कश्मीर के वो 5 ऐतिहासिक गुरुद्वारे, जिन्होंने आज भी जिंदा रखी है सिख धर्म की परंपरा – Gurdwaras of Kashmir

Shikha Mishra | Nedrick News Kashmir Published: 04 जुलाई 2026, 09:15 PM Updated: 04 जुलाई 2026, 09:15 PM
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Gurdwaras of Kashmir: जम्मू कश्मीर की खूबसूरत वादियों के साथ सिख धर्म और उनकी धरोहरो का एक अटूट रिश्ता है। शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर पर विजय प्राप्त करके कश्मीर को भी सिख साम्राज्य का हिस्सा बनाया था,और पहली बार कश्मीर में भी सिख धर्म फला फूला था.. लेकिन आज वहां सिखों की संख्या कम है.. 1990 में जो कत्लेआम हुआ उसमें कश्मीर में केवल कश्मीरी पंडितो का ही विस्थापन नहीं हुआ था बल्कि हजारो सिखों को भी अपना पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा।

सैकड़ो सिखो ने उस त्रासदी में अपनी जान गवां दी थी, लेकिन फिर भी कश्मीर में आज भी सिख धर्म की खूश्बू को महसूस की जा सकती है। सिखों की धरोहरो को यहा रहने वाले सिख संभाल कर रख रहे है.. औऱ उन्ही में सबसे खास है यहां मौजूद गुरुद्वारे … अपने इस लेख में हम कश्मीर में मौजूद 5 खूबसूरत गुरुद्वारों के बारे में जानेंगे, जिसने सिख धर्म की परंपरा को खूबसूरती से बनाये रखा है।

गुरू नानक गुरुद्वारा, अवंतिपोरा – Guru Nanak Gurudwara

कश्मीर में पुलवामा जिले में खूबसूरत झेलम नदी किनारे पर स्थित गुरू नानक गुरुद्वारा को अवंतिपोरा में लोग ‘चरण स्थान गुरु नानक साहिब जी’  के नाम से भी बुलाते है। अवंतिपोरा को आठवी शताब्दी में राजा अवंतिवर्मन ने अपनी राजधानी बनाया था। कश्मीर की खूबसूरती का तो खुद बादशाह अकबर भी दीवाना था.. वहीं हिमालय की गोद में बसा कश्मीर खूबसूरती के साथ साथ अध्यातमिकता का भी प्रमुख केंद्र है.. जिसे महसूस करने के लिए स्वयं सिखो के आदिगुरु गुरु नानक देव जी भाई मर्दाना के साथ तीसरी उदासी के दौरान 1518 में गए थे।

इस यात्रा में वो बीरवाह, काजीगुंड, बिजबिहारा, अमरनाथ, पहलगाम, मट्टन और लेह की यात्रा पर भी गए थे। गुरु साहिब अवंतिपोरा में एक बगीचे में रूके थे, जहां उनके पवित्र चरण पड़े थे, औऱ उन्होंने सिख धर्म का प्रचार प्रसार किया और शांति, प्रेम और आध्यात्मिकता का संदेश दिया था, उस स्थान पर ही गुरू नानक गुरुद्वारा बनवाया गया था। ये एक ऐसा गुरुद्वारा है जो 24 घंटे सातों दिन खुला रहता है, वहीं यहां सातों दिन हर वक्त लंगर होता रहता है जो हर धर्म औऱ जाति के लोगो के लिए खुला रहता है। इस गुरूद्वारे की बनावट सिख धर्म की परंपरा और संस्कृति के अनुसार है, जिससे वहां आने वाले संगतो को सिक्खी की खूश्बू महसूस होती है।

गुरूद्वारा छठी पातशाही, श्रीनगर- Gurudwara Chhathi Patshahi

सिख धर्म के अनुयायी छठे गुरु हरगोबिंद साहिब को छठे पातशाह यानि की छठे बादशाह कहते है। श्रीनगर के बारामूला में परम्पिला गांव में मौजूद है छठे गुरु के आगमन की निशानी के तौर पर स्थित गुरुद्वारा श्री छट्टी पातशाही साहिब। कहते है कि छठे गुरु ने जब जहांगीर की बीमारी का इलाज किया था, उसके बाद वो जहांगीर के साथ कश्मीर में इस स्थान पर आये थे और कुछ देर रहे भी थे। झेलम नदी के किनारे  बारामूला-उरी मार्ग पर खूबसूरत सफेद पत्थरो से बना है ये गुरुद्वारा। ये गुरूद्वारा रोजाना सुबह 7 बजे खुलता है और रात को 10 बजे तक खुला रहता है। सिखों के लिए ये स्थान बेहद शांति देने वाला है, वहीं डल झील, शंकराचार्य मंदिर, मुगल गार्डन भी इसके करीब है।

