Sikh army regiment: सिखों की बहादुरी औऱ उनके साहस के किस्से तो आपने कई सुने होंगे.. सिखों के छठे गुरु हो, या दसवे गुरु गोबिंद सिंह जी.. बंदा सिंह बहादुर हो या सारागढ़ी के युद्ध में 21 सिख जवानो की बहादुरी के आगे अफगान सेना के दांत खट्टे होना.. ये वो कहानियां है, जो प्रमाणित करता है कि जहां सिख होंगे..साहस खुद ही पैदा हो जाता है। वैसे ही भारतीय सेना में सिखों का अपना रेजिमेंट है.. जो आजादी के बाद नही बल्कि लगभग आज के करीब 180 साल पहले ही गठित हुआ था.. जिसका गठन करने वाले थे ब्रिटिश, इस इंफेंट्री को ब्रिटिश भारतीय सेना के तहत 23 पंजाब इंफेट्री के रूप में गठित किया गया था।
जो कि आज के झारखंड के रामगढ़ छावनी में है और 1979 से पहले फतेहगढ़ यूपी में इसका रेजिमेंटर सेंटर था। इनका आदर्श वाक्य निश्चय कर अपनी जीत करो, और वॉक क्राई जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल है। केवल भारतीय सिख रेजीमेंट (Sikh regiment) के पास ही 2 परमवीर चक्र, 14 महावीर चक्र, 14 कीर्ति चक्र, 15 शौर्य चक्र और 64 वीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है…लेकिन क्या आप ये जानते है कि सिखों की बहादुरी को देखकर केवल अंग्रजी हुकुमत ही नहीं बल्कि कई और देश है जिन्होंने सिखों को स्पेशली अपनी सेना में शामिल किया है। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि भारत के साथ साथ और कहां कहां है सिख रेजीमेंट (Sikh regiment)।
अमेरिका का सिख रेजीमेंट – Sikh army regiment
अमेरिका में सिखो का इतिहास 18वी सदी के अंत से शुरु से हुआ, जब सिख मिलों में काम करने वाले मजदूर के रूप में काम करने गए थे, धीरे धीरे वो स्थापित हुए.. और आज केर्लिफोर्नियां तो मिनी पंजाब ही हो चुका है तो वहीं पूरे अमेरिका में करीब 5 लाख से भी ज्यादा सिख मौजूद है। हालांकि अमेरिका में स्पेशली सिख रेजीमेंट (Sikh regiment) अभी भी नहीं बनाया गया है, लेकिन 2010 से लेकर 2025 तक वहां सिख सैनिकों को पगड़ी पहनने की छूट मिली थी, लेकिन वो नियम फिर से बदल दिया गया।
दाढ़ी रखने को लेकर आजादी – Sikh army regiment
हालांकि दाढ़ी रखने को लेकर अब भी आजादी जारी है, क्योंकि सिखों ने गैस मास्क टेस्ट पास कर लिया है। हालांकि सिख (Sikh regiment) फिर से अपनी धार्मिक पहचान के साथ सेना में सेवा देने की लड़ाई लड़ रहे है लेकिन क्या अमेरिकी सरकार अपने फैसले से बदल पायेगी.. ये तो आने वाला वक्त बतायेगा.. लेकिन सिख अमेरिकी सेना में काफी मजबूत और हिम्मती जवानों में गिने जाते है।
यूइटेड किंगडम यूके यानि कि ब्रिटिश सेना का सिख सैनिकों से साथ रिश्ता कई दशकों पुराना है। 1839 में महाराजा रणजीत की मृत्यु के बाद सिखों ने अंग्रेजी हुकुमत से हार का सामना किया लेकिन अंग्रेजो ने सिखो को गुलाम बनाने के बजाय अपनी सेना का हिस्सा बन लिया। पहले विश्व युद्ध से लेकर दूसरे विश्व युद्ध तक या फिर सारागढ़ी का युद्ध जब 21 सिख सैनिको ने 10000 अफगानो से छक्के छुड़ा दिये और वीरगति को प्राप्त हुए थे.. या फिर विश्वयुद्ध के दौरान सिखो को अपनें फौज का हिस्सा बना कर युद्ध के लिए भेजना।
यूके की सेना में 200 सिख – Sikh army regiment
अंग्रेजो ने सिखों की अवहेलना करने के बजाये उन्हें सम्मानित पद देकर उनके अपना ऋणि बना लिया था। साल 2025 में पहली बार ब्रिटिश सेना में सिख रेजीमेंट को शामिल करने की पेशकश की गई थी। मौजूदा समय में यूके की सेना में 150 से 200 सिख सिपाही सेवा दे रहे थे। लेकिन उन्हें स्पेशल रेजीमेंट की उपाधि नहीं दी गई,, मगर जुलाई साल 2025 में हाउस ऑफ लॉर्डस में लॉर्ड कुलदीप सिंह साहोता ने सिख रेजीमेंट की मांग और तेज कर दी है। हालांकि औपचारिक रूप से कोई अनाउंसमेंट नही हुई है।
कनाडा में सिख सैनिको को पगड़ी और दाढ़ी रखने की आज़ादी
लेकिन सिख सैनिको को ब्रिटिश सेना में पूरा सम्मान दिया जाता है। जो सबूत है कि सिख सैनिकों की जगह ब्रिटिश सेना में कितनी मजबूत है। हालांकि वो दिन दूर नहीं जब ब्रिटिश सेना में आधिकारिक सिख रैजिमेंट होगा। इसके बाद हम बात करेंगे भारत के भारत दूसरे एक ऐसे देश की जहां सिख व्यापक रूप से रहते है। कनाडा.. जहां करीब 8 लाख सिख रहते है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि सिख सैनिकों ने 18वी सदी के अंत में ही कनाडा की सेना में सेवा दी थी.. यहां स्पेशली सिख रेजीमेंट नहीं है, लेकिन कनाडा में सिख सैनिको को पगड़ी और दाढ़ी के साथ सेवा देने की इजाजत है, यहां सिख काफी मजबूत संगठन है।
इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया में भी सिख सैनिक ( Sikh army regiment) अपनी धार्मिक पहचान के साथ सेवा दे रहे है,और मौजूदा समय में उनकी संख्या में भी इसलिए इजाफा हो रहा है। इनके अलावा कई और देशों में सिख सैनिकों को काफी सम्मान दिया गया.. जिसमें हांगकांग, बैल्जियम, इटली जैसे देश शामिल है। सिख सैनिक केवल भारत में ही नही बल्कि दूसरे देशों में भी अपनी बहादुरी औप अनुशासन का परचम लहरा रहे है। सिख केवल भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी अपनी धार्मिक मान्यताओ के साथ साथ अपने देश की रक्षा के लिए तत्पर है। जो उनकी सेवा भाव का ही प्रतीक है।






























