अहमद शाह अब्दाली को पंजाब में मिली करारी शिकस्त, सिखों ने रचा इतिहास – Ahmad Shah Abdali

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 03 अगस्त 2026, 11:25 PM Updated: 03 अगस्त 2026, 11:25 PM
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Ahmad Shah Abdali सिखों के दसवें गुरु साहिब गुरु गोबिंद सिंह जी ने चमकौर के युद्ध के दौरान अपने चालीस सिखो का हौंसला बढ़ाने के लिए एक कहावत कही थी।

चिड़िया नाल में बाज लड़ावा

गीदड़ा नूं मैं शेर बणावां,

सवा लाख ते एक लड़ावा

तां गोबिंदसिंह नाम धरावां

गुरु साहिब के इन शब्दो का मतलब था कि गुरु साहिब के लिए उनका एक एक सिख योद्धा सवा लाख के बराबर है। वो 40 सिख करीब 10 हजार मुगलों की सेना से भिड़ गय.. भले ही वो युद्ध ने न जीते, लेकिन एक एक सिख कई कई मुगलों पर कितना भाऱी पड़ सकता था इसका अहसास मुगलो को हो गया था.. लेकिन सिखो की ताकत का नमूना अभी एक और सेना को देखना बाकी थी.. ये सेना थी अफगानिस्तान की अहम शाह अब्दाली की.. जिसने 8 बार भारत पर हमला किया लेकिन उसके अंतिम हमले में उसका सामना हुआ दल खालसा से…  हजारो की संख्या में खड़ी सेना को 20 हजार सिखों ने ऐसी शिकस्त दी कि अब्दाली ने दोबारा कभी भारत में घुसने के बारे में सोचा तक नही।  तब क्या हुआ वो इतिहास के पन्नों में सवर्णिम अक्षरों में लिखा गया। अपने इस वीडियो मे हम बात करेंगे कि कैसे अब्दाली की सेना को शिकस्त मिली औऱ उसे अफगान छोड़ कर जाना पड़ा..

नादिरशाह की मौत और दुर्रानी सम्राज्यk का उदय

1748 नादिरशाह की मौत हुई और उदय हुआ दुर्रानी सम्राज्य का.. जिसका शासक था अहमद शाह अब्दाली उर्फ अहमद शाह दुर्रानी । अहमद शाह अपनी ताजपोशी के पहले नादिरशाह के सेनापति के तौर पर उसके अभियानों में सहयोगी बनता था लेकिन दब नादिरशाह की हत्या हुई तो अहमद शाह ने फायदा उठाया और अफशरीद सम्राज्य का विभाजन कर खुद को कंधार का राजा घोषित कर दिया। राजा बनने के बाद उसका पहला टागरेट था भारत.. उसने 1748 में पहली बार मुगलों के शासन वाले भारत पर हमला किया.. ये सिलसिला अगले 2 दशकों तक चलता रहता..इन दो दशको में अब्दाली ने भारत पर 8 बार हमला किया था। लेकिन जब अब्दाली ने तीसरी बाद साल 1751-52 में भारत पर हमला किया तब उसने कश्मीर और पंजाब के काफी हिस्से पर कब्जा कर लिया था।

मुगल शासक बहादुर शाह और दुर्रानी

3 अप्रैल 1752 को मुगल शासक बहादुर शाह और दुर्रानी ने एक संधि की जिसके बाद से मुगलो के हाथ से पंजाब अफगानो के हाथ में चला गया.. लेकिन ये हार भले ही मुगलो मे बर्दाश्त कर ली थी.. लेकिन सिख नहीं.. वो तय कर चुके थे कि वो अब्दाली को पंजाब की धरती से बाहर कर के रहेंगे.. इसी बीच 1756 में दुर्रानी ने फिर से पंजाब पर हमला कर दिया.. पहले वो लाहौर आया, फिर लुधियाना, फिर, सरहिंदस, करनाल औऱ पानी पत पर कब्जा करते हुए दिल्ली पर हमला कर दिया था। दिल्ली बाद वो फरिदाबाद जीतते हुए आगरा की तरफ मुड़ने लगा लेकिन इसी बीच उसकी सेना में हैजा फैल गया जिससे डर कर उसने वापिस लौटने का फैसला किया। भारी लूटपाठ और रक्तपात के बाद भी उसका दिल नहीं भरा। 1758 में पंजाब पर जहान खान का शासन था वो सिख्की और हिंदू परंपरा को मानने  और उसे फॉलो करने वालो के सख्त खिलाफ था, इस कारण उसने दिवाली मनाने वाले सिखों औऱ हिंदुओ पर हमला कर दिया था।

जोआबा क्षेत्र में भारी लूटपाठ

मंदिर गुरुद्वारो को तोड़ डाले..जिहाद की घोषणा कर दी थी। सिख कभी मुगलो के आगे सिर झुकाने के लिए राजी नहीं थे.. जिस कारण सिखो ने भगोड़ा साबित किये गए जालंधर दोआबा क्षेत्र के अदीना बेग से हाथ मिला लिया, जो जहान के हमले से खुद भागा था, गुस्से में जहान खान ने जालंधर जोआबा क्षेत्र में भारी लूटपाठ मचाई ..लेकिन सिखों ने कोई बड़ा कदम उठाने पहले खुद को एकजुट कर मजबूत करन का फैसला किया.. अदीना बेग मे दल खालसा के नेता वदभाग सिंह सोढ़ी और जस्सा सिंह अहलूवालिया के साथ गठबंधन किया । इस गठबंधन ने दल खालसा काफी मजबूत हो गई और मुराद खान के नेतृत्व में एक टुकड़ी महिलापुर में अफगानों के सामने खड़ी हो गई.. दल खालसा की ताकत के आगे अफगानी सेना ने पानी मांग लिया औऱ उनकी पहली शिकस्त हुई। इस हार का बदला लेने के लिए फिर से लाहौर से सेना भेजी गई.. लेकिन सिखों के साथ हुई बर्बरता, लूटपाठ को देखकर मानों सिखों के सिर पर खून सवार हो गया था।

