Maldives India relations: हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से अहम मालदीव एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस बार विवाद की वजह बना है ‘थिलाफुशी पोर्ट’ का विकास कार्य, जिसे मालदीव सरकार ने एक चीनी कंपनी के हवाले कर दिया है। इस फैसले के बाद मालदीव पर आरोप लग रहे हैं कि उसने भारत से किया वादा तोड़ा और नई दिल्ली को नजरअंदाज करके चीन को प्राथमिकता दी। चौतरफा उठते सवालों के बीच अब मालदीव के आर्थिक विकास, परिवहन और व्यापार मंत्रालय ने बयान जारी कर सफाई पेश की है और पक्षपात के तमाम आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
मंत्रालय ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि बंदरगाह के विकास का जिम्मा सौंपते समय किसी भी विदेशी साझेदार को दूसरे के मुकाबले प्राथमिकता या छूट नहीं दी गई है। मालदीव सरकार का दावा है कि यह पूरा समझौता देश के स्थापित नियमों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और स्थानीय कानूनों के तहत ही पूरा किया गया है।
‘फैसला विकास के लिए, रिश्तों में कोई बदलाव नहीं’| Maldives India relations
आरोपों पर सफाई देते हुए मालदीव सरकार ने कहा कि यह कदम पूरी तरह से देश की लंबी अवधि की विकास प्राथमिकताओं और जरूरतों को ध्यान में रखकर उठाया गया है। इसे मालदीव के किसी भी अंतरराष्ट्रीय साझेदार के साथ रिश्तों में आई खटास या बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार ने यह भरोसा भी दिलाया कि बंदरगाह के विकास, उसके मालिकाना हक और संचालन पर पूरा नियंत्रण केवल और केवल मालदीव का ही रहेगा।
मालदीव के आर्थिक विकास, परिवहन और व्यापार मंत्री मोहम्मद सईद ने मामले को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा कि थिलाफुशी प्रोजेक्ट तय सरकारी प्रक्रियाओं के तहत ही दिया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस फैसले को किसी भी पुराने साझेदार के खिलाफ बयान या संदेश के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि मालदीव अपने सभी अंतरराष्ट्रीय साझेदारों का पूरा सम्मान करता है।
क्या है पूरा विवाद और भारत का रुख?
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2024 में हुए एक समझौते से जुड़ी हैं। दरअसल, साल 2024 में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने भारत का आधिकारिक दौरा किया था। उस दौरान माले पोर्ट पर जहाजों और माल की भारी भीड़ को कम करने के मकसद से थिलाफुशी बंदरगाह को भारत के साथ मिलकर संयुक्त रूप से विकसित करने पर सहमति बनी थी और इसका औपचारिक ऐलान भी किया गया था।
लेकिन हाल ही में मालदीव पोर्ट लिमिटेड ने भारत के साथ किए उस वादे को पीछे छोड़ते हुए चीनी सरकारी कंपनी ‘चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी’ (CHEC) के साथ इस प्रोजेक्ट के पहले चरण के लिए समझौता (MoU) कर लिया।
विवादित चीनी कंपनी को सिंगल नॉमिनेशन पर मिला काम
इस डील ने उस वक्त और तूल पकड़ लिया जब यह बात सामने आई कि चीनी कंपनी CHEC को यह प्रोजेक्ट बिना किसी खुली और पारदर्शी नीलामी के सीधे ‘सिंगल नॉमिनेशन’ के आधार पर थमा दिया गया। यह फैसला इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि इस चीनी कंपनी का अंतरराष्ट्रीय ट्रैक रिकॉर्ड काफी विवादित रहा है। कई देशों में यह कंपनी वित्तीय अनियमिताएं बरतने, प्रोजेक्ट में लेटलतीफी करने और पर्यावरण व रणनीतिक जोखिम खड़े करने के लिए बदनाम रही है।
हैरानी की बात यह भी है कि कुछ ही समय पहले राष्ट्रपति मुइज्जू ने ‘ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट’ (GMCP) में भारत की अहम भूमिका और काम की खुलकर तारीफ की थी। ऐसे में अब अचानक भारत से किए वादे को भूलकर उसी विवादित चीनी फर्म को पोर्ट सौंपने से कूटनीतिक हलकों में कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।












































