Silicosis in Rajasthan: राजस्थान में सिलिकोसिस बीमारी को लेकर एक बार फिर राजनीति गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य की भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार इस जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मजदूरों के प्रति संवेदनहीन हो गई है। लेकिन यह मामला सिर्फ सियासी बयानबाजी तक सीमित नहीं है जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा डराने वाली है, जहां हजारों मजदूर इस बीमारी के साथ रोज जंग लड़ रहे हैं, और कई जगहों पर भ्रष्टाचार की परतें भी सामने आ रही हैं।
गहलोत का आरोप: “मदद के अभाव में दम तोड़ रहे मजदूर”
अशोक गहलोत ने अपने बयान में कहा कि सिलिकोसिस एक लाइलाज और जानलेवा बीमारी है, जो खासतौर पर गरीब खदान और निर्माण मजदूरों को प्रभावित करती है। उन्होंने याद दिलाया कि उनकी सरकार ने 2013 में इस बीमारी से पीड़ित मजदूरों के लिए चार लाख रुपये की सहायता योजना शुरू की थी।
गहलोत के मुताबिक, 2019 में उनकी सरकार ने देश की पहली “सिलिकोसिस पॉलिसी” लागू की, जिसके तहत मरीजों को वित्तीय और चिकित्सा सहायता देने की व्यवस्था की गई। उन्होंने दावा किया कि 2019 से 2023 के बीच करीब 35,000 मरीजों को 911 करोड़ रुपये से ज्यादा की मदद सीधे उनके खातों में दी गई।
हालांकि, उन्होंने मौजूदा सरकार पर आरोप लगाया कि अब नए सिलिकोसिस कार्ड नहीं बनाए जा रहे, कई पुराने कार्ड बिना वजह ब्लॉक कर दिए गए हैं और अस्पतालों में भर्ती मरीजों को भी योजना का लाभ नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि “सहायता राशि के अभाव में मजदूर दम तोड़ने को मजबूर हैं।”
सरकार से मांग: तुरंत कार्रवाई हो (Silicosis in Rajasthan)
गहलोत ने सरकार से मांग की कि एक विशेष अभियान चलाकर लंबित कार्ड जारी किए जाएं और ब्लॉक किए गए कार्डों को फिर से सक्रिय किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले छह साल से सहायता राशि नहीं बढ़ाई गई है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है। ऐसे में इस राशि को बढ़ाना जरूरी है।
साथ ही उन्होंने उद्योगों पर सख्ती से नियम लागू करने की बात कही, ताकि मजदूरों को सुरक्षित माहौल मिल सके और इस बीमारी के फैलाव को रोका जा सके।
सिलिकोसिस क्या है और क्यों है खतरनाक?
अब चलिए जानते हैं कि ये सिलिकोसिस है क्या? दरअसल ये फेफड़ों की एक गंभीर और धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, जो सिलिका नाम के महीन धूल कणों को लंबे समय तक सांस के जरिए अंदर लेने से होती है। यह धूल रेत, पत्थर, क्वार्ट्ज और खनिजों में पाई जाती है।
जब यह धूल फेफड़ों में जमा होती है, तो वहां सूजन और घाव (फाइब्रोसिस) बनने लगते हैं। धीरे-धीरे फेफड़े सख्त हो जाते हैं और ऑक्सीजन लेने की क्षमता कम हो जाती है। यही वजह है कि मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है और कई मामलों में मौत तक हो जाती है।
इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं:
- लगातार खांसी
- सांस फूलना, खासकर मेहनत करने पर
- सीने में दर्द
- थकान और कमजोरी
बीमारी के प्रकार
सिलिकोसिस बीमारी को गंभीरता के आधार पर तीन प्रकारों में बांटा जाता है। सबसे सामान्य प्रकार क्रोनिक होता है, जो 10 से 20 साल तक लगातार सिलिका धूल के संपर्क में रहने पर विकसित होता है। इसके अलावा एक्सेलेरेटेड सिलिकोसिस है, जो 5 से 10 साल के लगातार संपर्क में रहने पर तेजी से गंभीर हो जाता है। और सबसे खतरनाक प्रकार एक्यूट सिलिकोसिस है, जिसमें उच्च मात्रा में सिलिका धूल के कुछ महीनों या ही महीने भर के संपर्क में रहने पर फेफड़ों की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका कोई स्थायी इलाज मौजूद नहीं है; उपचार केवल लक्षणों को नियंत्रित करने और फेफड़ों को और नुकसान से बचाने तक सीमित है।
भरतपुर का सच: एक गांव जहां 90% लोग बीमार
आपको जानकार हैरानी होगी कि राजस्थान के भरतपुर जिले के रूपवास और बयाना क्षेत्र में सिलिकोसिस का असर बेहद गंभीर है। यहां के खेड़ा ठाकुर गांव की स्थिति तो और भी चिंताजनक है, जहां करीब 90 प्रतिशत लोग इस बीमारी से ग्रसित बताए जाते हैं। अब तक इस इलाके में 650 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। गांव में लगभग हर घर में एक मरीज है, और कई परिवार ऐसे हैं जहां कमाने वाला कोई नहीं बचा।
परिवारों की कहानी: दर्द जो शब्दों में बयां नहीं
