Punjab Politics: साल 2027 में यूपी, पंजाब समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है..यूपी के बाद पंजाब का चुनाव बेहद अहम माना जाता है.. जहां यूपी में धर्म का मुद्दा सबसे ज्यादा गर्म होता है तो वहीं पंजाब में चुनावी मुद्दा धर्म का नहीं बल्कि उसके इतिहास का होता है। जबकि पंजाब इस वक्त अलगाववाद, नशा और अपराध के साथ साथ सामाजिक संघर्ष से जूझ रहा है। वहीं पंजाब की छवि एक ऐसे राजनैतिक सांस्कृतिक व्य़वस्था की रही है जो अत्याचार और अन्याय के खिलाफ खुल कर विद्रोह करते आये है। जिसे लिए पंजाब के नेता इस वक्त तीन ऐसे नामों को ज्यादा हाइटलाइट कर रहे है जिनका अपने अपने समय में पंजाब में एक अलग प्रभाव रहा। शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह, शहीदे आजम भगत सिंह और अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाले .. लेकिन सवाल ये है कि आखिर पंजाब में चुनावो को लेकर कोई ठोस विश्वसिनिय वादों इरादो के बजाये इन तीन नामो को हाइलाइट क्यों किया जा रहा है.. इनके न होने के बाद भी ये पंजाब की राजनीति और सामाजिक विचारधारा में क्यों इस्तेमाल किये जा रहे है।
पंजाब की राजनीति तीन अलग अलग विचारधारा
साल 2022 में जब पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी, तो उम्मीद थी कि पंजाब के मजबूत नेतृत्व मिलेगा.. लेकिन भगवंत मान को सीएम का पद सौंपना, बेहद विवादित रहा.. उनकी छवि एक कमोजर और नौसिखिये नेता की थी.. शायद जनता को भी ये फैसला पसंद नहीं आया था.. अटकले उठने लगी कि पंजाब के शायद अब असल में मजबूत नेतृत्व नहीं रह गया है.. बढ़ते नशे, बढ़ते अलगाववाद, घटते निवेश, घटते फसलो की पैदावर के बीच पंजाब की राजनीति तीन अलग अलग विचारधारा में बंट चुकी है। एक वो जो महाराजा रणजीत सिंह जी की भक्ति करते है। एक वो जो शहीद भगत सिंह की भक्ति करते है तो वहीं एक वो जो अलगाववादी नेता भिंडरावाले की भक्ति कर रहे है। ये तीन ऐसे नाम है जिन्होंने अपने नेतृत्व से मौजूदा समय़ में पंजाब की पूरी राजनीति को बदल कर रख दिया था।
महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य की नींव रखी
महाराजा रणजीत सिंह ने अपने दम पर सिख सम्राज्य की स्थापना की थी, 1801 में उन्होंने सिख साम्राज्य की नींव रखी थी और करीब 38 सालों तक उन्होंने राज किया, इस दौरान उन्होंने सबसे मजबूत खालसा सेना को खड़ा किया.. उनकी दूरदर्शी सोच का नतीजा ये था कि उन्होंने अपनी सेना को विदेशी कला सिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी.. उनकी युद्ध कौशल ऐसा था कि अंग्रेज उनके जीते जी कभी पंजाब में एंट्री तक नहीं कर पाए थे..उन्होंने अफगानों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.. महाराजा रणजीत सिंह के नाम का जिक्र पंजाब की शान को बढ़ाने के लिए करने तक तो ठीक है, लेकिन राजनैतिक एजेंडे के लिए उनका इस्तेमाल.. केवल इस ओर इशारा करता है कि आज पंजाब के पास ऐसा नेतृत्व नही है जो पंजाब को भौगोलिक रूप से मजबूती दे सकें। ठीक वैसे ही पंजाब की बहादुरी की मिशाल दी जाती है।
खालिस्तानी आंदोलन
लेकिन जहां पंजाब की धरती पर भगत सिंह जैसे युवा हुए वहीं आज पंजाब के युवा क्राइम और नशे के जाल में फंस चुके है…. तो उन्हें साधने के लिए क्या आधार होना चाहिए.. वहीं एक वर्ग जो खुद को क्रांतिकारी कह कर पंजाब को भारत से अलग करने की बात करता है.. वो भिंडरावाले को पूजता है.. लेकिन जब आप खुद देखेंगे तो भिंडरावाले ने कभी भी पंजाब के बंटवारे की बात नही की लेकिन फिर भी वो हिंदू समेत बाकि धर्म से मुक्त पंजाब चाहता था.. जहां सिख ही हो.. खालिस्तानी आंदोलन के नाम पर एक वर्ग को अलग थलग करने की कोशिश की जा रही है.. लेकिन सरकार की सख्ती के कारण कोई खुल कर सामनें नहीं आ रहे है। जिससे उनका नेतृत्व भी एक रेत के महल की तरह ही है जो एक लहर से पानी में बह जायेंगे। पंजाब में नेतृत्व का कोई ऐसा चेहरा जिसपर लोग दाव लगाये, इसकी कमी के कारण ही आज वहां तीन दिवंगतों के नाम पर राजनीति की जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या इन लोगो के नाम पर राजनीति जनता को भरोसा दिलाने में कामयाब हो पायेगी। क्या पंजाब की स्थिति कभी फिर से इतनी मजबूत होगी जिससे किसी बड़े नाम के बजाय जमीनी स्तर पर सही मुद्दो के साथ चुनाव लड़ा जाये।













































