ब्रिटिश राज के खिलाफ पंजाब में गूंजा Pagdi Sambhal Jatta नारा – Punjab Freedom

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 23 May 2026, 09:35 AM | Updated: 23 May 2026, 09:39 AM

Punjab Freedom: आपको साल 2020-21 में बीजेपी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब, हरियाणा और यूपी के किसानों के जंग याद है। करीब 10 महीनो तक ये किसान राजधानी दिल्ली की सीमा पर टिके रहे.. वजह एक ही थी तीन कृषि कानून को फिर से वापिस लेने की मांग। इसे किसान आंदोलन नाम दिया गया.. इस आंदोलन ने पहली बार केंद्र सरकार को किसानों की एकजुटता की ताकत से रूबरू करवाया था, जो किसान देश का पेट भर सकते है वो वक्त आने पर पानी भी भरवा सकते है.. मजबूरन केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापिस लेना पड़ा लेकिन क्या आप ये जानते है कि दमकारी कानूनों की ये आग पहली बार नहीं उठी थी..

इसके पहले भी गुलाम भारत में अंग्रेजी हुकुमत ने भी कुछ ऐसे ही तुगलकी फरमान जारी करने की कोशिश की थी लेकिन तब किसानों के लिए मसीहा बन कर आये शहीदे आजम सरदार भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह… सिखों में किसानों पर बनने वाले गानों में पगड़ी संभाल जट्टा तो आपने सुना होगा.. सरदार अजीत सिंह ने इसी नाम से आंदोलन करके अंग्रेजो की रातों की नींद उड़ा दी थी.. अपने इस लेख में हम पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन और उसे शुरु करने वाले सरदार अजीत सिंह जी के बारे में जानेंगे, साथ ही क्यों जरूरत पड़ी इस आंदोलन की..

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ब्रिटिश राज के खिलाफ पंजाब में गूंजा ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ नारा

हर साल पंजाब में 23 फरवरी पगड़ी संभाल जट्टा दिवस के रूप में मनाया जाता है, ये दिन पंजाब के हर एक किसान के लिए बेहद खास है.. क्योंकि यहीं वो दिन है जब महान स्वतंत्रता सेनानी, किसानों के  क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी नेता सरदार अजीत सिंह का जन्म हुआ था। 23 फरवरी, 1881 को पंजाब के जालंधर जिले के खटकर कलां गांव, जिसे वर्तमान में शहीद भगत सिंह नगर जिले का हिस्सा माना जाता है, में जन्में थे सरदार अजीत सिंह। शहीदे आजम भगत सिंह जी को देश की आजादी के लिए, ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ जंग छेड़ने औऱ हंसते हंसते खुद को कुरबान करने की प्रेरणा उन्हें अपने बड़े पापा सरदार अजीत सिंह से ही मिली थी। अजीत सिंह भगत सिंह के पिता किशन सिंह के बड़े भाई थे। किशन सिंह जहां किसानी करते थे, वहीं अजीत सिंह देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

ब्रिटिश हूकूमत के तीन कानून कौनसे – Punjab Freedom

वो अंग्रजो की दमनकारी नीतियों के खिलाफ लड़ने लगे थे, और उसी की देन है 1907 में आंदोलन पगड़ी संभाल जट्टा- जिसका मतलब है हे किसान अपनी पगड़ी का ध्यान रखो.. दरअसल 1906 में ब्रिटिश हूकूमत ने तीन कानून लागू किये जिसमें पहला पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1900 था जिसके तहत पंजाब के किसानों के भूमि बेचने या गिरवी रखने के अधिकारों को प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिससे जमींदारों और साहूकारों को पूरा लाभ होने लगा। दूसरा कानून पंजाब भूमि उपनिवेशीकरण अधिनियम, 1906 था.. इसके तहत चेनाब कॉलोनी जो कि अब पाकिस्तान में है के किसानों के वारिसों के बजाय अंग्रेजी अधिकारियों को जमीन का स्वामित्व हस्तांतरित किया गया था। तीसरा कानून दोआब बारी अधिनियम, 1907 था.. जिसके तहत किसानों को भूमि स्वामित्व अधिकारों से पूरी तरह से वंचित कर दिया था.. जिससे वे संविदा मजदूर बनने पर मजबूर हो गए थे।

क्या था काला कानून – Punjab Freedom

इसी के साथ जल दरों और राजस्व दरों में 25% की वृद्धि की गई थी… जो पंजाब के गरीब किसानों पर सीधे चोट थी। इससे किसानो की जमीने छिन जाने का खतरा बढ़ गया। पंजाब की धरती हमेशा से ही अंग्रेजो के लिए टेढ़ी खीर जैसी रही थी, इसलिए बेहतर था कि उसे आंतरिक रूप से कमजोर किया जाये.. लेकिन अंग्रेजी हुकुमत की ये नीतिया सरदार अजीत सिंह को नामंजूर थी… और उन्होंने 1907 में शुरु किया पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन.. जिसमें स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय भी उनका समर्थन कर रहे थे। ये आंदोलन पूरे पंजाब में तेजी से फैला और इसे काला कानून करार दिया गया।