वो गाजर मूली की तरह अफगान सेना को काटते हुए लाहौर पहंच गए.. जहां न केवल लाहौर पर कब्जा किया बल्कि भारी लूटपाट भी हुई। 1757 में ही दूसरी तरफ मराठो ने भी मुगलो और अफगानो को सबक सिखाते हुए सिंधुनदीं पर अफगानी सेना और अहमद शाह के कारवा को कमजोर करते हुए गंगा दोआबा क्षेत्र पर कब्जा कर लिया औऱ जिसका फायदा सिखों ने भी उठाया और मराठा शासक रघुमाथ राव को पंजाब पर हमला करने के लिए मनाया.. फरवरी 1758 में मराठो ने भी चढ़ाई शुरु की और सबसे पहले सरहिंद पहुंचे। वहां मराठों की ताकत देख कर अफगानी गवर्नर अब्दस समद खान भाग गया। सरहिंद में मराठो ने कब्जा कर लिया, जिसकी खबर जहान खान को लगी.. तो उसने मराठों का सामना करने के बजाय पीछे हटना बेहतर समझा और वो रावी नदी के किनारे शहादरा में डेरा डाल कर बैठ गया, लेकिन मराठों ने उसे वापिस संभालने का मौका नहीं दिया और लाहौर पर हमला तेज कर दिया ,

जिससे जहान खान और तेजी से पीछे हटा लेकिन वजीराबाद में उसे सिखों और मराठो ने घेर लिया .. औऱ 200 से ज्यादा अफगानियों कैद किया गया.. कलात में अफगानो की पराजय हो गई थी.. और मराठा और सिखों का उदय शुरु हो गया। लेकिन अहमद शाह कहां शांत बैठने वाला था.. हमलो का दौर चलता रहा.. कभी सिख भारी पड़ते तो कभी अफगानी लेकिन सातवी बार हमले के बाद सिखों ने तैयारी पूरी कर ली थी कि वो अब पंजाब को और नुकसान नहीं पहुंचाने देंगे। 1765 में सिखो ने लाहौर पर कब्जा कर लिया था, और दुर्रानी अपने आठवे हमले की तैयारी में था। 1766 में दुर्रानी ने हमला कर दिया औऱ वो सिख योद्धाओ को हराते हुए एमिनाबाज पहुंच गया था..तब तक सिखो ने लाहौर छोड़ दिया था, लेकिन करीब 20 सिख सैनिको को जमा कर हमले की तैयारी शुरु कर दी लेकिन दुर्रानी की 50 हजार सैना के आगे वो पीछे हट गए, मगर उन्हौंने दुर्रानी की शांति वार्ता को ठुकरा दिया। और 17 जनवरी 1767 को सिखो ने जहान खान को पराजित कर लेकिन अहमद शाह के आने से वो पीछे हट गए थे।

अहमद शाह सरहिंद लौटा और सिखो के खिलाफ एक अभियान शुरु कर दिया.. उसने कीरतपुर आनंदपुर साहिब पर हमला किया औऱ लूटपाठ मचाई थी..लेकिन इसी बीच गर्मी का मौसम खत्म होने लगा और मानसून शुरु होते ही अब्दाली को मौसम के कारण वापिस लौटना पड़ा और ये मौका सिखों के लिए सुनहरा था। उन्होंने न केवल लाहौर पर कब्जा किया बल्कि खुद को मजबूत करना शुरु कर दिया.. जिसका नतीजा ये हुआ कि 1768 में जब अब्दाली ने नौवी बार हमला किया था सिखो ने अफगानो को झेलम नदी पर ही रोक दिया। अफगानो के हाथ कुछ नहीं लगा, उल्टा उसकी सेना में फूट पड़ गई.. सेना एक दूसरे की ही खून के प्यासे हो गए, जिससे अबदाली को फिर से अफगान लौटना पड़ा। इस युद्ध में दल खालसा के नेतृत्व में सिख यौद्धाओ ने सबसे पहले अमृतसर संघर्ष किया और जीत हासिल की फिर, जिसके बाद जालंधर दोओबा क्षेत्र पर दुर्रानी के सेना पति नसीर खान बलूट को हराया, फिरअब्दाली के प्रमुख सहयोगी जाबिता खान को हराया गया.. वहीं सिखो की रणनीति परिणाम के कारण उन्होंने मई महीने नमें युद्ध किया जिसके बाद मानसून के कारण उसे लौटना पड़ा । सिखों ने पंजाब और लाहौर पर विजय पाई थी.. वहीं दुर्रानी इसके बाद कई बार हमला करने की भी वो कभी भारत में नही सके। ऐसी थी सिखों की बाहादुरी..उनका साहस.. जो भले ही संख्या में कम थे.. लेकिन हौसलो में सबसे ज्याद  थे।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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