Teej 2026: साल 2026 में अखंड सौभाग्य देने वाले तीनों मुख्य तीज व्रत—हरियाली तीज (15 अगस्त), कजरी तीज (31 अगस्त) और हरतालिका तीज (14 सितंबर) को मनाए जाएंगे। हिंदू पंचांग के अनुसार, सुहागिन महिलाओं के लिए ये तीनों व्रत बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, जो वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु के लिए रखे जाते हैं। आइए जानते हैं इस साल इन व्रतों की सही तारीखें, पूजा के शुभ मुहूर्त और व्रत से जुड़े ज़रूरी नियम।
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Hariyali Teej का शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 14 अगस्त 2026 को शाम 06:46 बजे से हो रही है, जो अगले दिन 15 अगस्त 2026 को शाम 05:28 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के नियमों के अनुसार, हरियाली तीज का पावन व्रत 15 अगस्त 2026, शनिवार को ही रखा जाएगा। इस दिन पूजा के लिए दो बेहद शुभ समय मिल रहे हैं।
पूजा का पहला और सबसे उत्तम समय सुबह 07:29 बजे से 09:08 बजे तक रहेगा, जिसमें अमृत चौघड़िया का विशेष संयोग है। इसके बाद जो महिलाएं शाम को पूजा करना चाहती हैं, उनके लिए प्रदोष काल में शाम 04:15 बजे से लेकर 05:28 बजे (तृतीया तिथि समाप्त होने से पहले) तक का समय बेहद कल्याणकारी रहेगा।
हरियाली Teej का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 107 जन्मों तक कड़े जतन किए थे। उनके कठोर तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने सावन शुक्ल तृतीया के दिन ही उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं। सावन के महीने में चारों तरफ हरियाली छा जाती है। यह पर्व प्रकृति के इसी सुंदर रूप का उत्सव मनाने और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करने का प्रतीक है।
Hariyali Teej पर क्या करें और क्या न करें
हरियाली तीज (Teej ) के दिन सुहागिन महिलाओं को सुबह स्नान के बाद हरे रंग की साड़ी या सूट पहनना चाहिए और हाथों में गहरी मेहंदी लगानी चाहिए, क्योंकि हरा रंग खुशहाली और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। चूंकि यह सुहाग का उत्सव है, इसलिए इस दिन काले, नीले या सफेद रंग के कपड़े और चूड़ियां पहनने से पूरी तरह बचना चाहिए।
घर के मंदिर में पूजा करने के साथ-साथ यदि संभव हो, तो गंगाजल मिश्रित काली मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा करें। व्रत के दिन अपने मन को शांत रखना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि घर में किसी भी तरह का क्लेश, वाद-विवाद या किसी की बुराई करने से व्रत का फल नष्ट हो जाता है।
पूजा संपन्न होने के बाद सुहाग की पेटिका (जिसमें सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, मेहंदी हो) अपनी सास, ननद या किसी सुहागिन महिला के पैर छूकर उन्हें भेंट (बायना) स्वरूप दें। इसके साथ ही घर के बड़ों, विशेषकर सास और पति का अनादर करने के बजाय उनका आशीर्वाद लें। नवविवाहित बेटियों के लिए मायके से आने वाले सिंजारे (कपड़े, घेवर, श्रृंगार का सामान) का सम्मान करें और उसका चाव से उपयोग करें।
इस पावन दिन पर जो महिलाएं व्रत नहीं भी रख रही हैं, उन्हें भी घर में लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा जैसी तामसिक चीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस पर्व की मुख्य रीति सखियों के साथ मिलकर झूला झूलना और तीज के पारंपरिक मल्हार गीत गाना है। अंत में इस बात का विशेष ध्यान रखें कि व्रत के दिन, दिन के समय सोने की मनाही होती है, इसलिए इस समय को भजन-कीर्तन या शिव-पार्वती के मंत्रों का जाप करने में बिताएं।
Kajari Teej का शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 30 अगस्त 2026 को सुबह 09:36 बजे से हो रही है, जिसका समापन अगले दिन 31 अगस्त 2026 को सुबह 08:50 बजे होगा। हिंदू धर्म में उदयातिथि की परंपरा को सर्वोपरि माना जाता है, इसलिए कजरी तीज का मुख्य उपवास और पूजा 31 अगस्त, सोमवार को ही की जाएगी। इस व्रत की पूजा मुख्य रूप से शाम के समय और रात में चंद्रमा के उदय होने पर की जाती है। महिलाएं पूरे दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखकर रात को चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद ही अपने व्रत का पारण करती हैं।
कजरी तीज का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कजरी तीज का व्रत वैवाहिक जीवन में मधुरता, पति की लंबी आयु और संतान सुख की प्राप्ति के लिए बेहद फलदायी माना जाता है। इसके साथ ही कुंवारी कन्याएं भी मनचाहा और योग्य जीवनसाथी पाने के लिए इस दिन पूरी श्रद्धा से उपवास रखती हैं। सावन के बाद भादों के महीने में आने वाली यह तीज वर्षा ऋतु के सुंदर रूप और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी माध्यम है। इस दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में महिलाएं इकट्ठा होकर पारंपरिक कजरी लोकगीत गाती हैं और झूला झूलती हैं, जिससे घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पूजा विधि और परंपराएं
