उत्तराखंड की वो ऐतिहासिक शादी जिसने तोड़ दी असमानता की ये प्रथा, जानिए पूरी कहानी

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 20 नवम्बर 2023, 12:00 AM Updated: 20 नवम्बर 2023, 12:00 AM
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एक दूल्हा घोड़े पर बैठकर 140 बारातियों के साथ अपनी दुल्हन को लाने के लिए बारात लेकर निकलता है. गाजे-बाजे के साथ बारात दुल्हन के घर पहुंचती है, और विवाह की सारी रस्मों रिवाजों को पूरा करने के बाद दुल्हन की विदाई होती है, दूल्हा अपनी दुल्हन को डोली में बैठा कर अपने घर की ओर प्रस्थान करता है. लेकिन गाजे-बाजों के शोर के बीच कुछ फूस-फुसाहट की हवा भी चल रही थी. बारात निकली और गायब हो गई, दुल्हे के घर वाले बारात का इंतजार ही करते रह गए, न बारात नज़र आई, न गाजे-बाजों का शोर. और ये आम सी शादी ऐतिहासिक हो गई, जो शादी के 21 दिन बाद तक घर नहीं पहुच पाई

दोस्तों, आईए आज हम आपको उत्तराखंड की इस ऐतिहासिक शादी के बारे में पूरी जानकारी देंगे, और इनके कारणों से भी राबता करवाएंगे.

और पढ़ें : समाज में दलितों की वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाली कविता, ‘कौन जात हो भाई?’ 

उत्तराखंड की ऐतिहासिक और अपवादित शादी

जिस शादी का जिक्र हम कर रहे है उसे उत्तराखंड की ऐतिहासिक शादी में गिना जाता है जिस शादी ने समाजिक कुप्रथाओं को तोड़ कर रख दिया था. यह घटना उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल के हिंदाऊ पट्टी में हुई थी.
कितना आम है की कोई दूल्हा घोड़े पर अपनी दुल्हन को लेने जाएं और दुल्हन डोली में बैठकर आए लेकिन ये आम सी दिखने वाली घटना तब खास बन जाती है जब इस परम्परा के आगे उच्च जाति वालों का अहम आ जाता है.
बात उस समय की है जब दुल्हे को घोड़े पर लेकर जाने का अधिकार केवल उच्च वर्ग के पास था. लेकिन सामाजिक कुरीतियों को भी तोड़ने की ठान चुके उत्तराखंड टिहरी गढ़वाल के दीपचंद अपनी शादी में घोड़े पर बैठकर बारात ले जाना चाहते थे और साथ ही अपनी दुल्हन को डोली में लाना चाहते थे. दीपचंद एक दलित परिवार से थे, जिसने बचपन से जातिगत असमानता का सामना किया था.

दीपचंद की शादी 13 जनवरी 1959 को होने वाली थी, दीपचंद जब बारात लेकर निकलते तो उन्हें पता था की उनके इस कदम से उच्च जाति का विरोध देखने को मिल सकता है. इसीलिए उन्होंने इस बात की जानकारी प्रशासन को भी दे दी थी. एक दलित लड़का समाज की कुप्रथाओं को तोड़ कर घोड़े पर सवार होकर अपनी दुल्हन को लेने के लिए निकल गया, जैसे-तैसे उनकी शादी तो हो गई, लेकिन विदाई के बाद जब बारात दुल्हन को डोली में बैठा कर ला रही थी तो लोगों का एक झुंड लाठी-डंडे लेकर बारात के आगे आकर खड़ा हो गया और बारात को रोक दिया ये लोग और कोई नहीं बल्कि स्वर्ण जाति के लोग थे, जिनके अनुसार दलित दूल्हा घोड़े पर नहीं बैठ सकता और दलित दुल्हन डोली में नहीं जा सकती. दीपचंद की बारात को स्वर्णों की सत्ता पर हमला बताया गया, स्वर्ण जाति वाले लोग कहने लगे की दलित भी घोडा-पालकी वाली शादी करने लगे तो उनमे और दलितों में क्या फर्क रह जाएगा. एक दलित का घोड़े पर बारात लाना स्वर्ण जाति के अहम को ठेस पहुंचा रहा था.

जैसे-तैसे करके पुलिसबल ने लोगों की भीड़ को बारात के आगे से हटाया, बारात थोड़ी दूर चली ही थी की लोगों की भीड़ फिर से भड़क गई. बारात फिर से चलने लगी और स्वर्ण जाति के लोगों ने उन्हें फिर से रोक लिया, ऐसा करते करते रात हो गई. बारात को रास्ते में जंगल के बीच में रुकना पड़ा. सुबह जब बारात ने जाने की तैयारी शुरू की तो फिर से लोगों के झुंड न उन्हें रोक लिया. ऐसे ही ये सिलसला 21 दिनों तक चलता रहा.

फिर एक दिन प्रशासन के आगे जाकर डोली में बैठी हुई नई नवेली दुलहन फूलदेई बोली की अगर आपसे इस भीड़ को नहीं हटाया जा रहा है तो मैं जाती हूँ, मैं करूंगी इनका सामना. जिसके बाद फूलदेई की बात सुनकर पुलिसबल ने हवा में फायरिंग की और भीड़ को बारात के आगे से हटाया. तहसीलदार और भारी पुलिसबल की मौजूदगी में दीपचंद की बारात 21 दिन के बाद आपने घर पहुंची, इस घटना के बाद उस इलाके में किसी ने भी दलित की बारात को घोड़े पर ले जाने से नहीं रोका. ये शादी नहीं आन्दोलन था, जिसने दलितों को एक पहचान दिलाई.

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