MP High Court: ‘पत्नी से अप्राकृतिक संबंध अपराध नहीं…’ पति के खिलाफ दर्ज FIR रद्द

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 04 मई 2024, 05:30 AM Updated: 04 मई 2024, 05:30 AM
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का हालिया फैसला काफी चौंकाने वाला है। दरअसल, हाईकोर्ट ने एक पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पत्नी के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना अपराध नहीं है। हाई कोर्ट के जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने अपने फैसले में आगे कहा कि चूंकि वैवाहिक बलात्कार आईपीसी के तहत अपराध नहीं है, इसलिए सहमति महत्वहीन हो जाती है। इसके साथ ही अदालत ने अलग रह रही पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज कराई गई एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया।

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क्या है मामला

आपको बता दें, मामला 2009 का है, जिसमें एक पत्नी ने अपने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि शादी के बाद जब वह दूसरी बार अपने वैवाहिक घर लौटी तो उसके ने उसके साथ कई बार अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। इसके बाद पति ने एफआईआर को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी और एफआईआर रद्द करने की गुहार लगाई। पति ने तर्क दिया कि उनके और उनकी पत्नी के बीच अप्राकृतिक यौन संबंध का मामला भी आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं होगा।

क्या कहती हैं आईपीसी की धारा 375

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया ने 1 मई को एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के कई फैसलों और आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार की परिभाषा का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि एक पति का अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन करना बलात्कार नहीं माना जाएगा। भले ही यह गैर-सहमति से हुआ हो, जब तक कि पत्नी की उम्र 15 वर्ष से कम न हो।

न्यायमूर्ति अहलूवालिया ने कहा ‘विचार के लिए एकमात्र प्रश्न यह है कि क्या विवाह के दौरान साथ रहते हुए पति को वैवाहिक बलात्कार का दोषी कहा जा सकता है?’ उन्होंने कहा कि आईपीसी की धारा 375 अपवाद 2 में प्रावधान है कि किसी पुरुष द्वारा अपनी ही पत्नी के साथ यौन संबंध या यौन कृत्य करने के लिए पत्नी की उम्र 15 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया

न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया ने याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर और उसके बाद की कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि वैवाहिक बलात्कार को मान्यता नहीं दी गई है। इन परिस्थितियों में, इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि एफआईआर में लगाए गए आरोप आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं बनेंगे।

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