Dr Bhimrao Ambedkar: मरने के बाद क्यों और भी अहम हो गए अंबेडकर? जानिए पूरी कहानी

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 20 सितम्बर 2025, 05:30 AM Updated: 20 सितम्बर 2025, 05:30 AM
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Dr Bhimrao Ambedkar: एक समय था जब डॉ. भीमराव अंबेडकर को उनके जीवनकाल में भी वो मान-सम्मान नहीं मिला, जिसके वो हकदार थे। लेकिन आज, वो भारतीय राजनीति और समाज की ऐसी धुरी बन चुके हैं, जिनके नाम के बिना कोई भी दल, कोई भी आंदोलन खुद को पूरा नहीं मानता। करोड़ों लोगों की भावनाएं उनसे जुड़ी हैं, और दुनिया में शायद ही ऐसी कोई दूसरी मिसाल हो, जहां एक व्यक्ति की विरासत इतनी गहराई से समाज को प्रभावित करती हो। लेकिन सवाल यही है – अंबेडकर मरने के बाद इतने अहम क्यों हो गए?

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राजनीतिक दलों की ‘पूजा’ और विचारधारा की अनदेखी- Dr Bhimrao Ambedkar

डॉ. अंबेडकर आज हर राजनीतिक पार्टी के लिए आदर्श बन चुके हैं – चाहे वामपंथ हो, दक्षिणपंथ हो या कोई तीसरी धारा। हर साल उनकी जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है, फूल-मालाएं चढ़ाई जाती हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट डाले जाते हैं। लेकिन क्या पार्टियां उनकी विचारधारा को वाकई मानती हैं?

आनंद तेलतुम्बड़े, जो कि दलित एक्टिविस्ट हैं और डॉ. अंबेडकर की पोती रमा अंबेडकर के पति भी हैं, इस बात से खासे परेशान हैं। उन्होंने एक कार्यक्रम में साफ कहा कि भारतीय राजनीति में अंबेडकर की सिर्फ खोखली पूजा हो रही है, जबकि उनके मूल विचार जैसे सामाजिक न्याय, समता और बौद्धिक क्रांति को नजरअंदाज किया जा रहा है।

इतिहास की नजरंदाजी और वोटबैंक की राजनीति

उन्होंने ये भी बताया कि डॉ. अंबेडकर का निधन 1956 में हुआ। लेकिन जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ, वहां 1965 तक कोई स्मारक तक नहीं था। उनके बेटे यशवंत राव ने लोगों से चंदा इकट्ठा करके जो छोटा सा ढांचा बनवाया, वो आज की ‘चैत्यभूमि’ है।

लेकिन जब 60 और 70 के दशक में वोट बैंक की राजनीति शुरू हुई, तब नेताओं की नजर में अंबेडकर की अहमियत बढ़ी। दलित समाज अंबेडकर के आंदोलन के चलते पहले से संगठित था और इस वर्ग का वोट आसानी से जुटाया जा सकता था। यहीं से अंबेडकर का ‘राजनीतिक पूंजी’ के रूप में इस्तेमाल शुरू हुआ।

अंबेडकर का नाम, पहचान और भगवाकरण

क्या आप जानते हैं कि ‘अंबेडकर’ नाम असल में उनके टीचर का था? उनका असली नाम सकपाल था। कोंकण के अंबावडे गांव से आए थे, इसलिए नाम पड़ा अंबावेडकर। लेकिन उनके एक ब्राह्मण टीचर, जिन्हें उन पर बहुत स्नेह था, ने ही स्कूल में दाखिले के वक्त उनका नाम ‘अंबेडकर’ कर दिया। बाबा साहब ने खुद अपनी आत्मकथा में यह बात लिखी है।

आज वही अंबेडकर, जिनकी सोच पूरी तरह तार्किक और बौद्धिक थी, उन्हें एक खास धार्मिक रंग देने की कोशिश हो रही है। बीजेपी पर आरोप लगता है कि उन्होंने अंबेडकर का भगवाकरण किया। उनके बौद्ध धर्म अपनाने को हिंदू सुधार की तरह पेश किया गया, जबकि यह एक समाजिक विद्रोह था।

तेलतुम्बड़े की गिरफ्तारी और सरकार का संदेश

आपको बता दें, आनंद तेलतुम्बड़े को भीमा कोरेगांव केस में माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उन्होंने 956 दिन जेल में बिताए, और अब भी उनके खिलाफ जांच चल रही है। लेकिन उनका मानना है कि यह गिरफ्तारी सिर्फ उन्हें नहीं, बल्कि एक संदेश थी कि चाहे अंबेडकर के परिवार का हिस्सा ही क्यों न हो, अगर ‘हद’ पार की तो बख्शा नहीं जाएगा।

जातिगत हिंसा की सच्चाई

तेलतुम्बड़े की सबसे बड़ी चिंता यही है कि अंबेडकर के नाम पर राजनीति तो हो रही है, लेकिन जमीन पर जातिगत दमन और हिंसा कम होने की बजाय बढ़ रही है। एल्गार परिषद, भीमा कोरेगांव हिंसा, और आज भी जारी असमानता ये सब बताता है कि अंबेडकर को लेकर जो श्रद्धा दिखाई जा रही है, वो असल में उनके विचारों से कितनी दूर है।

अंबेडकर क्यों जरूरी हैं आज भी

डॉ. अंबेडकर सिर्फ संविधान निर्माता नहीं थे। वे एक क्रांतिकारी विचारक, समाज सुधारक और इंसाफ की आवाज थे। उनकी बातों की आज जितनी जरूरत है, शायद पहले कभी नहीं थी क्योंकि भले ही उनके नाम पर सियासत चमक रही हो, लेकिन उनकी सोच को जीने वाला समाज आज भी बनना बाकी है।

इसलिए अंबेडकर मरने के बाद अहम हुए नहीं, बल्कि समाज ने उन्हें देर से पहचाना। लेकिन अब जब पहचाना है, तो ज़िम्मेदारी है कि उनकी विचारधारा को सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारा जाए।

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