General Labh Singh history: 70 के दशक में पंजाब में आजादी की एक आवाज उठी थी, और उस आवाज को बुलंद करने वाले जनरैल सिंह भिंडरेवाला.. को भला कौन नहीं जानता.. भिंडरावाला की लगाई आग आज भी पंजाब को जला रही है..कुछ उसे सिखों का मसीहा मानते है तो वहीं कुछ सिख आतंकी.. लेकिन भिंडरावाला की हत्या के बाद पंजाब की दिशा और दशा दोनो में ही बड़ा बदलाव आया.. भिंडरावाला से प्रभावित होकर सैकड़ो सिखों ने खालिस्तानी आंदोलन को समर्थन दिया था, लेकिन क्या आप ये सोच सकते है कि क्या कोई ऐसा शख्स भी हो सकता है जो पहले पंजाब पुलिस का सिपाही बन कर पंजाब की रक्षा कर रहा हो और वो रक्षक बनने के बजाये आगे जाकर पंजाब की शांति का भक्षक बन जायें.. ये हजम करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन जनरल लाभ सिंह वो नाम है, जिसने न केवल पंजाब में हिंसा और अशांति फैलाई, बल्कि वो खालिस्तानी कमांडो फोर्स का जनरल भी बना..क्या था एक पुलिस अधिकारी की उग्रवादी बनने की कहानी.. जानेंगे सबकुछ डिटेल्स में..
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भिंडरांवाले के बाद कौन था जनरल लाभ सिंह?
27 अक्टूबर 1982.. पंजाब में निरंकारी आंदोलन भी काफी सक्रिय था.. ऐसे में भिंडरेवाला निरंकारियों के खिलाफ एक अलग आंदोलन चला रहा था, लेकिन इस आंदोलन में पेट्रोल डालने का काम किया होशियारपुर जिले के संत निरंकारी प्रमुख रेशम सिंह की हत्या ने.. जिसमें लाभ सिंह, सुरिंदर सिंह सोढ़ी और एक अन्य उग्रवादी शामिल था। ये तीनो की पुलिस के भेष में आये थे। 1978 में सिख निरंकारी संघर्ष के बाद अकाल तख्त ने निरंकारी समुदाय को सिख समुदाय से निष्कासित कर दिया था, जिसके बाद निरंकारी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, लेकिन इस संघर्ष में मारे गए 13 सिखों की मौत का बदला लेने के लिए ये खूनी खेल खेल गया.. इस हत्या के बाद सुरिंदर सिंह सोढी के अलावा जो नाम सबसे ज्यादा उछला वो था जनरल लाभ सिंह…
जनरल लाभ सिंह भिंडरेवाले के शार्प शूटर्स में से एक था.. सुखदेव सिंह ढिल्लों जिन्हें पंजाब में सुखा सिपाही के नाम से भी जाना जाता है..पंजाब के तरन तारण जिले के पंजवार गांव में साल 1952 को एक सिख परिवार में जन्मे जनरल लाभ सिंह के परिवार का दूर दूर तक अपराधिक गतिविधियों में कोई सहयोग नही थी.. पंजाब के ज्यादातर युवाओ की ही तरह सुखा ने भी बाबा बुद्धा साहिब कॉलेज से पढ़ाई पूरी कर 1971 में पंजाब पुलिस बल में शामिल होकर प्रशासनिक सेवा में लग गये.. लेकिन 80 के दशक में वो पूरी तरह से जनरैल सिंह भिंडलावाले के सिख उग्रवादी आंदोलन में हिस्सा लेने लगा.. खास 1978 की हिंसा के बाद तो लाभ सिंह का मकसद ही बदल गया। लाभ सिंह ने पंजाब पुलिस बल का अधिकारी रहते हुए ही रेशम सिंह की हत्या कर दी थी। लेकिन उसके बाद पीछे मुड़ने का कोई मतलब नहीं था।
पुलिस छोड़कर भिंडरावाले के साथ जुड़ना
बस फिर क्या था,मई 1983 लाभ सिंह ने पुलिस बल की नौकरी छोड़ दी और सक्रिय रूप से भिंडरावाले के खालिस्तानी आंदोलन के साथ जुड़ गया। जिसके बाद उसके क्राइम की दुनिया पर बाद्शाहत शुरु हुई। लेकिन नौकरी छोड़ने से ठीक एक महीने पहले 25 अप्रैल 1983 को पंजाब पुलिस के (डीआईजी) ए.एस. अटवाल पर स्वर्ण मंदिर से निकलते वक्त जानलेवा हमला हुआ, जिसमें उनकी मौत हो गई.. रिपोर्ट की माने तो लाभ सिंह ही डीआईजी की हत्या का मास्टरमाइंड था.. यानि की वर्दी पुलिस की और काम क्रिमिनल के.. इस हत्या के बाद भी जब तक पंजाब सीएम दरबारा सिंह ने खुद जनरैल सिंह भिंडरावाले से फोन करके शव उठाने की अनुमति नहीं मांगी तब तक डीआईजी का शव लावारिसो की तरह पड़ा ही रहा था।
