Kulgam Terror Attack: पहलगाम हमले को बीते अभी सिर्फ 1 साल 3 महीने ही हुए हैं कि आतंकियों ने कश्मीर में वैसी ही एक और दिल दहला देने वाली वारदात को अंजाम दे दिया। फिर से वही पैटर्न—पहले धर्म पूछना और फिर मौत के घाट उतार देना। इस वारदात के सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल उठना लाजिमी है। क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था में कोई ऐसी चूक है कि आतंकी इतनी आसानी से वार कर देते हैं?
क्या आतंकी देश की सरहद ऐसे क्रॉस कर रहे हैं जैसे एक शहर से दूसरे शहर जा रहे हों? आखिर कब तक देश का आम नागरिक इस दर्द को झेलता रहेगा? तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं कि इस खौफनाक वारदात को कैसे अंजाम दिया गया और हमले के बाद सरकार व सुरक्षा बलों ने क्या कदम उठाए हैं।
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Kulgam Terror Attack से दहशत का तांडव
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह खौफनाक वारदात दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के केलम (Kellam) इलाके में हुई। रोज की तरह एक ईंट-भट्ठे पर मजदूर अपने काम में व्यस्त थे कि अचानक हथियारों से लैस आतंकवादी वहां धमक पड़े। (Kulgam Terror Attack) चश्मदीदों के मुताबिक, आतंकियों ने वहां मौजूद प्रवासी मजदूरों को लाइन में खड़ा किया और उनके नाम पूछने शुरू किए। जैसे ही समूह में से दो हिंदू मजदूरों की पहचान हुई, उन्हें बाकी लोगों से अलग कर दिया गया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, आतंकियों ने बेहद करीब से उन पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं।
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर आधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादी इतनी संवेदनशील जगह पर कैसे पहुंच गए? क्या रास्ते में उनकी कहीं चेकिंग नहीं हुई? और अगर सुरक्षा बल तैनात थे, तो आतंकी इतने खतरनाक हथियारों के साथ कश्मीर के रिहायशी इलाकों में दाखिल होने में कैसे कामयाब रहे?
जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में आतंकियों ने एक बार फिर खौफनाक मजहबी पैटर्न दोहराते हुए ईंट भट्ठे पर काम कर रहे छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी हिंदू श्रमिकों की गोली मारकर हत्या कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) के हमलावरों ने… pic.twitter.com/bkTx5tDNrP
— Nedrick News (@nedricknews) August 1, 2026
छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे मृतक
इस टारगेटेड किलिंग में मारे गए दोनों मजदूरों की पहचान दीपक रात्रे और भूपेंद्र कुमार के रूप में हुई है। ये दोनों छत्तीसगढ़ के रहने वाले थे और अपनी आजीविका कमाने के लिए कश्मीर आए थे। इस कायरतापूर्ण हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के मुखौटा संगठन ‘यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल’ (ULC) ने ली है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इस हमले में एक स्थानीय और एक विदेशी (पाकिस्तानी) आतंकवादी शामिल था।
विदेशी आतंकी की संलिप्तता से एक बात तो साफ हो जाती है कि आतंकियों ने सरहद पार से घुसपैठ की है। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि जब देश की सीमा पर हमारे जवान दिन-रात अपनी जान की परवाह किए बगैर कड़ी निगरानी रख रहे हैं, तो सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? घुसपैठ की इस गंभीर ढिलाई का जवाब आखिर कौन देगा?
हमले के बाद सरकार और सुरक्षा बलों का ‘एक्शन’
इस खौफनाक वारदात (Kulgam Terror Attack) के बाद सुरक्षा एजेंसियां और स्थानीय प्रशासन तुरंत अलर्ट मोड पर आ गए हैं। हमलावर आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने के लिए सुरक्षा बलों ने केलम और उसके आसपास के पूरे इलाके की नाकेबंदी कर दी है। जम्मू-कश्मीर पुलिस, सेना और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) का संयुक्त सर्च ऑपरेशन जारी है। आतंकियों की लोकेशन ट्रेस करने के लिए ड्रोन और खोजी कुत्तों की मदद ली जा रही है। इसके साथ ही घाटी में काम कर रहे अन्य प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा की भी नए सिरे से समीक्षा की जा रही है।
लेकिन यहां जनता के मन में एक तीखा सवाल उठता है—हमले के बाद जवाबी कार्रवाई करना तो अब एक स्थापित दस्तूर बन चुका है, पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमला हुआ ही क्यों? जब एक आम इंसान को भी कोई थप्पड़ मारता है, तो वह पलटवार करता है। परंतु क्या देश की सुरक्षा व्यवस्था का पहला कर्तव्य नागरिकों की जान बचाना नहीं होना चाहिए? क्या हर बार हमला होने के बाद पलटवार करके अपनी ताकत दिखाना ही रक्षा का एकमात्र पैमाना है, या फिर खुफिया तंत्र को इतना मजबूत करना होगा कि ऐसे हमले होने ही न पाएं?
































