Strait of Hormuz: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान कि ईरान को हराने के बाद अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिकी क्षेत्र घोषित करेगा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। 28 फरवरी से जारी ईरान युद्ध और अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी के बीच आया यह बयान सिर्फ राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून से जुड़े कई सवाल भी खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई देश अपनी ताकत के दम पर किसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को अपनी सीमा में शामिल कर सकता है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला बेहद अहम और संकरा समुद्री रास्ता है। इसके उत्तर में ईरान है, जबकि दक्षिणी तरफ ओमान और UAE स्थित हैं। इसकी सबसे संकरी जगह करीब 34 किलोमीटर चौड़ी है। भौगोलिक और कानूनी स्थिति के हिसाब से इसका समुद्री क्षेत्र ईरान और ओमान की समुद्री सीमाओं से जुड़ा है। अमेरिका का यहां कोई क्षेत्रीय अधिकार नहीं है।
UNCLOS में क्या है प्रावधान? Strait of Hormuz
समुद्र और महासागरों से जुड़े अधिकारों को लेकर संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि यानी UNCLOS को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख कानूनी ढांचा माना जाता है। इसे अक्सर ‘समुद्रों का संविधान’ भी कहा जाता है। UNCLOS का अनुच्छेद 34 साफ करता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से जहाजों के गुजरने का अधिकार वहां के तटीय देशों की संप्रभुता को खत्म नहीं करता। इसका सीधा मतलब है कि होर्मुज के पानी, समुद्र तल और उसके ऊपर के हवाई क्षेत्र पर संबंधित तटीय देशों के अधिकार बने रहते हैं। कोई तीसरा देश सिर्फ अपने ऐलान के आधार पर इस इलाके को अपनी टेरिटरी नहीं बना सकता।
वहीं, अनुच्छेद 38 अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए ‘ट्रांजिट पैसेज’ का अधिकार देता है। इसके तहत दूसरे देशों के व्यापारिक और सैन्य जहाजों को ऐसे रास्तों से लगातार और तेजी से गुजरने की आजादी मिलती है। हालांकि उन्हें तटीय देशों की शांति और सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचना होता है। इसलिए न अमेरिका कानूनी तौर पर होर्मुज को अपना क्षेत्र घोषित कर सकता है और न ही कोई तटीय देश इसे हमेशा के लिए अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए बंद कर सकता है।
ट्रंप के बयान का असली मतलब क्या?
जानकारों की नजर में ट्रंप का बयान कानूनी अधिकार से ज्यादा रणनीतिक और राजनीतिक दबाव के तौर पर देखा जा रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की है और कई नागरिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इसके जवाब में अमेरिका ने भी नाकेबंदी की है।
ट्रंप ने 12 अगस्त को दावा किया था कि होर्मुज पर अमेरिका का पूरा कंट्रोल है। लेकिन जमीन पर स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। हाल में एक दिन में केवल 14 जहाज इस रास्ते से गुजरे, जबकि युद्ध से पहले रोजाना 130 से ज्यादा जहाज यहां से गुजरते थे। ऐसे में अमेरिका की ओर से क्षेत्र को अपना घोषित करने की बात को मौजूदा नियंत्रण और दबाव की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, न कि किसी स्थापित कानूनी अधिकार के रूप में।
पूरी दुनिया के लिए क्यों जरूरी है होर्मुज?
होर्मुज स्ट्रेट का महत्व सिर्फ अमेरिका और ईरान के विवाद तक सीमित नहीं है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी EIA के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की पहली तिमाही में इस रास्ते से औसतन रोजाना 2.04 करोड़ बैरल तेल गुजरता था। 2026 की पहली तिमाही में युद्ध के असर के चलते यह मात्रा घटकर करीब 1.46 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गई।
इसी तरह होर्मुज से गुजरने वाली LNG की मात्रा भी 11.7 अरब क्यूबिक फीट प्रतिदिन से घटकर 7.3 अरब क्यूबिक फीट रह गई। इसका सीधा असर एशियाई देशों पर पड़ता है, क्योंकि यहां से जाने वाली ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा एशिया पहुंचता है। 2024 में होर्मुज से गुजरने वाली वैश्विक LNG आपूर्ति का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा एशिया गया था। भारत, चीन और दक्षिण कोरिया मिलकर इसमें लगभग 52 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते थे।
तनाव बढ़ने का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिख रहा है। 14 अगस्त को हमले और बढ़ते तनाव के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 1.45 डॉलर बढ़कर 88.52 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। एक हफ्ते में इसकी कीमत लगभग 6 प्रतिशत बढ़ चुकी थी।











































