवन की मिट्टी: शासन और न्याय व्यवस्था का प्रतीक
- तालाब अथवा सरोवर के किनारे की मिट्टी: शांति और जल स्रोतों का सम्मान
कई परंपराओं में इसी क्रम में वेश्यालय की मिट्टी को भी स्थान दिया जाता है। हालांकि, देश के अलग-अलग राज्यों जैसे बिहार, असम या ओडिशा में स्थानीय मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर मिट्टी के चयन और निर्माण विधि में अंतर देखने को मिलता है। हर जगह की अपनी स्थानीय रीतियां होती हैं, इसलिए इसे किसी एक निश्चित नियम में नहीं बांधा जा सकता।
उपेक्षित वर्ग को सम्मान और समानता का सामाजिक संदेश
इस रस्म का सिर्फ धार्मिक पहलू ही नहीं है, बल्कि इसका एक बेहद प्रगतिशील और मजबूत सामाजिक पहलू भी है। वेश्यालय की दहलीज से मिट्टी लेने की परंपरा सीधे तौर पर समाज में हाशिए पर खड़े और उपेक्षित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें सम्मान देने की सीख देती है।
यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि समाज के किसी भी तबके को केवल उसके पेशे या सामाजिक स्थिति के आधार पर तिरस्कृत नहीं किया जा सकता। मां दुर्गा शक्ति, करुणा और न्याय की देवी हैं और उनका दरबार हर किसी के लिए खुला है। समाज जिसे ‘अछूत’ या उपेक्षित मानकर किनारा कर लेता है, देवी की आराधना उसी वर्ग के आंगन की मिट्टी के बिना पूरी नहीं मानी जाती। यह परंपरा सामाजिक भेदभाव और पाखंड पर कड़ा प्रहार करते हुए हर इंसान की बुनियादी गरिमा को स्वीकार करने का पाठ पढ़ाती है।
दुर्गा पूजा की यह अनूठी प्रथा भारतीय संस्कृति की उदारता और उसके गहरे मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती है। यह सिखाती है कि शक्ति और न्याय की असली आराधना तभी संभव है जब समाज के हर हिस्से को बराबर का मान-सम्मान और हक दिया जाए।











































