Ravi Pradosh Vrat: साल 2026 का यह रवि प्रदोष व्रत अपने साथ एक बेहद दुर्लभ संयोग लेकर आ रहा है। आखिर रवि प्रदोष का क्या महत्व है, इसके नियम क्या हैं और पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त कौन सा है? साथ ही इस व्रत को करने से भक्तों को क्या लाभ मिलते हैं, चलिए इस लेख में सब कुछ जानते हैं।
एक व्रत से तीन गुना फायदे का महासंयोग
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर व्रत रखने और महादेव की आराधना करने से भक्तों को एक साथ तीन बड़े लाभ मिलते हैं। प्रदोष काल (Ravi Pradosh Vrat) में शिव जी की पूजा करने से सभी प्रकार के कष्ट, पाप और रोग दूर होते हैं। वहीं, इसी दिन मासिक शिवरात्रि होने की वजह से भक्तों को शिव-शक्ति की संयुक्त कृपा मिलती है, जिससे दांपत्य जीवन में मधुरता और सुख-समृद्धि आती है। इसके अलावा, रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित होने के कारण इस दिन व्रत रखने से कुंडली में सूर्य मजबूत होता है। इससे समाज में मान-सम्मान, यश, उच्च पद और राजयोग की प्राप्ति होती है।
Ravi Pradosh Vrat का शुभ मुहूर्त और तिथियों का समय
रवि प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा हमेशा सूर्यास्त के समय यानी प्रदोष काल में की जाती है। इस दिन का शुभ मुहूर्त और समय कुछ इस प्रकार है:
- त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 12 जुलाई 2026 को प्रातः 02:04 बजे से
- त्रयोदशी तिथि समाप्त: 12 जुलाई 2026 को रात्रि 10:29 बजे तक
- प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 07:22 बजे से रात्रि 09:24 बजे तक (अवधि: 2 घंटे 2 मिनट)
- मासिक शिवरात्रि निशिता काल मुहूर्त: रात्रि 12:07 बजे से रात्रि 12:48 बजे तक (13 जुलाई की रात)
प्रदोष काल में कैसे करें पूजा
मान्यताओं के मुताबिक, प्रदोष व्रत (Ravi Pradosh Vrat) का पूरा फल तभी मिलता है जब इसकी मुख्य पूजा शाम के समय यानी प्रदोष काल में की जाए। इस दिन पूजा की सबसे सरल और उत्तम विधि इस प्रकार है, बता दें कि सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। चूंकि यह रविवार का दिन है, इसलिए तांबे के लोटे में जल, रोली और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य अवश्य दें। उसके बाद प्रदोष काल का मुहूर्त शुरू होने से ठीक पहले (शाम 07:22 बजे से पहले) दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ सफेद/पीले वस्त्र धारण करें।
साथ ही सबसे पहले शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाएं। इसके बाद कच्चा दूध, दही, शहद, घी और शक्कर (पंचामृत) से भोलेनाथ का अभिषेक करें। इसके बाद शिव जी को चंदन का तिलक लगाएं और उनकी प्रिय चीजें जैसे बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और सफेद फूल अर्पित करें। माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री चढ़ाएं। और भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाएं।
इसके बाद शांत मन से “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें और रवि प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। पूजा के अंत में शिव जी और माता पार्वती की आरती करें। पूजा संपन्न होने के बाद घर के मुख्य द्वार पर भी एक दीपक जलाएं और फिर सात्विक या फलाहारी भोजन ग्रहण करके अपना व्रत खोलें।































