History of Chappar Chiri: पंजाब में सिख साम्राज्य की स्थापना का श्रेय शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत को जाता है लेकिन क्या आप ये जानते है कि सिख साम्राज्य की स्थापना से पहले पंजाब में पहली बार सिखो का राज स्थापित करने की नींव किसने रखी थी। कौन था वो शख्स जिसने पंजाब में कई दशकों से राज कर रहे मुगलों को धूल चटाई और मुगलों को पंजाब की सीमा से बहद खदेड़ दिया था। लेकिन ये नींव यूंही नहीं रखी गई थी, उसके लिए पंजाब की माटी ने एक ऐसे सपूत को जन्म दिया था, जिसने अंतिम सांस तक सिख धर्म की गरिमा बनाए रखा।
सिख साम्राज्य की स्थापना का नींव बना था चप्पर चिड़ी का वो ऐतिहासिक युद्ध जिसके बाद पंजाब की धरती पर पहली बार सिखो का शासन स्थापित हो गया।.. अपने इस लेख में हम जानेंगे इस युद्ध की, वीर सपूत बंदा सिंह बहादुर और उनकी बहादुरी को सम्मान देता ऐतिहासिक फतेह बुर्ज की कहानी… कैसे आज भी ये बंदा सिंह बहादुर की वीरता के रूप में खड़ा है जो सिखों की शान बढ़ा रहा है।
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बाबा बंदा सिंह बहादुर का इतिहास
बंदा सिंह बहादुर जिनके बचपन का नाम लक्ष्मणदेव मिन्हास था लेकिन वैरागी बनने के बाद माधव दास वैरागी पड़ा था, जो गृहस्थ या किसी वीर का जीवन नहीं बल्कि एक वैरागी का जीवन जीना चाहते थे, उसके लिए उन्होंने मात्र 15 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था, औऱ गोदावरी नदी के किनारे अपनी कुटिया बना कर साधना करते थे, लेकिन 1708 में जब दसवें गुरु साहिब गुरू गोबिंद सिंह जी दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान नांदेड़ पहुंचे तो पहली बार उनकी मुलाकात बंदा सिंह बहादुर से हुई थी। यहां गुरु साहिब से प्रभावित होकर उन्होंने खुद को गुरू का बंदा कहना शुरु कर दिया था, लेकिन यहीं से उनकी जिंदगी की दिशा भी बदल गई। गुरु साहिब ने उन्हें समझाया कि वो वैरागी बनने के लिए नहीं बल्कि खालसा के एक बहादुर सिपाही बनने के लिए है.. गुरु साहिब ने उनका वैराग्य छुड़ा कर उन्हें अमृत चखाया और नाम दिया सरदार गुरबक्श सिंह।
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पंजाब की धरती को मुगलो से आजाद कराया
हालांकि इससे पहले कि वो अपने गुरु साहिब के साथ ज्यादा समय बिता पाते, उससे पहले ही एक हमले के कारण गुरु साहिब 1708 में सचखंड चले गए…लेकिन गुरु का बंदा अब तय कर चुका था कि वो न केवल साहिबजादो का बदला लेगा बल्कि पंजाब की धरती को मुगलो से आजाद करा कर दी हम लेगा। उनकी बहादुरी और रण कौशल ऐसा था कि मुगल भी इसे अनदेखा न कर पायें थे। 1710 में बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद पर जीत हासिल की और सतलुज नदी के दक्षिण में पहली सिक्ख राज्य स्थापित किया। उन्होंने ख़ालसा के नाम से शासन भी किया और गुरु नानक देव और गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम के सिक्के चलवाये।
