Iran-US Ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच 40 दिनों तक चले तनाव और सैन्य टकराव के बाद भले ही युद्धविराम का ऐलान हो गया हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने आखिरकार ईरान के सामने नरम रुख अपना लिया है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति छिपी है?
हाल के दिनों में जिस तरह अमेरिका ने अपने तेवर बदले हैं, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं अमेरिका “डैमेज कंट्रोल” मोड में तो नहीं आ गया।
युद्धविराम के बाद भी जारी तनाव | Iran-US Ceasefire
सीजफायर की घोषणा के बावजूद हालात पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से लेकर यूएई के कुछ इलाकों तक हमले जारी रखे। ऐसे में दुनिया को उम्मीद थी कि अमेरिका और ज्यादा आक्रामक रुख अपनाएगा, लेकिन इसके उलट वॉशिंगटन ने बातचीत और समझौते की भाषा बोलनी शुरू कर दी।
अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने साफ कहा कि अमेरिका अब जंग को आगे नहीं बढ़ाना चाहता और शांति का रास्ता अपनाना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को फिर से सामान्य तरीके से खोलने पर चर्चा के लिए तैयार है ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जीवन सामान्य हो सके।
“ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” पर ब्रेक
अमेरिका ने अपने सैन्य अभियान “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” को पूरा घोषित कर दिया है। यही वह ऑपरेशन था जिसके जरिए अमेरिका फारस की खाड़ी में अपनी ताकत दिखाना चाहता था। लेकिन ईरान के लगातार दबाव और जवाबी रणनीति के बाद अमेरिका को सिर्फ 48 घंटे के भीतर अपने “प्रोजेक्ट फ्रीडम” को रोकना पड़ा।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने इस पूरे संघर्ष में अपने भूगोल और समुद्री रणनीति का इस्तेमाल बेहद प्रभावी तरीके से किया। खासकर होर्मुज स्ट्रेट पर उसकी पकड़ ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी।
क्या अमेरिका बैकफुट पर आ गया?
मार्को रूबियो के बयान के बाद दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा कि क्या अमेरिका ने ईरान के सामने झुकने जैसा कदम उठाया है? क्योंकि एक तरफ ईरान लगातार सख्त रुख बनाए हुए है और दूसरी तरफ अमेरिका बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। हालांकि ट्रंप का दावा है कि असल में ईरान ही समझौते को लेकर ज्यादा बेचैन है। लेकिन अमेरिकी मीडिया संस्थान “Axios” की रिपोर्ट कुछ और ही कहानी बयान कर रही है।
14 सूत्रीय समझौते पर चर्चा
Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रस्ताव पर बातचीत जारी है और अगले 48 घंटों में कोई बड़ी डील हो सकती है। बताया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच 14 सूत्रीय फॉर्मूले पर सहमति बनने की संभावना है।
इस प्रस्ताव में कई अहम शर्तें शामिल हैं—
- ईरान 12 साल तक यूरेनियम संवर्धन रोक देगा
- अमेरिका ईरान के जब्त फंड जारी करेगा
- होर्मुज स्ट्रेट से नाकाबंदी हटाने के लिए दोनों देश मिलकर काम करेंगे
- जिनेवा और इस्लामाबाद में आगे की बातचीत हो सकती है
- दोनों देश सैन्य शिपिंग प्रतिबंध कम करेंगे
- ईरान संयुक्त राष्ट्र के सख्त निरीक्षण को स्वीकार करेगा और परमाणु हथियार नहीं बनाने का वादा करेगा
रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच एक MoU यानी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।
ट्रंप की “यू-टर्न” राजनीति फिर चर्चा में
पूरे संकट के दौरान ट्रंप के लगातार बदलते बयानों ने भी बहस छेड़ दी है। पहले उन्होंने सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी, फिर बातचीत की बात की। यही वजह है कि आलोचक उन्हें “यू-टर्न मास्टर” कह रहे हैं।
बताया जा रहा है कि 26 फरवरी को जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत चल रही थी और अगले दौर की बैठक वियना में तय थी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। इससे ईरान ने अमेरिका पर भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया।
सुपरपावर छवि को झटका?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संघर्ष में अमेरिका अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखने में सफल नहीं दिखा। ईरान ने न सिर्फ अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा बल्कि अपनी सैन्य और समुद्री क्षमता का भी प्रदर्शन किया। अब जबकि अमेरिका बातचीत और समझौते की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है, ईरान इसे अपनी बड़ी रणनीतिक जीत के तौर पर पेश कर रहा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की “सुपरपावर” छवि को भी इस घटनाक्रम से झटका लगा है।
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