Spiritual Punjab: पंजाब को ये नाम क्यों मिला इसका जवाब तो हम सभी को पता ही होगा.. पंजाबी भाषा में पंज मतलब पांच होता है, और आब अरबी भाषा में जल की धारा को कहा जाता है। पंजाब में पांच नदियां है. इस कारण इसे पंजाब नाम मिला। लेकिन इसके अलावा भी पंजाब को एक नाम और मिला.. पंजाब को गुरुओं, पीरो, फकीरो की धरती के नाम से भी जाना जाता है। वैसे तो आपको इतिहास के ऐसे कई महान पीर फकीरो और संतो के बारे में सुनने को मिला होगा, लेकिन जो प्रमुखता पंजाब के संतो को मिली.. उतनी शायद किसी को मिली। पंजाब का नाम सुनकर आपको सबसे पहले सिख धर्म और सिख गुरुओ का ख्याल आता है, लेकिन क्या आप ये जानते है कि पंजाब में सिख धर्म से पहले भी कुछ आध्यत्मिक था.. जिसकी जड़े आज भी बेहग मजबूती से पंजाब से जुड़ी हुई है.. जिन्हें खुद गुरु साहिबानो ने अपने गायन, भजनो औऱ यहां तक कि पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी दी थी। जी हां, हम बात कर रहे है भक्ति के सबसे पुराने स्वरूप सूफीवाद के बारे में.. अपने इस लेख में हम पंजाब में सूफिज्म, सिख गुरुद्वारे और उनसे जुड़ी पंजाब की आध्यात्मिक विरासत को करीब से जानने की कोशिश करेंगे।
रूहानी पंजाब सूफिज्म और गुरुद्वारे
जिस तरह से हिंदू औऱ सिख धर्म में भजन कीर्तन के जरिए ईश्वर के करीब जाने का रास्ता निकाला गया वैसे ही इस्लाम धर्म में सूफीवाद वो रास्ता है, जो ईश्वर के करीब ले जाता है। ये एक रहस्यवादी और बेहद दया वाला रूप है… सूफीवाद के कारण इस्लाम धर्म में भी प्रेम, शांति और मानवता की सेवा का संदेश दिया गया। जो सूफी संत है.. उनके अंदर केवल करूणा, प्रेम और शांति ही होती हैष उनके लिए सब समान है.. कोई एक दूसरे से अलग नही है। सिख धर्म में सूफीवाद बेहद प्रचलित हुआ.. जिसका कारण था सूफीवाद और सिख धर्म के गुरुओ की सोच का एक समान होना। सिख गुरुओ ने सूफीवाद को एक ऐसा मार्ग माना.. जो लोगो को बांटने के बजाय एक करके आध्यत्मिकता के करीब ले जाता है। अन्य इस्लामिक दरगाहो से परे सूफी दरगाहें सभी के लिए खुली रहती है। सूफीवाद की सोच ने सिख गुरुओ को किस कदर प्रभावित किया होगा आप इस बात का अंदाजा केवल इस बात से लगा सकते है कि पहले गुरु गुरु नानक देव जी जब उदासियों पर गए तो वो सूफी संत भाई मरदाना जी को अपने साथ यात्रा पर ले गए।
सूफीवाद पंजाब की आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक
जो रबाब के जरिए पूरे माहौल भक्तिमय कर दिया करते थे। पंजाब में सूफीवाद की शुरुआत 11-12 सदी में ही हो गई थी, और बाबा फरीद ने 12-13वी शताब्दी में अपनी रूहानी पंजाबी कविताओं से सूफी मत का सबसे बड़ा केंद्र स्थापित किया था। उन्होंने सूफीवाद को सबसे तेजी से बढ़ावा दिया था। पंजाब की धरती पर ही कई ऐसे संत हुए जिन्होंने सूफी संगीत को ईश्वर के करीब जाने का रास्ता बनाया। जिन्होने ईश्वर को प्रेमी और खुद को उनके प्रेम में पड़ी प्रेमिका दर्शा कर भक्ति को नयी पहचान दी.. वहीं पंजाबी भाषा में होने के कारण सूफीवाद पंजाब की आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा बन गया।
15सदी में जब सिख धर्म आया, तब तक सूफीवाद पंजाब की मिट्टी में रच बस गया था.. सही मायने में कहे तो गुरु नानद देव जी को भक्ति का नया रूप देखने में सूफीवाद की बड़ी अहम भूमिका रही। भाई मरदाना उनके बचपन के दोस्त थे.. औऱ सूफी संत थे.. सूफी संतो को भक्ति का नया रास्ता अपनाते हुए देखना, सिख धर्म की नींव का बड़ा कारण रहा.. गुरु नानक देव जी ने भी सूफी संतो की तरह ही बराबरी और सम्मानता को बढ़ावा दिया। पाखंड से परे, अँधविश्वास पर चलने के बजाय पहले मौलो फिर तौलो की पद्दति को बढ़ाना दिया गया। सिख धर्म का मैन मोटो भेदभाव को मिटाना था। मानवता की सेवा को सबसे ऊपर रखना था.. ऐसा ही तो सूफीवाद में भी था।
सिख धर्म और सूफीवाद एक दूसरे से जुड़े
सही मायने में सिख धर्म और सूफीवाद एक दूसरे से जुड़े हुए है। आप सिख गुरुद्वारों के ही देख लीजिये.. सूफी संतो की दरगाहों की तरह ही गुरुद्वारों के चार दरवाजे इस बात का प्रतीक है कि ये दरवाजे हर धर्म, हर समुदाय के लिए चारो तरफ से खुले है। गुरूद्वारे केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, संगत सेवा का केंद्र है। यहां होने वाले लंगर समाजिक एक समरूपता का प्रतीक है। जहां कोई बड़ा या कोई छोटा नही है। जब आप सिख धर्म और सूफीवाद को करीब से देखते है तो पायेंगे कि दोनो ही भले ही अलग अलग रास्ते पर चलते है, लेकिन मंजिल एक ही है। ये अलग हो कर भी एक दूसरे के बेहद करीब है। सिख गुरुओ ने सूफी संतो की भक्ति मार्ग से प्रभावित होकर ही पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब में कई सूफी संतो की बाणी शामिल की है।
जिसमें बाबा फरीद जी की बाणी काफी प्रचलित है। सिख धर्म का सूफी संतो से ऐसा करीब रिश्ता है कि पहले श्री अकाल तख्त साहिब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के सामने स्थापित है, लेकिन ये बात कम लोग जानते है कि गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब की पहली नींव पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव जी ने प्रसिद्ध सूफी संत साईं मियां मीर से ही रखवाई थी.. ये गवाह है कि सिख धर्म हमेशा से ही साम्प्रादायिक सद्भाव को बढ़ावा देता रहा है। सिख धर्म हो या सूफीवाद.. उन्होंने बाहरी आंडबरो के पीछे समय बर्बाद करने के बजाय अपने अंदर झांकने, अपने मन को शुद्ध करके परम पिता परमेश्वर को खोजने की प्रेरणा देती है। इस कारण सिख धर्म और सूफीवाद का गहरा कनेक्शन रहा है।














