कजरी तीज की पूजा अन्य व्रतों से थोड़ी अलग और बेहद अनूठी होती है। इस दिन सुहागिन महिलाएं घर के आंगन या दीवार के पास मिट्टी और गोबर से एक छोटी सी तालाब जैसी आकृति बनाती हैं, जिसे ‘तलई’ या ‘कजरी माता का तालाब’ कहा जाता है। इस तालाब के किनारे नीम की एक डाल को रोपा जाता है, जिसे ‘नीमड़ी माता’ के रूप में पूजा जाता है। नीमड़ी माता को जल, रोली, हल्दी, मेहंदी और सिंदूर चढ़ाकर सोलह श्रृंगार अर्पित किया जाता है। इस दिन पूजा की थाली में एक दीपक इस तरह जलाया जाता है कि उसकी परछाई तालाब के पानी में साफ दिखाई दे।
इस व्रत की सबसे मुख्य परंपरा सत्तू से जुड़ी है। कजरी तीज पर जौ, चने, गेहूं और चावल को सेककर घी और मेवे मिलाकर विशेष सत्तू के पिंडे बनाए जाते हैं। रात को चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें चांदी के सिक्के से या पति/पुत्र के हाथों से तुड़वाया जाता है और सत्तू खाकर ही व्रत खोला जाता है। इसके अलावा, इस दिन गौ माता की पूजा करने और उन्हें आटे की सात लोइयां बनाकर खिलाने का भी विशेष विधान है।
Hartalika Teej का शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारंभ 13 सितंबर 2026 को सुबह 07:08 बजे से हो रहा है, जो अगले दिन 14 सितंबर 2026 को सुबह 07:06 बजे समाप्त हो जाएगी। उदयातिथि के शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार, हरतालिका तीज का मुख्य व्रत और उत्सव 14 सितंबर 2026, सोमवार को ही मनाया जाएगा।
इस पावन दिन पर शिव-पार्वती की पूजा के लिए प्रातःकाल का सबसे श्रेष्ठ और कल्याणकारी मुहूर्त सुबह 06:05 बजे से सुबह 07:06 बजे तक रहेगा। इसके अलावा, जो महिलाएं प्रदोष काल (शाम के समय) में पूजा करना चाहती हैं, वे सूर्यास्त के बाद शाम 06:21 बजे से रात 08:42 बजे के बीच प्रदोष काल की मुख्य पूजा संपन्न कर सकती हैं।
हरतालिका तीज का धार्मिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हरतालिका तीज (Hartalika Teej)का सीधा संबंध माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह से है। ‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—’हरत’ जिसका अर्थ है हरण करना और ‘आलिका’ जिसका अर्थ है सखी। माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे, लेकिन माता पार्वती ने मन ही मन शिवजी को अपना पति मान लिया था।
ऐसे में उनकी सखियों ने उनका हरण करके उन्हें एक घने जंगल में छिपा दिया था। उस गुफा में माता पार्वती ने रेत और मिट्टी से शिवलिंग बनाकर निराहार और निर्जला रहकर कठोर तपस्या की थी। उनके इसी अनन्य प्रेम और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने सावन के बाद भादों शुक्ल तृतीया को उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। माना जाता है कि जो भी महिला इस दिन पूरी श्रद्धा से व्रत रखती है, उसे अखंड सुहाग का वरदान मिलता है।
पूजा विधि और इसके कड़े नियम
हरतालिका तीज (Hartalika Teej) की पूजा मुख्य रूप से मिट्टी के शिव परिवार की बनाकर की जाती है। इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के बाद नए लाल या पीले वस्त्र धारण करती हैं और पूर्ण सोलह श्रृंगार करती हैं। इसके बाद शाम को प्रदोष काल में या सुबह के शुभ मुहूर्त में काली मिट्टी या रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमाएं बनाई जाती हैं।
पूजा की चौकी पर सुहाग की पेटिका सजाई जाती है, जिसमें सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां और मेहंदी जैसी वस्तुएं माता पार्वती को अर्पित की जाती हैं। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनी जाती है और रात भर जागकर भजन-कीर्तन (जागरण) करने का विधान है।
इस व्रत के नियम बहुत कड़े होते हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य माना जाता है। चूंकि यह व्रत निर्जला होता है, इसलिए सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। इस दिन महिलाओं को भूलकर भी दिन के समय नहीं सोना चाहिए, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत के दिन सोने से व्रत खंडित हो जाता है।
मन में किसी भी प्रकार का क्रोध, लालच या किसी के प्रति द्वेष की भावना नहीं लानी चाहिए। व्रत का पारण अगले दिन यानी चतुर्थी तिथि को सुबह स्नान करने और भगवान शिव-पार्वती की प्रतिमाओं का विसर्जन करने के बाद ही किया जाता है।































