Madhya Pradesh news: मध्य प्रदेश के नीमच-मऊ हाईवे पर रात का सन्नाटा और सड़क के किनारे खड़े ट्रकों की लंबी कतारें एक आम तस्वीर बन चुकी हैं। लेकिन जैसे ही धुंधली पीली रोशनी में टॉर्च की चमक और गहरी लिपस्टिक के शेड्स दिखाई देते हैं, सामने एक अलग ही दुनिया उभरती है। यह वह दुनिया है जहां बाछड़ा समुदाय की लड़कियां अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए देह व्यापार के धंधे में फंसी हुई हैं।
हाइवे के किनारे बने छोटे-छोटे डेरों में, शाम होते ही ग्राहक आने लगते हैं। यहां बैठी महिलाएं अपने हाथ में टॉर्च लिए रहती हैं। कभी फोन इस्तेमाल करती हैं, कभी ठंड में अपने आप को ढककर बैठी रहती हैं। लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य स्पष्ट है… यहां गुजरते ट्रक चालकों और राहगीरों का ध्यान आकर्षित करना। “तीन लोग हैं। दिक्कत तो नहीं करोगी कुछ? कोई दिक्कत नहीं है। आ जाओ।” … यह संवाद हाईवे पर काम करने वाली लड़कियों की वास्तविकता को बयां करता है।
बाछड़ा समुदाय और “खिलावड़ी प्रथा”
बाछड़ा समुदाय का इतिहास विस्थापन, कलंक और जीवित रहने की जटिल कहानी से भरा हुआ है। मूल रूप से राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ क्षेत्रों से आए यह लोग ऐतिहासिक रूप से घुमंतु थे। ब्रिटिश शासन ने 1871 में लागू किए गए क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत इन्हें जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया, जिससे इनके रोजगार के दरवाजे बंद हो गए और यह समुदाय धीरे-धीरे अपनी कला और संस्कृति से कटता गया।
Madhya Pradesh ‘s Highway Hell EXPOSED 🔥
OWN PARENTS FORCING DAUGHTERS INTO PROSTITUTION AS “TRADITION”!
Banchhada community in Mandsaur, Neemuch & Ratlam, Madhya Pradesh — Where The Birth Of A Girl is “Celebrated”…
Because the ELDEST DAUGHTER is Forced Into The S*x Trade… pic.twitter.com/nBPYek7bcq
— তন্ময় l T͞anmoy l (@tanmoyofc) March 13, 2026
समुदाय में एक सामाजिक प्रथा है जिसे “खिलावड़ी प्रथा” कहा जाता है। इसमें परिवार की सबसे बड़ी बेटी को शादी की अनुमति नहीं होती, बल्कि उसे परिवार के पालन-पोषण के लिए देह व्यापार में लगाया जाता है। यह प्रथा सदियों पुरानी है और इसे समुदाय का रिवाज बताया जाता है। हालांकि, बाहरी नजरिए से यह प्रथा मानव तस्करी और बाल व्यापार का रूप ले चुकी है।
हाईवे के डेरों की सच्चाई | Madhya Pradesh news
नीमच-मऊ हाईवे पर बने ये डरे, जो कभी साधारण मकानों की तरह दिखते हैं, असल में कमर्शियल सेक्स वर्क का केंद्र हैं। यहां की लड़कियां, जिनमें कुछ नाबालिग भी हैं, शाम होते ही सड़कों पर बैठ जाती हैं। उनके चेहरे पर लिपस्टिक के गहरे रंग और हाथों में टॉर्च उनके पेशे का संकेत होते हैं।
“कितनी कमाई हो जाती होगी महीने की?” । जवाब आया, “कोई फिक्स नहीं है। कभी अच्छा होता है, कभी नहीं। 400, 500 में जो दे देगा, वही दे देता है। फिर कितनी देर? 5 मिनट, 10 मिनट।” यह स्पष्ट करता है कि इन लड़कियों का जीवन अस्थिर और जोखिम भरा है।
कई बार ग्राहक लौट आते हैं, कभी किसी को पसंद आ जाता है तो शादी भी हो जाती है। लेकिन यह शादी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती। कई बार लड़कियों को उनके परिवारों से दूर रखकर काम करवाया जाता है। यहां की लड़कियां बताती हैं कि यह काम उनकी मर्जी से शुरू हुआ, लेकिन बाहर निकलना लगभग असंभव है।
मानव तस्करी का एंगल