ब्रिटिश हुकुमत ने ajit singh को राजद्रोह करार दिया

इसके लिए 2 महीनो के बीच करीब 33 सभायें की गई, जिसमें 19 बैठको में खुद अजीत सिंह प्रभावी रूप से वक्ता के रूप में मौजूद थे, ताकि आंदोलन असरदार हो, औऱ लोग उनसे जुड़े। लेकिन 21 अप्रैल 1907 को रावलपिंडी में दिये गए उनके भाषण को ब्रिटिश हुकुमत ने राजद्रोह करार दे दिया और उन पर धारा 124ए लगा दिया.. लेकिन ब्रिटिश हूकूमत को भी बीजेपी सरकार की तरह हार माननी पड़ी औऱ मई 1907 में तीनो काले कानूनो को रद्द तो कर दिया गया.. मगर 9 मई को लाला लाजपत राय और 2 जून को अजीत सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज था।

ब्रिटिश हुकुमत जानती थी कि अगर अजीत सिंह भारत में रहे तो आंदोलन दूसरा रूप भी ले सकता है इसलिए उन्होंने 1818 के नियम-III के तहत राजद्रोह करने का आरोप लगा कर 6 महीने के लिए बर्मा यानि की वर्तमान में म्यांमार के  मांडले जेल में निष्कासित कर दिया गया।

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किसानो के राजा अजित सिंह

करीब 6 महीने बाद 11 नवंबर 1907 को दोनो को आजाद कर दिया गया और वो वापिस भारत भी आ गये थे, वहीं किसानो के हक के लिए लड़ी गई अजीत सिंह की लड़ाई के लिए दिसंबर 1907 में बीजी तिलक ने अजीत सिंह को “पंजाब के किसानों के राजा के रूप में ताज-मुकुट” दिया था। लेकिन उन्हें ये भी डर था कि कही अंग्रेजी हुकुमत उन पर झूठे आरोप लगा तक फिर से जेल में न डाल दें इस लिए वो सूफी अम्बाप्रसाद के साथ ईरान भाग गए,… उन्होंने अपना नाम  मिर्ज़ा हसन खान रख कर अपनी पूरी पहचान ही बदल दी थी। करीब 6 सालों में वो कई देशों में घूमे और 1914 में वो ब्राजील चले गए, जहां वो करीब 18 सालो तक रहे थे, आपको जानकर हैरानी होगी की सरदार अजीत सिंह करीब 40 भाषायें बोल सकते थे। 1912 के बाद अजीत सिंह की कोई खबर नहीं मिली थी, लेकिन 1928 में भगत सिंह की इच्छा के लिए सरदार अजीत सिंह की खोज की थी, भगत सिंह चाहते थे कि उनके चाचा की मृत्यु भारत से बाहर न हो।

भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू

हालांकि अजीत सिंह निर्वासन के दौरान भी देश की आजादी के लिए ही सोचते रहे थे, उन्होंने  इटली में करीब 11 हजार सैनिको के साथ मिलकर आज़ाद हिंद लश्कर की स्थापना की थी… वहीं वहां आंदोलनों का हिस्सा बनने के कारण उन्हें जर्मनी जेल में बंद कर दिया गया था, लेकिन भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू ने भगत सिंह की अंतिम इच्छा का ध्यान रख कर न केवल जर्मनी से रिहा कराया बल्कि भारत वापिस भी बुला लिया..  7 मार्च, 1947 को लंदन होते हुए भारत लौटे थे, लेकिन जब वो लाहौर पहुंचे तो उनका स्वागत किसी महान स्वातंत्रता सेनानी की तरह ही किया गया। मगर किसी को ये नही पता था कि वो केवल आजाद भारत में सांस लेने के लिए जिंदा थे।

खराब तबीयत के कारण वो डरहौजी चले गए थे, लेकिन 15 अगस्त की रात जब पंडित नेहरू ने आधी रात को नियति के साथ मिलन’ भाषण दिया तो अजीत सिंह की आँखो में आसूं थे, और उन्होंने जय हिंद कहा.. जिसके बाद वो 3.30 बजे हमेशा के लिए 66 साल की उम्र में दुनिया का अलविदा कह कर चले गए। डलहौजी के पंजपोला में आज भी एक स्मारक बनाया गया है जो अजीत सिंह के योगदान की याद दिलाता है। पगड़ी संभाल जट्टा केवल एक आंदोलन नहीं था बल्कि वो पंजाब के किसानों के आत्मसम्मान और गौरव का प्रतीक था। जिसे उन्हें जीतना ही था।

 

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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