उन्होंने धीरे धीरे पंजाब के उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़े स्थानों के साथ साथ लाहौर और अमृतसर की सीमा तक खालसा को बढ़ाया था। बंदा सिंह बहादुर ने ही पहला स्वतंत्र और संप्रभु राज्य स्थापित किया था। ‘सियारुल-मुताखेरीन के लेखक मोहम्मद अमीन खान ने एक बार बंदा सिंह बहादुर से पूछा था कि वो मुगलो को अपना दुश्मन क्यों मानते है औऱ क्यों वो मुगलो के खिलाफ युद्ध लड़ रहे है.. जबकि मुगल इतने ताकतवर है। जिस पर उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म और किसी भी देश में जब लोग भ्रष्ट, निरंकुश और अत्याचारी हो जाते हैं तब ईश्वर उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए औऱ सबक सिखाने के लिए उनके जैसे दूत को भेजता है। मुगल भी वैसे ही है।
जब साहिबजादो की मौत का लिया बदला
1708 में दसवें गुरु के सचखंड जाने के बाद 1709 में पहली सिख सम्राज्य की स्थापना की नीव सरहिंद में रखी थी, औऱ उनका पहला मिशन था साहिबजादों की हत्या का बदला लेना,.. इसके लिए गुरु साहिब ने सरहिंद में मौजूद मुगलो के सेनापति वजीर खान को चुनौती दी औऱ 12 मई 1710 में पंजाब के मोहाली में स्थित चप्पर चिड़ी नाम की जगह पर बाबा बंदा सिंह बहादुर की सेना और वजीर खान की सेना का भीषण युद्ध हुआ.. इस युद्ध में वजीर खान मारा गया और बाबा बंदा सिंह बहादुर ने छोटे साहिबजादों की मौत का बदला ले लिया था। उसके बाद ही सरहिंद पर सही मायने में सिखों का शासन स्थापित हुआ।
बहादुरी का प्रतीक फतेह बुर्ज
बाबा बंदा सिंह बहादुर और उनकी छोटी से सेना ने जिस तरह से बहादुरी का परचम लहराया, उसकी याद में चप्पर चिड़ी में 328 फीट का फतेह बुर्ज यानि की विजय मीनार बनवाई गई है। ये बुर्ज भारत का सबसे उंचा विजय मीनार है। इस स्मारक को साल 2011 में बनवाया गया है, जो कि तीन अलग अलग मंजिल की है, ये तीनो मंजिले बाबा की तीन विजय को दर्शाती है, जिसमें पहली समाना की विजय, दूसरी सधाउरा की औऱ तीसरी सरहिंद की विजय का प्रतीक है। वहीं इसके शीर्ष में एक खंडा लगाया गया है..जो कि इस ऐतिहासिक धरोहर को सिख धर्म की वीरता से जोड़ता है।
इतना ही नहीं इस स्मारक के पास एक संग्रहालय भी मौजूद है, जिसमें बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ साथ पांच वीर सिख जनरल की भी प्रतिमायें है। जिसमें बाबा फतेह सिंह जी, भाई बाज सिंह जी, भाई माली सिंह, भाई आली सिंह और भाई राम सिंह जी.. की प्रतिमायें स्थापित की गई है। जो बंदा सिंह बहादुर के साथ अपनी बाहुदुरी से मुगलो के छक्के छुड़ाने में कभी पीछे नहीं हटे। वहीं इस बुर्ज की दूसरी तरफ एक स्टेडियम है। जहां अक्सर सिख धर्म से जुड़े कार्यक्रम होते है।
1716 में बादशाह फ़र्रुख़सियर की शाही फ़ौज ने कश्मीर के शासक अब्दुल समद ख़ाँ के साथ मिलकर गुरुदासपुर ज़िले के धारीवाल क्षेत्र में मौजूद गुरुदास नंगल गाँव को घेर लिया था, जहां बंदा सिंह बहादुर भी मौजूद थे। करीब 8 महीनो तक वो यहीं रहे थे लेकिन अंत में अनाज की कमी के कारण उन्होंने 7 दिसम्बर 1715 में आत्मसमर्पन कर दिया था, फिर उन्हें दिल्ली लाया गया औऱ जहां बंदा सिंह बहादुर को तमाम यातनायें दी गई ताकि वो इस्लाम अपना लें, लेकिन जब वो नहीं माने तो 16 जून को उन्हें यातना दे कर कई टुकड़ो में काट दिया गया। ये कहानी है बंदा सिंह बहादुर की बहादुरी की और उनकी बहादुरी के प्रतीक के रूप में खड़े फतेह बुजुर्ग की।






























