Punjab peace: अप्रैल 2026 में पंजाब के सीएम भगवंत मान ने जागृत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार संशोधन अधिनियम, 2026 को पेश किया था, इस अधिनियम को लागू करने के पीछे का मुख्य कारण था उन लोगों पर शिकंजा कसना जो धर्म-अपमान और पंजाब की मूलभूत शिक्षाओ का अपमान करते है, उन पर शिकंजा कसा जा सकें वहीं इस कानून के जरिय पंजाब में शांति और सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा की जा सकेगी। हालांकि ये कदम भी पंजाब की उस आंतरिक अशांति को नहीं रोक सकता है जिसका आग में पिछले 50 सालों से पंजाब जल रहा है। लेकिन सवाल ये है कि इस आग के फैलने से, अगर पंजाब की शांति भंग होती है तो सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा।
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पंजाब की शांति भंग होने से किसे फायदा?
पंजाब की अशांति से सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा उसे जानने के लिए सबसे पहले हमें 80 के दशक में जाना होगा। पंजाब का पहले ही हरियाणा और हिमाचल प्रदेश नाम से दो भूखंड अलग करके बंटवारा किया जा चुका था। नतीजा पंजाब का बचा हुआ हिस्सा अब सिख बहुल आबादी वाला हो गया था। लेकिन तब भी पंजाब में अलगाववाद नहीं था, मगर 1978 में पहली बार सामने आया एक शख्स जिसने न केवल जीते जी बल्कि मरने के बाद भी आज तक पंजाब में अलगाववाद की आग को हवा दे रखी है।
रूढ़िवादी सिख धार्मिक संस्था
ये शख्स था जरनैलसिंह भिंडरावाले.. रूढ़िवादी सिख धार्मिक संस्था दमदमी टकसाल के चौदहवें जत्थेदार बनने के बाद साल 1973 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव लाया गया, जिसे पंजाब की एक प्रमुख सिख राजनीतिक दल, शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ले आई थी, इस प्रस्ताव का उद्देश्य सिख धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार करना, एक स्वतंत्र धार्मिक पहचान बनाए रखना और अधर्म का विरोध करना था। जिसका केंद्र था शिक्षा समर्थक, नशा विरोधी, गरीबी विरोधी और जाति-विरोधी उद्देश्यों को पूरा करना..इसी के साथ सिख इतिहास पर शोध में वृद्धि और पाकिस्तान में सिख स्थलों तक बेहतर पहुंच बनाना भी लक्ष्य रखा गया था। सब कुछ ठीक था, लेकिन बाद में इसमें मांग की गई कि केंद्र सरकार केवल रक्षा, विदेश मामलों, डाक और तार, मुद्रा और रेलवे के मुद्दों में पंजाब में हस्तक्षेप कर सकता था बाकि के मुद्दों की जिम्मेदारी पंजाब के सरकार पर होगी।
संत निरंकारी मिशन और दमदमी टकसाल के बीच मदभेद
लेकिन 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और अकाली के कई नेताओं को पकड़ लिया गया., जिससे वो कुछ समय के लिए शांत हो गए और बस यहीं ये खेल बदल गया। संत निरंकारी मिशन और दमदमी टकसाल तथा अखंड कीर्तनी जत्था के लोगो को अपना वर्चस्व बढ़ाने का मौका मिला.. मगर दोनो के बीच के वैचारिक मतभेद के कारण 13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में संत निरंकारी मिशन और दमदमी टकसाल तथा अखंड कीर्तनी जत्था के सिखों के बीच एक हिंसक झड़प हो गई, जिसमें 16 लोगो की मौत हो गई थी वहीं भिंडरेवाला के समर्थको को लगने लगा था कि अकाली दल मिशन के लोगो के प्रति कुछ नरम है, और अकालियों को चुप करा कर पीछे किया जा रहा है।
बस फिर क्या था 1978 के लुधियाना सम्मेलन को भिंडरावाले के समर्थको ने बाधित कर दिया.. वहीं अकाली दल जो जनता दल का समर्थन कर रहे थे, खालसा मुक्ति फौज नामक एक संगठन ने दोनो को निशाना बनाया और “सिख राज्य” के गठन का आह्वान किया था, इस संगठन को कांग्रेस से समर्थन प्राप्त माना गया था। लेकिन जब 1980 में कांग्रेस की सत्ता फिर से आई तब 1982 में कांग्रेस के खिलाफ भिंडरांवाले और अकाली दल ने धर्म युद्ध मोर्चा (“धार्मिक अभियान”) शुरू किया, जिसका उद्देश्य स्वायत्त राज्य बनाने, चंडीगड़ को पंजाब का हिस्सा बनाने जैसी मांगो के साथ अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अपना मुख्यालय स्थापित किया था।
उसने “समानांतर सरकार” स्थापित करके एक अलग शासन व्यवस्था को शुरु कर दिया था। जिसे बाद 1983 में सिख तीर्थस्थल अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया, वहीं हिंदू समुदाय द्वारा सिख मूल्यों पर कथित ‘हमले'” पर आधारित बयानबाजी भी तेज हो गई, भिंडरांवाले के संदेश को शिक्षित ग्रामीण सिखों ने ज्यादा अपनाया जो हरित क्रांति के कारण आर्थिक रूप से पीड़ित थे। हिरत क्रांति ने कृषि विकास तो किया लेकिन इसके कारण औद्योगिक क्षेत्र अवरूद्ध हो गया और उससे दोनो के के बीच असमानता पैदा हो गई जिसके कारण पंजाब में बेरोजगारी बढ़ने लगी..