गुरुद्वारा गुरु नानक साहब जम्मू – Gurudwara Guru Nanak Sahib

जम्मू में मुबारक मंडी में चौक चबूतरा में स्थित है गुरुद्वारा गुरु नानक साहब। पूरे भारत में इकलौता ऐसा गुरुद्वारा है जहां पहले पातशाह गुरु नानक  देव जी की एक 3 फीट की संगमरमर की मूर्ति भी स्थापित की गई है। इस मुर्ति को राजपूत राजा महाराजा प्रताप सिंह  ने स्थापित किया था। जो कि इस गुरुद्वारे के गर्भगृह में स्थापित है। कहा जाता है कि जब गुरु साहिब कश्मीर की यात्रा करके वापिस पंजाब की तरफ जा रहे थे तब वो जम्मू में चौक चबूतरा पर रूके थे। जहां उन्होंने कई दिन बितायें थे। सिखों के लिए ये गुरुद्वारा काफी अहम है। गुरु साहिब के यहां आगमन की याद में ये गुरुद्वारा बनवाया गया है जो 24 घंटे सातों दिन खुला रहता है।

गुरुद्वारा मट्टन साहिब, श्रीनगर – Gurdwara Mattan Sahib

जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर की धरती ने खुद गुरु नानक देव जी के उस परम ज्ञान को देखा था, जब उन्होंने एक घमंडी पंडित को अपने ज्ञान से झुका दिया था। श्रीनगर से 62 किलोमीटर दूर अनंतनाग जिले के मट्टन गांव में स्थित गुरुद्वारा मट्टन साहिब स्थित है। कहते है कि 16वी सदी में जब गुरु साहिब वापिस लौट रहे थे तब वे 13 दिनों तक मट्टन गांव में रहे थे और यहां उन्होंने अध्यात्मकिता, मानवता का संदेश दिया था। लेकिन वहां रहने वाले  पंडित ब्रह्म दास को गुरु साहिब से जलन होने लगी थी औऱ उसे अपने ज्ञान पर घमंड होने लगा था।

उसने गुरु साहिब को चुनौती दे दी थी, लेकिन गुरु साहिब ने पंडित को सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान से परिचय कराया था औऱ ये संदेश दिया कि विनम्रता और ईश्वर के प्रति भक्ति के बिना ज्ञान व्यर्थ  है। इस ज्ञान को पाने के बाद पंडित गुरु साहिब का अनुयायी बन गया। गुरु साहिब के परम ज्ञान की निशानी है गुरुद्वावा मट्टन साहिब। आध्यात्मिकता और अंतरधार्मिक एकता का प्रतीक ये गुरुद्वारा सिखों के लिए बेहद अहम है।

गुरुद्वारा तपो स्थान, अखनूर – Gurudwara Tapo Sthan

चेनाब नदी के किनारे बसा एक खूबसूरत सा कस्बा अखनूर। जो जम्मू से करीब 28 किलोमीटर दूर है। अखनूर भारत पाकिस्तान का बॉर्डर पर स्थिति है। यह गुरुद्वारा संत बाबा सुंदर सिंह जी अलीबेघ के सम्मान में बनाया गया है। जो कि एक सिख संत हुआ करते थे। जिन्होंने सिख गुरुओ के समता, समानता औऱ भाईचारे के साथ साथ संगत सेवा का पाठ सिखायाथा। इस गुरुद्वारा का निर्माण सन् 1997  में किया गया था। जिसे वहां रहने वाले सिख समुदाय के लोग देखरेख करते है। ये स्थान बेहद शांत और दिव्य है। जहां आने वाले आगंतुको को ऐसा महसूस होता है कि वो वाकई में गुरुओ के सानिध्य में आ चुके है।  ये वो गुरुद्वारे है जिसके कारण यहां सीखी की खूश्बू मौजूद है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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