Meerut Gandhi Ashram history: आमतौर पर ‘गांधी आश्रम’ का जिक्र आते ही आंखों के सामने चरखे की धीमी आवाज, खादी के सादे कपड़े और एक शांत सा माहौल तैरने लगता है। लेकिन 1857 की क्रांति की गवाह रही मेरठ की ऐतिहासिक धरती पर मौजूद ‘क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम’ की दास्तान इससे कहीं ज्यादा शौर्यपूर्ण और साहसिक है। इस आश्रम की पुरानी चारदीवारी सिर्फ सूत कातने और खादी बुनने का जरिया नहीं थी, बल्कि यह वह अभेद्य गढ़ था जिसने अंग्रेजी सल्तनत की चूलें हिलाकर रख दी थीं। दिन में जो हाथ चरखे के पहिए घुमाते थे, रात होते ही वही हाथ अंग्रेजों को देश से उखाड़ फेंकने के नक्शे तैयार करते थे।
1920 में आचार्य कृपलानी ने रखी थी नींव| Meerut Gandhi Ashram history
इस ऐतिहासिक आश्रम की शुरुआत साल 1920 में आजादी के प्रमुख सिपाही जेबी कृपलानी (आचार्य कृपलानी) ने की थी। शुरुआती दौर में इसका मकसद आम लोगों को आत्मनिर्भर बनाने और स्वदेशी खादी को घर-घर पहुंचाने का था। लेकिन अंग्रेजों को जरा भी इल्म नहीं था कि खादी का यह केंद्र आने वाले वक्त में उनके लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी साबित होगा। धीरे-धीरे यह आश्रम आजादी के दीवानों और क्रांतिकारियों का सबसे सुरक्षित गुप्त ठिकाना बन गया। दिन के उजाले में यहां सूत काता जाता और जैसे ही रात का अंधेरा घिरता, मोमबत्तियों की मद्धिम रोशनी में फिरंगियों के खिलाफ गुप्त रणनीतियां बनाई जाती थीं।
नेहरू, शास्त्री और नेताजी की बैठकों का बड़ा केंद्र
क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम के मंत्री पृथ्वी सिंह रावत के मुताबिक, इस आश्रम का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। आजादी के आंदोलन के दौरान यह स्थान देश के शीर्ष नेताओं की बैठकों का प्रमुख केंद्र बन चुका था। पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसी महान हस्तियां यहां आती थीं और आजादी के आंदोलनों की रूपरेखा तय करती थीं। बड़े-बड़े राष्ट्रीय फैसलों की गूंज इस आश्रम के कमरों में सुनाई देती थी।
सूत कातने वाले हाथ जब जंग में कूदे: भामोरी में शहादत का वो किस्सा
साल 1942 में जब महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का बिगुल फूंका, तो इस आश्रम के कर्मचारियों ने भी चरखे और औजार छोड़कर सीधे आजादी के मैदान में छलांग लगा दी। फिरंगी हुकूमत ने आश्रम के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल की कालकोठरियों में ठूंस दिया, लेकिन वे उनके हौसले नहीं तोड़ सके।
मंत्री पृथ्वी सिंह रावत एक रोंगटे खड़े कर देने वाला किस्सा याद करते हुए बताते हैं कि मेरठ के भामोरी गांव में आश्रम का एक जांबाज कर्मचारी क्रांतिकारियों के साथ गुप्त बैठक कर रहा था। ब्रिटिश पुलिस को किसी तरह इसकी भनक लग गई। पुलिस ने मौके पर धावा बोला और उस निहत्थे जांबाज को सीधे गोली मार दी। इस बलिदान ने यह साबित कर दिया कि आश्रम से जुड़ा हर शख्स सिर्फ सूत कातना नहीं, बल्कि वतन की खातिर सीने पर गोली खाना भी जानता था।
आजादी के बाद मिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा
देश आजाद होने के बाद सरकार ने गांधी आश्रम के इन जांबाजों के अतुलनीय योगदान को पूरे सम्मान के साथ सराहा। जिन कर्मचारियों ने आंदोलन के दौरान यातनाएं सहीं और जेलों में दिन काटे, उन्हें प्रदेश सरकार द्वारा ‘स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन’ देकर सम्मानित किया गया।
आज भी जब आप मेरठ के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम में कदम रखेंगे, तो इसकी ईंट-ईंट में इतिहास की धड़कन महसूस होगी। समय के साथ जमाना जरूर बदल गया, लेकिन यह आश्रम आज भी क्रांति की उसी अमर विरासत और राष्ट्रप्रेम की महक को संजोए खड़ा है।
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