भिंडरेवाले की शरण में आने के बाद तो जैसे लाभ सिंह के सिर पर खून सवार हो गया था, शामिल होते ही उसने 30 मई को 1983 को इंस्पेक्टर भगवान सिंह करियांवाला की हत्या कर दी.. क्योंकि भिंडलेवाले की नजरो में भगवान सिंह सिखों पर अत्याचार करने वाले प्रमुख अधिकारियों में से एक था। उसके बाद 15 अगस्त को इंस्पेक्टर गुरचरण सिंह संसी पर हमला, 26 सितंबर को एसएसपी) सुरजीत सिंह के सार्जेंट मक्खन सिंह की हत्या, 29 अक्टूबर सेवानिवृत्त डीएसपी गुरबचन सिंह उर्फ बचन सिंह पर जानलेवा हमला किया.. इन सभी हमलो का एक ही कारण था कि उग्रवादियों की नजरो में ये पुलिस वाले निर्दोष सिखों पर अत्याचार करते थे, उन्हें टॉर्चर किया करत थे। लेकिन 1984 में बहुत कुछ बदल गया.. 2 अप्रैल 1984 को लाभ सिंह ने सोढ़ी के साथ मिलकर अमृतसर में पूर्व विधायक और बीजेपी के तत्कालीन जिला अध्यक्ष हरबंस लाल खन्ना की उनकी दुकान में हत्या कर दी।
लेकिन इस हत्या ने सोढी और लाभ सिंह दोनो को हिट लिस्ट में ला दिया था, औऱ 14 अप्रैल 1984 को दो अज्ञात लोगो ने हत्या कर दी.. बाद में हत्या में शामिल एक महिला ने खुद भिंडरेवाले के सामने जाकर स्वीकारा किया था कि अकाली दल के महासचिव गुरचरण सिंह के कहने पर ही उसने और उसके प्रेमी सुरिंदर सिंह शिंदा ने सोढ़ी को मारा है, सोढ़ी को 7 गोलियां लगी थी, नतीजा भिंडरेवाले ने बदला लेने की कसम खाई और 24 घंटे के अंदर ही हत्यारे सुरिंदर सिंह शिंदा के 7 टुकड़े कर दिये गए थे।
आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए पैसे चाहिए थे, नतीजा लाभ सिंह ने अमृतसर के पंजाब एंड सिंध बैंक को लूटने की साजिश रची..औऱ 23 अप्रैल 1984 को 44,583 रूपय की लूटपाट की थी, जो आज के मुताबिक लगभग 6 लाख रूपय होंगे.. इस घटना के बाद ही 30 अप्रैल को डीएसपी गुरबचन सिंह की उनके परिवार समेत लाभ सिंह ने हत्या कर दी। जिसके बाद 12 मई 1984 को भिंडरेवाले के एक आलोचक, जिसने भिंडरेवाले के खिलाफ लिखा था कि उसने पंजाब को उग्रवाद का अड्डा बना दिया.. हिंद समाचार अखबार समूह के संपादक रमेश चंदर की हत्या करने में शामिल करने की बात सामने आई.. हालांकि उसकी जिम्मेदारी दशमेश रेजिमेंट ने ली थी। जून 1984 में जब ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ जब लाभ सिंह भी हरमंदिर साहिब गुरुद्वारे में मौजूद था, औऱ वो भिंडरेवाले के सिपाही की तरह लड़ रहा था, लेकिन ऑपरेशन के दौरान उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन पेशी के लिए अदालत ले जाते वक्त उसने और उसके साथियों ने पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी और फरार हो गया। फरार होने के बाद उसने लुधियाना के नेशनल बैंक से लगभग 57 मिलियन रूपय लूट लिये। 1984 में खालिस्तान कमांडो फोर्स के नेता मनबीर सिंह चहेरू के अचानक लापता होने के बाद लाभ सिंह अगला जनरल बना। उसने एक अंतरार्ष्ट्रीय खालिस्तानी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल से अच्छे संबंध बनाये और उसने केसीएफ को और मजबूत किया.. इस दौरान ऑपरेशन ब्लू स्टार की प्लानिंग करने वाले जनरल अरुण वैद्य की हत्या का साजिश रची और 10 अगस्त 1986 को सेवानिवृत हो चुके अरूण वैद्य की बाजार में हत्या कर दी.. इसमें मनबीर सिंह का नाम आया था, जिसे गिरफ्तार कर लिया गया था।
लेकिन उसकी गिरफ्तारी के बदले कई हत्यायें की, इतना ही नहीं केसीएफ ने 13 नीतियों वाली सिख नैतिक संहिता जारी की, जिसे सभी सिखों को मानना अनिवार्य किया, जिसे बेहद सख्ती से लागू किया गया.. इतना ही नहीं मानने वाले को जिंदा जलाने की चेतावनी दी गई.. उसके सभी कारनामों में सबसे भयानक था 76 यात्रियों से भरी हुई बस को पहले अगवा कर लूटा गया और उसमें मौजूद हिंदुओ पर गोलियां चलाई गई जिसमे 38 हिंदुओ की मौत हो गई बाकी घायल हो गए। लाभ सिंह ने न केवल हत्यायें की बल्कि उसने 6 से भी ज्यादा बैंको को लूटा, उसने पुलिस के मुखबिरो पर हमला किया.. उसके गुनाहों की लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती.. लेकिन पाप का अंत कभी न कभी होता ही है, जून 1988 में, पंथिक समिति ने लाभ सिंह को उच्च पुरोहित नियुक्त किया गया लेकिन उसके अगले ही महीने 12 जुलाई 1988 को होशियारपुर के टांडा में उसकी पुलिस से मुठभेड़ हुई जिसमें उसका अंत हो गया। लाभ सिंह ने भले ही तमाम हत्यायें की, लूटपाट की लेकिन खालिस्तानियों के लिए वो आज भी भगवान की तरह पूजा जाता है।





