हाल के वर्षों में इस क्षेत्र से कई लड़कियों को रेस्क्यू किया गया है। कुछ मामलों में नाबालिग लड़कियों को चुराकर यहां लाया गया और बड़ा करके काम में लगाया गया। करीब 60 लड़कियां रेस्क्यू की जा चुकी हैं, जिनमें कुछ की पहचान उनके परिवार से नहीं हो पाई।
रेलवे स्टेशनों और मेले से भी बच्चियों को अगवा कर लाया जाता है। कुछ रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि केवल बाछड़ा समुदाय की लड़कियां ही नहीं, बल्कि बाहर से खरीदी गई लड़कियों को भी इसी सिस्टम में शामिल किया जाता है। उनकी पहचान मिटा दी जाती है और समुदाय के नाम पर उन्हें काम में लगाया जाता है।
स्वास्थ्य और सुरक्षा की चुनौती
बाछड़ा समुदाय में सेक्स वर्क केवल सामाजिक बुराई ही नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी है। अनप्रोटेक्टेड सेक्स और लगातार आने-जाने वाले ट्रक चालकों ने इस बेल्ट को एचआईवी एड्स का हॉटस्पॉट बना दिया है। स्टडीज के मुताबिक, इस समुदाय की 15-16% महिलाएं एचआईवी संक्रमित हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और सामाजिक कलंक के कारण इन महिलाओं को समय पर इलाज नहीं मिलता।
सरकार ने जाबाली योजना जैसी पहल शुरू की है, लेकिन इसका प्रभाव जमीन पर बहुत कम दिखता है। लड़कियों के हेल्थ चेकअप तो महीने में एक बार होते हैं, लेकिन सुरक्षा और सुरक्षा का मुद्दा अभी भी गंभीर है।
परिवार, शादी और आर्थिक मजबूरी
बाछड़ा समुदाय में शादी और पारिवारिक निर्णय भी आर्थिक मजबूरी से जुड़े हैं। कई लड़कियों को परिवार के ऋण या भाई-बहन की शादी के खर्चे पूरे करने के लिए काम करना पड़ता है। लड़कियां बताती हैं कि उनके पास खेती या मजदूरी जैसे विकल्प नहीं हैं।
कई बार परिवार उन्हें जबरदस्ती इस धंधे में नहीं डालता, लेकिन आर्थिक हालात उन्हें मजबूर कर देते हैं। “हम घर की मजबूरी देख के आ गए,” यह उनके शब्द हैं। साथ ही, शादी का खर्च भी भारी है लगभग 20 लाख रुपए तक। ऐसे में कई लड़कियां युवा उम्र में ही इस धंधे में आ जाती हैं।
समुदाय की आबादी और सामाजिक संरचना
बाछड़ा समुदाय की आबादी मध्य प्रदेश में लगभग 25 से 3000 है, जिनमें नीमच, मंदसौर और रतलाम जिलों में सबसे अधिक लोग रहते हैं। सेक्स रेश्यो राष्ट्रीय औसत से बेहतर है 1000 पुरुषों पर करीब 1100 महिलाएं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि महिलाओं की स्थिति बेहतर है। पढ़ी-लिखी आबादी बहुत कम है, और लड़कियों को आर्थिक और सामाजिक मजबूरी के कारण कमर्शियल वैल्यू की तरह देखा जाता है।
नई पीढ़ी बाहर निकलने की कोशिश करती है, लेकिन डेरों का माहौल उन्हें वापस खींच लेता है। जमीन और मकान कुछ हद तक सरकार से मिले हैं, लेकिन अधिकतर डेरों में अभी भी वही पुरानी प्रथा कायम है।
निगरानी, सुरक्षा और सिंडिकेट्स
इस धंधे को संचालित करने के लिए पूरी प्रणाली बनी हुई है। स्थानीय लोग, WhatsApp ग्रुप्स और कई लेयर की सुरक्षा के माध्यम से काम को संचालित करते हैं। समय-समय पर पुलिस की छापेमारी होती है, लेकिन समुदाय इसे ट्रेडिशन के नाम पर जारी रखता है।
“जो मामला सामने आता है, उसमें लड़कियां रतलाम और नीमच के डेरों से आती जाती हैं। नई लड़कियों को घुमाया जाता है ताकि मार्केटिंग बनी रहे,” एक स्थानीय ने बताया।
कुछ दिन पहले ही सात लड़कियों को एक एनजीओ ने रेस्क्यू किया था। हालांकि, बाल सुधार गृह और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की कार्रवाई में पारदर्शिता की कमी दिखाई देती है।
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