Old Clothes Recycling: भारत के लगभग हर शहर, कस्बे और गांव में एक आवाज अक्सर सुनाई देती है—”पुराने कपड़े दे दो… बदले में बर्तन ले लो।” यह दृश्य दशकों से हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहा है। घरों में रखे पुराने कपड़ों के बदले लोग स्टील की थाली, कटोरी, बाल्टी, डिब्बा या दूसरे घरेलू सामान ले लेते हैं। ज्यादातर लोगों के मन में कभी न कभी यह सवाल जरूर आता है कि आखिर घर से निकलने के बाद इन कपड़ों का क्या होता है? क्या इन्हें सीधे कूड़े में फेंक दिया जाता है या फिर इनका कोई दूसरा इस्तेमाल होता है? असलियत यह है कि पुराने कपड़ों के पीछे एक बड़ा बिज़नेस और पूरी सप्लाई चेन है, जो न सिर्फ़ लाखों लोगों को रोज़गार देती है, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाती है।
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घर-घर से कपड़े इकट्ठा करने के बाद शुरू होती है असली प्रक्रिया| Old Clothes Recycling
पुराने कपड़े इकट्ठा करने वाली महिलाएं या फेरीवाले इन्हें लंबे समय तक अपने पास नहीं रखते। वे इन्हें स्थानीय थोक व्यापारियों, गोदामों या बड़े कपड़ा कारोबारियों को बेच देते हैं। इसके बाद इन कपड़ों की बारीकी से छंटाई की जाती है। अच्छी हालत वाले कपड़ों को अलग रखा जाता है, हल्के-फुल्के खराब कपड़ों को दूसरी श्रेणी में रखा जाता है, जबकि पूरी तरह फटे या घिस चुके कपड़ों को अलग कर दिया जाता है। आगे इनका इस्तेमाल किस काम में होगा, यह पूरी तरह उनकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
अच्छी क्वालिटी के कपड़े फिर पहुंच जाते हैं बाजार
जो कपड़े अभी भी पहनने लायक होते हैं, उन्हें साफ किया जाता है और जरूरत पड़ने पर मामूली मरम्मत भी की जाती है। इसके बाद उन्हें सेकेंड हैंड बाजारों में बेच दिया जाता है। देश के कई शहरों में ऐसे बाजार हैं, जहां बेहद कम कीमत पर अच्छी गुणवत्ता के कपड़े मिल जाते हैं। कम आय वाले परिवार, मजदूर, छात्र और जरूरतमंद लोग इन बाजारों से खरीदारी करते हैं। कई बार विदेशों से आने वाले सेकेंड हैंड कपड़े भी इसी तरह के बाजारों में बिकते हैं। इस तरह एक ही कपड़ा कई लोगों की जरूरत पूरी करता है और उसका उपयोग लंबे समय तक होता रहता है।
जो कपड़े पहनने लायक नहीं बचते, उनसे बनते हैं नए धागे
पूरी तरह खराब हो चुके कपड़ों को भी बेकार नहीं माना जाता। इन्हें टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग यूनिट में भेजा जाता है, जहां मशीनों की मदद से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इसके बाद इनसे फाइबर यानी रेशे अलग किए जाते हैं। सफाई और प्रोसेसिंग के बाद इन्हीं रेशों से दोबारा धागा तैयार किया जाता है। यही धागा आगे कई नए उत्पाद बनाने में इस्तेमाल होता है। इस प्रक्रिया से कपड़ा कचरे की मात्रा काफी कम हो जाती है और पुराने कपड़ों को नई उपयोगिता मिल जाती है।
दरी, कालीन से लेकर पोछा और गद्दों तक बनते हैं कई उत्पाद
रीसाइक्लिंग से तैयार धागों का इस्तेमाल सिर्फ दरी या कालीन बनाने तक सीमित नहीं रहता। इनसे पोछा, कंबल, गद्दों की भराई, कुशन, सफाई वाले कपड़े और कई तरह के औद्योगिक उत्पाद भी बनाए जाते हैं। कुछ उद्योग इन रेशों का उपयोग पैकिंग मटेरियल और इंसुलेशन तैयार करने में भी करते हैं। यानी जो कपड़ा दोबारा पहनने लायक नहीं रहता, वह किसी न किसी दूसरे रूप में फिर लोगों के काम आने लगता है।
