Sharad Pawar PM Modi meeting: राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे और INDIA गठबंधन के अन्य दल जहां संसद और सड़कों पर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के जरिए केंद्र को घेरने की कोशिश कर रहे थे, वहीं संसद परिसर में हुई एक मुलाकात ने पूरे राजनीतिक माहौल का रुख बदल दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) यानी NCP (SP) प्रमुख शरद पवार की मुलाकात की तस्वीरें सामने आते ही महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया।
दोनों नेताओं की मुस्कुराते हुए बातचीत करती तस्वीरों ने सिर्फ राजनीतिक हलकों में ही नहीं, बल्कि INDIA गठबंधन के भीतर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि यह मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब पिछले कुछ दिनों से शरद पवार गुट के NDA में शामिल होने या फिर अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट के साथ दोबारा एक होने की अटकलें लगातार लगाई जा रही हैं।
तस्वीरों ने क्यों बढ़ाई हलचल? Sharad Pawar PM Modi meeting
संसद परिसर में हुई मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शरद पवार का स्वागत किया। इसके बाद दोनों नेताओं की बातचीत और मुस्कुराते हुए तस्वीरें सामने आईं। राजनीति में कई बार तस्वीरें भी बड़े राजनीतिक संकेत मानी जाती हैं और यही वजह है कि इस मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं। हालांकि, अभी तक प्रधानमंत्री कार्यालय, भाजपा या NCP (SP) की ओर से इस मुलाकात को किसी राजनीतिक समझौते या गठबंधन से जोड़कर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है। इसके बावजूद मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों ने इस मुलाकात को बेहद अहम बना दिया है।
क्या NDA की ओर बढ़ रहे हैं शरद पवार?
सूत्रों के मुताबिक NCP (SP) के भीतर भविष्य की राजनीतिक रणनीति को लेकर लगातार मंथन चल रहा है। चर्चा इस बात की भी है कि पहले शरद पवार और अजित पवार के गुट के बीच फिर से एकता की कोशिश हो सकती है। यदि दोनों गुट एक हो जाते हैं तो उसके बाद NDA में शामिल होने की संभावना पर फैसला लिया जा सकता है।
वहीं, अगर दोनों गुटों का विलय नहीं होता है, तब भी शरद पवार गुट के अलग से NDA में शामिल होने या बाहर से सरकार को समर्थन देने जैसे विकल्पों पर विचार किए जाने की चर्चा है। सूत्रों का दावा है कि अगले 8 से 15 दिनों के भीतर इस पूरे मामले की तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।
बदलते राजनीतिक समीकरणों की वजह क्या है?
बताया जा रहा है कि शरद पवार गुट के कई विधायक और सांसद मानते हैं कि लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहने की बजाय सरकार का हिस्सा बनने से संगठन को मजबूती मिलेगी। उनका मानना है कि इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और पार्टी के विस्तार के नए अवसर भी मिल सकते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में लगातार बदलते समीकरणों के बीच यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है। अगर शरद पवार गुट NDA के साथ जाता है तो इसका असर सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
परिसीमन विधेयक से भी जोड़कर देखी जा रही चर्चा
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि केंद्र सरकार संसद के मौजूदा मानसून सत्र में परिसीमन (Delimitation) विधेयक आगे बढ़ा सकती है। ऐसे में सरकार को विशेष बहुमत की जरूरत पड़ सकती है। लोकसभा में शरद पवार गुट के 8 सांसद और राज्यसभा में एक सांसद हैं। ऐसे में उनका समर्थन सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इस मुद्दे पर पार्टी ने अभी तक कोई अंतिम फैसला सार्वजनिक नहीं किया है।
सुप्रिया सुले ने अटकलों पर क्या कहा?
NCP (SP) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि पार्टी के रुख को लेकर चल रही कई खबरें केवल अटकलों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि संवैधानिक महत्व के किसी भी मुद्दे पर फैसला पार्टी के भीतर विस्तृत चर्चा और INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों से विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा। इससे पहले परिसीमन के मुद्दे पर भी उन्होंने कहा था कि यदि केंद्र सरकार सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि की लिखित गारंटी देती है, तभी उनकी पार्टी इस विषय पर आगे चर्चा करेगी।
शरद पवार की चुप्पी भी बनी चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शरद पवार का बयान भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जब उनसे पार्टी में टूट, अजित पवार के साथ एकता या NDA में शामिल होने की संभावना को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने केवल इतना कहा कि “अभी इस विषय पर बात करने का समय नहीं है।” राजनीति में कई बार नेताओं की चुप्पी भी बड़े संकेत मानी जाती है। यही वजह है कि उनके इस जवाब के भी अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं।
INDIA गठबंधन के लिए क्यों अहम है यह मामला?
लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में INDIA गठबंधन के अच्छे प्रदर्शन में शरद पवार की अहम भूमिका रही थी। ऐसे में यदि उनके राजनीतिक रुख में कोई बड़ा बदलाव आता है, तो इसका सीधा असर विपक्षी गठबंधन की मजबूती और भविष्य की रणनीति पर पड़ सकता है।