खेड़ा ठाकुर गांव के 65 वर्षीय बल्ली और उनके बेटे घनश्याम की कहानी इस त्रासदी की झलक दिखाती है। दोनों सिलिकोसिस से पीड़ित हैं। घनश्याम की हालत इतनी खराब है कि वह चल-फिर भी नहीं सकते और ऑक्सीजन सिलेंडर के सहारे जिंदगी जी रहे हैं।
बल्ली बताते हैं कि पत्थर काटने के काम के दौरान उड़ने वाली धूल ने उनकी सेहत छीन ली। उन्होंने सिलिकोसिस प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया है, लेकिन अभी तक सरकारी मदद नहीं मिल पाई।
घनश्याम बताते हैं कि उन्होंने कई शहरों में इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब हालत यह है कि वह पिछले 10 महीनों से चारपाई पर हैं। परिवार पर कर्ज चढ़ चुका है और उनकी पत्नी ममता मजदूरी करके घर चला रही हैं।
“दो भाई खो दिए”: बीमारी का दर्द
गांव के ही गोविंदा की कहानी और भी दिल दहला देने वाली है। वह पिछले 10 साल से इस बीमारी से जूझ रहे हैं और अपने दो भाइयों को इसी बीमारी में खो चुके हैं। उन्हें सरकार से कुछ आर्थिक सहायता और पेंशन मिलती है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। उनके बच्चे भी मजदूरी करते हैं, फिर भी परिवार को दो वक्त का खाना जुटाना मुश्किल हो जाता है।
बीमारी के पीछे की वजह: मजबूरी और लापरवाही
ग्रामीणों का कहना है कि खनन कार्य के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन नहीं किया जाता। मजदूरों को मास्क या अन्य सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जाते। धूल सीधे फेफड़ों में जाती है और धीरे-धीरे बीमारी का रूप ले लेती है।
कम पढ़ाई-लिखाई और रोजगार के सीमित विकल्पों के कारण लोग मजबूरी में इस काम को छोड़ भी नहीं पाते।
डॉक्टरों की सलाह: बचाव ही इलाज
विशेषज्ञों का मानना है कि सिलिकोसिस बीमारी से बचाव ही सबसे प्रभावी तरीका है। इसके लिए मजदूरों को काम के दौरान मास्क या रेस्पिरेटर का इस्तेमाल करना चाहिए और खदानों या निर्माण स्थलों में धूल कम करने के लिए नियमित रूप से पानी का छिड़काव करना चाहिए। इसके साथ ही धूम्रपान से पूरी तरह बचना जरूरी है, क्योंकि यह फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। अगर किसी को शुरुआती लक्षण जैसे खांसी, सांस लेने में तकलीफ या थकान महसूस हो, तो तुरंत चिकित्सकीय जांच कराना चाहिए ताकि बीमारी के गंभीर होने से पहले कदम उठाए जा सकें।
सरकारी सहायता: लेकिन पहुंच में दिक्कत
हालांकि, सरकार की ओर से सिलिकोसिस मरीजों को आर्थिक सहायता दी जाती है। मरीज को करीब 3 लाख रुपये मिलते हैं, जबकि मृत्यु के बाद परिवार को 2 लाख रुपये और अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपये दिए जाते हैं। इसके अलावा परिवार को पेंशन भी मिलती है। लेकिन कई मामलों में यह मदद समय पर नहीं पहुंच पाती, जिससे मरीजों की हालत और खराब हो जाती है।
धौलपुर में घोटाला: 106 फर्जी केस
इसी बीच, धौलपुर जिले में सिलिकोसिस के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। जनवरी से मार्च 2025 के बीच 109 केस दर्ज हुए, जिनमें से 106 जांच में फर्जी पाए गए। जांच में सामने आया कि एक्स-रे बाहर से कराए गए थे और अस्पताल के नंबरों का गलत इस्तेमाल किया गया। अगर ये केस पास हो जाते, तो सरकार को करीब 5.30 करोड़ रुपये का नुकसान होता।
एसीबी की जांच: कई जिलों में गड़बड़ी
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को पाली, जोधपुर, जालौर, सिरोही और करौली जिलों से शिकायतें मिली हैं कि स्वस्थ लोगों को भी सिलिकोसिस मरीज दिखाकर सरकारी पैसे निकाले गए।
दौसा घोटाला: 75 करोड़ का नुकसान
दौसा जिले में भी सिलिकोसिस कार्ड बनाने में भारी अनियमितताएं सामने आईं। 10 महीनों में 2755 कार्ड बनाए गए, जिनमें से 80 प्रतिशत फर्जी निकले। इससे सरकार को करीब 75 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस मामले में कई डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों पर कार्रवाई की गई और 20 लोगों को एपीओ किया गया।
सियासत से आगे बढ़कर समाधान की जरूरत
राजस्थान में सिलिकोसिस अब सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुकी है। एक तरफ मजदूर बीमारी से जूझ रहे हैं, दूसरी तरफ सिस्टम में खामियां और भ्रष्टाचार उनके हालात और खराब कर रहे हैं।
जरूरत है कि सरकारें सियासत से ऊपर उठकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें ताकि मजदूरों को न सिर्फ इलाज और आर्थिक मदद मिले, बल्कि सुरक्षित काम का माहौल भी सुनिश्चित हो सके।
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