हर तरह के कपड़ों की रीसाइक्लिंग आसान नहीं होती
विशेषज्ञों के अनुसार, कॉटन, ऊन और अन्य प्राकृतिक रेशों वाले कपड़ों को दोबारा धागे में बदलना अपेक्षाकृत आसान होता है। वहीं पॉलिएस्टर, नायलॉन और मिक्स फैब्रिक वाले कपड़ों की रीसाइक्लिंग ज्यादा जटिल होती है। ऐसे कपड़ों को अलग-अलग तकनीकों और आधुनिक मशीनों की मदद से प्रोसेस किया जाता है। टेक्सटाइल उद्योग लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहा है ताकि अधिक से अधिक कपड़ों को दोबारा उपयोग में लाया जा सके।
ऑटोमोबाइल और फर्नीचर इंडस्ट्री में भी होती है मांग
रीसाइक्लिंग से तैयार फाइबर का इस्तेमाल सिर्फ घरेलू सामान तक सीमित नहीं है। ऑटोमोबाइल उद्योग में कारों की सीटों की फिलिंग, फर्नीचर कंपनियों में कुशन और गद्दों की भराई, पैकिंग मटेरियल और कई औद्योगिक उत्पादों में भी इन रेशों का उपयोग किया जाता है। इससे नए कच्चे माल की जरूरत कम होती है और उत्पादन लागत घटाने में भी मदद मिलती है। यही वजह है कि पुराने कपड़ों की मांग सिर्फ सेकेंड हैंड बाजार तक सीमित नहीं रहती।
पर्यावरण संरक्षण में निभा रही अहम भूमिका
हर साल दुनिया भर में करोड़ों टन पुराने कपड़े कचरे के रूप में निकलते हैं। यदि इन्हें सीधे लैंडफिल में फेंक दिया जाए तो प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ जमीन पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है। वहीं कपड़ों का दोबारा उपयोग और रीसाइक्लिंग करने से नए कपड़े बनाने के लिए कम पानी, कम ऊर्जा और कम कच्चे माल की जरूरत पड़ती है। इससे कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ भी कपड़ों की रीसाइक्लिंग को टिकाऊ जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानते हैं।
लाखों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया बना यह कारोबार
पुराने कपड़ों का यह कारोबार सिर्फ कपड़े खरीदने और बेचने तक सीमित नहीं है। इसमें घर-घर जाकर कपड़े इकट्ठा करने वाले लोग, थोक व्यापारी, छंटाई करने वाले कर्मचारी, सेकेंड हैंड बाजार के दुकानदार, रीसाइक्लिंग फैक्ट्रियों के कर्मचारी और दरी-कालीन बनाने वाले कारीगर तक शामिल हैं। इस पूरी सप्लाई चेन से लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। भारत में भी टेक्सटाइल वेस्ट कम करने और कपड़ों की रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए लगातार नई पहल की जा रही हैं।
पुराने कपड़े खत्म नहीं होते, नई पहचान के साथ लौटते हैं
जब आप पुराने कपड़ों के बदले बर्तन लेते हैं, तो यह सिर्फ एक साधारण लेन-देन नहीं होता। इसके पीछे एक बड़ा और व्यवस्थित तंत्र काम करता है। अच्छी स्थिति वाले कपड़े किसी जरूरतमंद तक पहुंच जाते हैं, जबकि खराब कपड़ों से नए धागे बनाकर दरी, कालीन, कंबल, पोछा, कुशन और कई अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यानी आपके पुराने कपड़े कूड़े का हिस्सा बनने के बजाय नई जिंदगी पाकर फिर किसी न किसी रूप में लोगों के काम आते रहते हैं। यही वजह है कि आज पुराने कपड़ों की रीसाइक्लिंग को रोजगार, संसाधन बचत और पर्यावरण संरक्षण … तीनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
































