Sikhism in British Columbia: जब ब्रिटिश कोलंबिया में सफेद जहाज़ से उतरे कुछ पगड़ीधारी फौजी बोले — ‘यह तो बिलकुल पंजाब जैसा है!’

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 24 Sep 2025, 12:00 AM | Updated: 24 Sep 2025, 12:00 AM

Sikhism in British Columbia: पंजाब की मिट्टी में पले-बढ़े कुछ जांबाज सिख फौजी पहली बार कनाडा की धरती पर कदम रखते हैं। साल था 1897, जब महारानी विक्टोरिया की डायमंड जुबली के मौके पर ब्रिटिश आर्मी के हिस्से के रूप में कुछ पंजाबी सैनिक ब्रिटिश कोलंबिया आए। ये एक आधिकारिक दौरा था, बस कुछ दिनों का ठहराव था, लेकिन इस छोटी सी यात्रा ने बहुत बड़ी कहानी की नींव रख दी।

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इन फौजियों ने जब ब्रिटिश कोलंबिया की हरी-भरी वादियों और खेतों को देखा, तो उन्हें पंजाब की याद आ गई। वही मिट्टी की खुशबू, वही खेतों का फैला हुआ विस्तार मानो कोई छोटा पंजाब हो। लोकल लोगों ने भी इन सिख फौजियों को बड़े सम्मान से देखा। उस वक़्त वैंकूवर के अख़बारों में हेडलाइन छपी: “Turbaned Men Excite Interest: Awe-Inspiring Men from India Held the Crowds.”

फिर शुरू हुआ असली सफर- Sikhism in British Columbia

पहली यात्रा के बाद, 1902 में फिर एक दूसरी टुकड़ी आई, किंग एडवर्ड VII की ताजपोशी के मौके पर। और फिर तो जैसे दरवाज़ा खुल गया। 1904 से 1908 के बीच करीब 5,000 पंजाबी पुरुष ब्रिटिश कोलंबिया में आकर बस गए। उस वक़्त महिलाएं और बच्चे कम ही आ पाते थे, इसलिए ये सभी पुरुष अकेले रहते थे वो भी छोटे-छोटे ग्रुप्स में, किसी फैक्ट्री में, किसी खेत में काम करते, और एक-दूसरे को परिवार की तरह मानकर रहते।

लेकिन ये ज़िंदगी आसान नहीं थी। परिवार दूर, संस्कृति अलग, भाषा नई सब कुछ अलग। फिर भी, इन सिखों ने हार नहीं मानी। दिन में मेहनत करते और रात में एक-दूसरे के साथ बैठकर घर की बातें करते, गाना-बजाना करते। धीरे-धीरे इन्होंने एक मजबूत कम्युनिटी बनानी शुरू की।

खालसा दीवान सोसाइटी और पहला गुरुद्वारा

1906 में Khalsa Diwan Society का गठन हुआ यह कनाडा की पहली सिख संस्था थी। फिर 1908 में वैंकूवर में बना पहला गुरुद्वारा, Second Avenue Gurdwara। ये सिर्फ एक धार्मिक जगह नहीं थी, बल्कि एक सहारा था। यहां लंगर चलता, कीर्तन होता और सबसे बड़ी बात कोई नया आता, तो उसे वहीं से मदद मिलती।

खालसा दीवान सोसाइटी ने बाद में विक्टोरिया, एबॉट्सफोर्ड और न्यू वेस्टमिंस्टर में भी गुरुद्वारे बनवाए। यही वो जगहें थीं, जहां सिखों की पहचान रची जा रही थी एक नई ज़मीन पर, नए सपनों के साथ।

लेकिन रास्ता आसान नहीं था…

इसी बीच, 1908 में सिखों का वोट देने का अधिकार छीन लिया गया। ‘हिंदू’ कहकर उन्हें बाकी समाज से अलग किया गया (तब सभी भारतीयों को ‘हिंदू’ कह दिया जाता था)। अकेले रह रहे इन पुरुषों की हालत और मुश्किल हो गई। लेकिन फिर भी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कुछ सिख 1914 में भारत लौटे, ग़दर मूवमेंट से जुड़े, भारत की आज़ादी के लिए लड़े।

फिर 1920 के दशक में हालात थोड़े बदले। नियमों में ढील दी गई और महिलाएं-बच्चे भी आना शुरू हुए। परिवार बनने लगे, सिख आबादी फिर से बढ़ने लगी। धीरे-धीरे लोग “कनाडियनाइज़” होने लगे। कपड़े बदले, बच्चों को स्कूल भेजा, लेकिन दिल अब भी पंजाब में ही धड़कता था।

British Columbia में बढ़ता सिख समुदाय

आज अगर ब्रिटिश कोलंबिया की बात करें, तो यहां सिखों की मौजूदगी हर जगह महसूस होती है खासकर लोअर मेनलैंड, वैंकूवर, सरे, एबॉट्सफोर्ड और डेल्टा जैसे इलाकों में।

2021 की जनगणना के मुताबिक:

