Bhai Dalla Historical Haveli: सिख धर्म के अनुयायी असल में वो अनुयायी है जहां न केवल सिख गुरुओ की एक एक धरोहर को सहेज कर रखते है, बल्कि गुरु साहिबानों ने जिन्हें सिक्खी की पाठ खुद पढ़ाया है, उन्हें भी पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है.. उन्ही में से एक है भाई दल्ला सिंह और उनकी ऐतिहासिक हवेली.. जो दसवे पातशाह गुरु गोबिंद सिंह की के सम्मान में खुद भाई दल्ला सिंह ने बनाया था.. जिन्हें खुद गुरु साहिब ने सिक्खी की पाठ पढ़ाया था औऱ वो उनका अहंकार दूर किया था। अपने इस लेख में हम भाई दल्ला की ऐतिहासिक हवेली के बारे में जानेंगे जहां आज भी गुरु साहिब से जुड़े कई ऐतिहासिक दुर्लभ चीजे मौजूद है, जो केवल इस बात का प्रतीक है कि गुरु साहिब के शरण में आने के बाद भाई दल्ला सिंह केवल गुरु के ही हो गए थे। जानते है उस ऐतिहासिक धरोहर की कहानी-
17वी सदी की बात है, गुरू साहिब अपने पूरे परिवार को मुगलो के हाथों खो चुके थे, लेकिन उनकी धर्म की रक्षा की लड़ाई अब भी जारी थी, इसी दौरान पंजाब के बठिंडा जिले के तलवंडी साबो में जमींदार सिद्धू जाट चौधरी भाई दल्ला सिंह या दल सिंह का शासन था। तलवंडी साबो में वो एक बेहद अमीर शख्स था, जिसके पास अपनी लाखों नीजि सेना थी,, पैसा, ताकत किसी चीज की कमी ही नहीं थी, जिस कारण वो अहंकार में भरने लगे। उसका अंहकार इतना उंचा था कि उसे अपने आगे हर कोई छोटा लगता था.. , श्री गुरु प्रताप सूरज ग्रंथ में गुरु साहिब और भाई दल्ला के बारे मे बताया गया है।
ग्रंथ के अनुसार 1706 की बात है, गुरु साहिब अपने अनुयायियो के साथ तलवंडी साहिब पहुंचे थे, भाई दल्ला को जब गुरु साहिब के आने का पता चला तो वो अपनी ताकत दिखाने के लिए खुद गुरु साहिब का स्वागत करने पहुंचे, जहां उन्होंने गुरु साहिब को काफी मंहगे उपहार भेंट किये और सेना की ताकत भी दिखाई, गुरुसाहिब पिछलेकई वर्षों से मुगलो और अफगानो से लड़ रहे थे, चौधरी दल्ला बात बात पर गुरु साहिब से अपनी सेना की शेखी बघारते हुए कहता कि अगर गुरु साहिब ने मुगलो और अफगानो के विरूद्ध उन्हें मदद के लिए बुलाया होता, तो वे अपने सेना के सभी वीर योद्धाओं के साथ उनके साथ शामिल हो जाते और गुरु को बहुत सी परेशानियों से मुक्ति मिल जाती.. या उन तक परेशानी आती ही नहीं। गुरु साहिब केवल मुस्कुरा देते थे, और कहते कि सब ईश्वर की इच्छा से हुआ है, अतीत पर चिंतन करना व्यर्थ है।
गुरु साहिब तो अंतरयामी थे उन्हें पहले ही पता था कि चौधरी दल्ला यहां उनकी सेवा करने नहीं बल्कि अपनी यश दिखाने आया है। खासकर चौधरी दल्ला सिंह अपने जाटों की सेना को सिख सेना से हमेशा मजबूत बताते थे, बस फिर क्या था गुरु साहिब ने चौधरी दल्ला की परिक्षा लेने का फैसला किया। गुरु साहिब से मिलने के लिए लाहौर के दो कारीगर आये थे, जो गुरु साहिब से प्रभावित हो कर उन्हें तोंपे भेंट की थी.. अब बारी थी कि तोपों की जांच की जायें.. गुरु साहिब ने कहा कि भाई दल्ला सिंह , तुम अपने कुछ आदमियों को तोपो के सामने खड़ा कर दो, ताकि तोपो की जांच भी हो जायें और तुम्हारी सेना की बहादुरी का पता भी चल जायेगा। ये सुनने के बाद भाई दल्ला सिंह और उनकी सेना घबरा गई.. कोई आगे नहीं आया, तब गुरु साहिब ने अपने कैंप में पगड़ी बांध रहे दो रंगरेता सिखों को बुलाया.. जो कि पिता और पुत्र थे।
वो दोनो पगड़ी को पकड़े हुए ही गुरु साहिब की तरफ तेज गति से भागते हुए आने लगे.. उनकी रेस थी कि कौन पहले तोप के सामने खड़े होगा, औऱ गुरू साहिब के काम आयेगा.. जब भाई दल्ला सिंह ने सिख सैनिकों का समर्पण औऱ बल्दान देखा तो वो दंग रह गया। उसे समझ आया कि क्यों गुरु साहिब ने अपने चंद सिख सैनिकों पर भरोसा किया था, लेकिन भाई दल्ला की सेना को नहीं बुलाया। उसका सिर शर्म से झुक गया और वो गुरु साहिब के चरणों में गिर कर अपनी गलतियों की माफी मांगने लगा। उसने खालसा को अपना लिया और अमृत चख कर गुरु साहिब का सच्चा अनुयायी बन गया, औऱ गुरु साहिब ने उन्हें नाम दिया भाई दल सिंह।
खालसा अपनाते वक्त गुरु साहिब ने उन्हें तलवार, ढाल, वस्त्र समेत कुछ अन्य वस्तुएं भी दी थी। वहीं गुरु साहिब से जुड़े कुछ अवशष जिसमें पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की एक छोटी प्रतिकृति, मुक्तसर की लड़ाई के बाद गुरु गोविंद सिंह जी के निजी वस्त्र और अरबी शिलालेख वाली एक ऐतिहासिक तेघा (तलवार) भी भाई दल्ला सिंह के पास मौजूद थे, जिन्हें संरचित करने के लिए भल्ला दल्ला सिंह ने तलवंडी साबो में भाई दल्ला सिंह ऐतिहासिक भवन बनवाया था जो आज के समय में एक ऐतिहासिक संग्रहालय भी है। पहले ये हवेली भाई दल्ला सिंह का निवास स्थान हुआ करता था, लेकिन इसे अब गुरु साहिब और भाई दल्ला सिंह के सम्मान में संग्रहालय बना दिया हया है। जो आज भी सिख गुरु की महान शक्ति के प्रतीक के रूप में खड़ा है।






