इस दौरान सिखों की अलग पहचान की मांग भी तेज हो गई.. हालांकि इस बात में को दो राय नहीं है कि भिंडरांवाले ने कभी भी खालिस्तान या भारत से अलग होने का समर्थन नहीं किया था, औऱ न ही वो खालिस्तान जैसी कोई प्रांत चाहते थे, वो बस सिखों के लिए अलग पहचान की मांग कर रहा था। लेकिन भिंडरावाले ने 27 मार्च 1983 को दिल्ली में अपने भाषण में कहा था कि सिख इक वखरी कौम है ” यानि कि “सिख धर्म एक अलग राष्ट्र है, और अगर मुझे खालिस्तान दिया जाता है तो मैं उससे इंकार नहीं करूंगा, न तो मैं उसका समर्थन करता हूं और न ही उसके खिलाफ हूं। बस मेरा मुद्दा ये है कि क्या देश की पीएम सिखों को भारत का हिस्सा मानती है। हालांकि हम तो भारत का ही हिस्सा बन कर रहना चाहते है। लेकिन अगर भारत सरकार र दरबार साहिब परिसर पर हमला करती है तो वो खुद ही एक स्वतंत्र सिख राष्ट्र की नींव होगी।
हालांकि 1984 में भारतीय खुफिया एजेंसी ने एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें ये कहा गया था कि जरनैल सिंह भिंडरावाले पाकिस्तान के पोषण और उसके समर्थन से किसी भी वक्त खालिस्तान को एक स्वतंत्र देश घोषित करने की योजना बना रहा था.. जिसमें पंजाब के पुलिस और सुरक्षा कर्मियों का भी उसे समर्थन मिल रहा था। हालांकि इस बात में अब भी दो मत है। मगर भिंडरावाले की हत्या के बाद खालिस्तान की मांग तेज हो गई। पंजाब में अराजकता फैलाने के लिए नशे का खेल शुरु हुआ, जिसे पाकिस्तान से ही पोषित किया गया।
यानि की ये तो तय है कि अगर पंजाब की शांति भंग होती है तो सबसे ज्यादा फायदा पाकिस्तान और दुश्मन खुफिया एजेंसी को होगा, जो भारत में संघर्ष, सीमा पार तस्करी और अलगाववादी आंदोलनों को भारत में पोषित कर रहे है। वहीं इससे पंजाब का औधोगिक विकास नष्ट होगा, आर्थिक निवेश पंजाब से चला दूर होगा, बेरोजगारी होगी.. जिससे यहां के युवाओं में अशांति बढ़ेगी, और उन्हें बहकाना आसान होगा। इसता सीधा असर भारत की आंतरिक शांति पर होगा, शायद इसी लिए बीच बीच में खालिस्तान बनाने की मांग को हवा दे दी जाती है। मगर इतने साल बीत जाने के बाद ये तो साफ हो गया है कि 95 प्रतिशत सिख केवल एक शांत भारत चाहते है। कोई खालिस्तान नहीं, कोई अलग देश नहीं।






