  • Surrey में सिख आबादी 27.5% है — यानी हर चार में से एक व्यक्ति सिख है। न्यूटन और व्हाली जैसे इलाकों में तो सिख बहुमत में हैं।
  • Abbotsford में ये आंकड़ा 25.5% है। यहां के क्लियरब्रुक और टाउनलाइन हिल जैसे इलाकों में तो सिख 60% से भी ज्यादा हैं।
  • Delta, Mission, Squamish, Oliver और New Westminster जैसे इलाकों में भी सिख समुदाय की अच्छी खासी संख्या है।

यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं दिखाते ये इस बात की गवाही हैं कि कैसे एक छोटी सी शुरुआत आज इतने बड़े स्तर पर पहुंच चुकी है।

गुरुद्वारों का नेटवर्क एक कम्युनिटी की रीढ़

इतना ही नहीं, आज ब्रिटिश कोलंबिया में दर्जनों गुरुद्वारे हैं। कुछ मुख्य गुरुद्वारों के नाम देखिए:

  • खालसा दीवान सोसाइटी – एबॉट्सफोर्ड
  • गुरु नानक सिख मंदिर – फोर्ट सेंट जॉन
  • गोल्डन सिख सांस्कृतिक सोसाइटी – गोल्डन
  • गुरुद्वारा साहिब – 100 माइल हाउस
  • गुरुद्वारा सिख संगत – न्यू वेस्टमिंस्टर
  • मेरिट सिख सोसाइटी – मेरिट
  • सिख सांस्कृतिक सोसाइटी – कैमलूप्स
  • ओकानागन सिख मंदिर – केलोना

ये गुरुद्वारे सिर्फ पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि एक पूरी कम्युनिटी सेंटर की तरह काम करते हैं। बच्चों को पंजाबी पढ़ाई जाती है, युवाओं को इतिहास बताया जाता है, लंगर चलता है, और जरूरतमंदों की हर तरह से मदद की जाती है।

पंजाबी भाषा और शिक्षा में योगदान

आपको बता दें, ब्रिटिश कोलंबिया में पंजाबी सिर्फ घरों में बोली जाने वाली भाषा नहीं रही। अब ये स्कूलों में पढ़ाई जाती है खासकर सरे और एबॉट्सफोर्ड में। सरे में पंजाबी भाषा को पांचवीं क्लास से कोर्स में शामिल किया गया है। हालांकि एबॉट्सफोर्ड में इसे लेकर विवाद भी हुआ, कुछ लोगों ने कहा कि सिर्फ अंग्रेज़ी और फ्रेंच पढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन सिख समुदाय ने इसे अपनी पहचान और सम्मान से जोड़ा और आज पंजाबी को वहां भी स्वीकार किया जा चुका है।

सांस्कृतिक त्योहार और समुदाय का रंग

वसाखी, नगर कीर्तन, गुरु पर्व पर ब्रिटिश कोलंबिया में इन त्योहारों का जोश देखने लायक होता है। खासकर सरे और वैंकूवर का नगर कीर्तन, जिसमें लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। एबॉट्सफोर्ड में Labor Day Weekend पर होने वाला नगर कीर्तन भी बेहद प्रसिद्ध है।

वसाखी पर न केवल कीर्तन और लंगर होता है, बल्कि झांकियां निकलती हैं, पंजाबी स्कूल और एकेडेमियां भी इसमें हिस्सा लेती हैं। ये त्योहार अब सिर्फ सिख समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कनाडा की मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं।

धार्मिक पहचान और चुनौतियां

जहां एक तरफ सिखों ने समाज में सम्मान पाया, वहीं कई बार अपनी धार्मिक पहचान को लेकर विवादों में भी घिरे। जैसे किरपान (सिखों का पवित्र कृपाण) को लेकर कई कोर्ट केस हुए खासकर Québec में। लेकिन 2006 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ कनाडा ने साफ किया कि किरपान पर बैन कनाडा के संविधान का उल्लंघन है। बाद में RCMP (कनाडा की पुलिस) ने भी टर्बन पहनने की अनुमति दी, जो पहले नहीं दी जाती थी।

इन फैसलों से सिखों को न केवल कानूनी हक मिले, बल्कि उनकी पहचान को भी सम्मान मिला।

सिख आबादी का घर कनाडा

आपको जानकार हैरानी होगी कि कनाडा में सिख धर्म को चौथा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है, जिसकी 2021 की जनगणना के अनुसार लगभग 8,00,000 अनुयायी हैं, यानी कनाडा की कुल जनसंख्या का लगभग 2.1 प्रतिशत। कनाडा में सिख समुदाय सबसे अधिक ओंटारियो, ब्रिटिश कोलंबिया और अल्बर्टा में केंद्रित है, और यह भारत के बाहर सबसे बड़ी सिख आबादी का घर है।

वहीं, आज ब्रिटिश कोलंबिया का सिख समुदाय न केवल अपनी संस्कृति और पहचान को संजोए हुए है, बल्कि कनाडा की विविधता, सहिष्णुता और बहुलता का एक शानदार उदाहरण बन चुका है।

और ये सब एक सफेद जहाज से आए कुछ “पगड़ीधारी फौजियों” से शुरू हुआ था… जो यहां की मिट्टी को देखकर बोले थे — “यह तो बिलकुल पंजाब जैसा है!”

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