Falta seat Election: पश्चिम बंगाल की सियासत में डायमंड हार्बर हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और हाई-वोल्टेज इलाका माना जाता रहा है। लेकिन इस समय जो सबसे ज्यादा सुर्खियों में है, वह है इसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला फालता विधानसभा क्षेत्र। चुनावी हिंसा के आरोपों के बाद चुनाव आयोग ने 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द कर दिया था और अब यहां 21 मई को दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया गया है। इसी वजह से पूरे इलाके में राजनीतिक माहौल चरम पर पहुंच चुका है।
आखिरी 48 घंटे में बढ़ा सियासी तापमान| Falta seat Election
फालता सीट पर अब सिर्फ 48 घंटे का चुनावी प्रचार बचा है और इन आखिरी दिनों में सियासी पारा सातवें आसमान पर है। हर पार्टी अपनी पूरी ताकत झोंक रही है। इस बार मुकाबले के केंद्र में टीएमसी के कद्दावर नेता जहांगीर खान हैं, जिनके इर्द-गिर्द पूरे इलाके का राजनीतिक समीकरण घूमता नजर आ रहा है। जहांगीर खान लंबे समय से इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता माने जाते रहे हैं। लेकिन बदलते राजनीतिक हालात और सत्ता समीकरण ने इस बार मुकाबले को काफी दिलचस्प बना दिया है। टीएमसी का यह 15 साल पुराना गढ़ अब बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है, जो हर हाल में यहां जीत दर्ज करना चाहती है।
‘सिंघम’ बनाम ‘पुष्पा’ का अनोखा चुनावी टकराव
इस बार फालता का चुनाव किसी आम राजनीतिक लड़ाई जैसा नहीं बल्कि किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा बन गया है। चुनाव आयोग ने सुरक्षा और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात किया है, जिन्हें ‘सिंघम’ की छवि के लिए जाना जाता है। वहीं दूसरी तरफ टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने भी चुनावी मंच से खुद को अलग अंदाज में पेश किया। एक जनसभा में उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था, “अगर तुम सिंघम हो, तो मैं पुष्पा हूं… पुष्पराज, झुकेगा नहीं।” इस बयान के बाद इलाके में राजनीतिक माहौल और ज्यादा गर्म हो गया।
अंडरग्राउंड से वापसी तक का सफर
कुछ समय पहले तक जहांगीर खान के बारे में यह चर्चा थी कि वे चुनावी माहौल से गायब हैं या अंडरग्राउंड हो गए हैं। लेकिन चुनाव आयोग के निर्देश और सुरक्षा व्यवस्था के बाद वे वापस फालता लौट आए हैं और अब पुलिस सुरक्षा के बीच जोरदार प्रचार कर रहे हैं।
फालता सीट का ऐतिहासिक सियासी गणित
फालता विधानसभा सीट दक्षिण 24 परगना जिले में आती है और इसे टीएमसी और खासकर अभिषेक बनर्जी का मजबूत गढ़ माना जाता है। आजादी के बाद से अब तक इस सीट पर 17 बार चुनाव हो चुके हैं और इस बार यह 18वां विधानसभा चुनाव है। इतिहास पर नजर डालें तो यह सीट लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ रही है। 1952 से 2006 तक लेफ्ट ने यहां नौ बार जीत दर्ज की। कांग्रेस चार बार और टीएमसी भी चार बार इस सीट पर जीत हासिल कर चुकी है। 2011 के बाद से यहां टीएमसी का दबदबा कायम है और 2021 में पार्टी ने करीब 40 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी।
बीजेपी का नया दांव और देवांग्शु पांडा की चुनौती
इस बार मुख्य मुकाबला टीएमसी के जहांगीर खान और बीजेपी के देवांग्शु पांडा के बीच है। देवांग्शु पांडा पेशे से वकील हैं और इस चुनाव में टीएमसी के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। केंद्रीय बलों की भारी तैनाती के चलते इस बार फर्जी वोटिंग और बूथ कैप्चरिंग जैसी शिकायतों की संभावना काफी कम मानी जा रही है, जो बीजेपी के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
शुभेंदु अधिकारी ने संभाली कमान
राजनीतिक तौर पर बड़ी जीत के बाद मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी ने खुद इस सीट की कमान संभाल ली है। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार देवांग्शु पांडा के समर्थन में बड़ी रैली की और सीधे जहांगीर खान पर निशाना साधा। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि जो खुद को ‘पुष्पा’ कहता है, उसकी जिम्मेदारी अब उन्होंने ले ली है। उन्होंने जनता से अपील की कि इस बार बिना किसी डर के मतदान करें और बीजेपी को भारी बहुमत से जिताएं।
वोट बैंक की लड़ाई और बदलता समीकरण
फालता सीट का सबसे अहम पहलू यहां का सामाजिक समीकरण है। मुस्लिम और दलित मतदाता इस इलाके में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अब तक यह वोट बैंक ज्यादातर टीएमसी के पक्ष में रहा है। जहांगीर खान इसी भरोसे पर अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। वहीं बीजेपी दलित और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के सहारे अपनी जीत की रणनीति बना रही है।
आखिरी 48 घंटे में आर-पार की लड़ाई
अब प्रचार के आखिरी 48 घंटे बेहद अहम हो गए हैं। एक तरफ जहांगीर खान अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए घर-घर जाकर समर्थन मांग रहे हैं और सहानुभूति का कार्ड खेल रहे हैं। वहीं बीजेपी इस पुनर्मतदान को “आतंक से मुक्ति” के रूप में पेश कर रही है।
फालता का यह चुनाव अब सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि इसे बंगाल की बदलती राजनीति का बड़ा लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। 21 मई को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि क्या इस इलाके में सत्ता का समीकरण बदलता है या फिर टीएमसी का पुराना किला एक बार फिर कायम रहता है।





























