Maharaja Ranjit Singh: सिख धर्म को मानने वाले हर एक सिख के लिए उनके गुरु साहिबानों का बताया मार्ग ही धर्म है और कर्म भी। बाबा बंदा सिंह बहादुर, हरि सिंह नलवा, भाई सुखा सिंह, भाई मेहताब सिंह, भाई तारू सिंह जी जैसे अनगिनत सिखों के नाम बताये जा सकते है, जिन्होंने सिख धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी.. लेकिन क्या आप ये सोच सकते है कि एक ऐसे सम्राट भी हुए, जिन्होंने न केवल अपने गुरुओ का मार्ग चुना था बल्कि अपने साम्राज्य का नाम तक अपने राजवंश पर नहीं बल्कि गुरु के नाम पर रखा था.. सरकार ए खालसा। अपने इस लेख में हम सरकार ए खालसा के बारे में जानेंगे और किसने अपने राजवंश के बजाय दसवे गुरु को समर्पित करके अपने साम्राज्य का नाम रखा था। क्या है कहानी सरकार ए खालसा की..
खालसा पंथ से पहले सिख धर्म एक विचारधारा
13 अप्रैल 1699 को सिख धर्म के दसवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पंज प्यारों को अमृत चखा कर पहली बार खालसा पंथ की नींव रखी थी। खालसा पंथ को मानने वाले सिखों को हम आज निहंग सिख कहते है.. जो खालसा पंथ में बताये पंच ककार को धारण करते है.. और नियमों का पालन करते है। खालसा पंथ से पहले सिख धर्म एक विचारधारा थी.. जिसे मानव सेवा के लिए जाना जाता था, जो बराबरी, आपसी सौहार्द और भेदभाव के खिलाफ एक मुहीम की तरह था लेकिन खालसा पंथ ने उन्हें एक पहचान दिला दी थी।
12 मिसलों में बंटा हुआ पंजाब
गुरु के मार्ग पर चल कर कई योद्धाओं ने खालसा को चुना.. और वो खालसा के सिपाही बन गए.. समय बीतता रहा लेकिन 18 सदी में जब पंजाब 12 मिसलों में बंटा हुआ था तब उन्हीं मिसलो में से एक मिसल सुकरचकिया मिसल के नेता महा सिंह के 13 नवंबर 1780 में एक ऐसे योद्धा का जन्म हुआ था, जिसने केवल एक आंख के दम पर न केवल पंजाब पर बल्कि, कश्मीर, लद्दाख, तिब्बत और अफगानिस्तान पर भी विजय प्राप्त की थी। ये योद्धा थे सिख साम्राज्य की स्थापना करने वाले पहले महाराजा रणजीत सिंह जी।
छोटी उम्र में बने सरदार
उनके पिता सुकरचकिया मिसल के सरदार थे, तो शस्त्र विद्या तो बचपन से सीखनी शुरु कर दी थी, लेकिन छोटी सी उम्र में चेचक की बीमारी के कारण उनकी एक आंख खराब हो गई.. सबको लगा कि एक योद्धा भला एक आंख सके दम पर सरदार कैसे बनेगा.. लेकिन महाराजा रणजीत सिंह ने हार नहीं मानी.. उन्होंने अपना प्रशिक्षण जारी रखा.. मगर उनकी परिक्षा अभी बाकी थी, मात्र 12 साल के हुए तो पिता की मृत्यु हो गई.. कोई और विकल्प नहीं था तो उन्हें सरदार बना दिया गया.. मगर ये मौका ही उन्हें उनकी काबिलियत साबित करने के लिए काफी थी।
सभी मिसलो को एक कर सिख सम्राज्य की नींव रखी
उन्होंने उतनी छोटी सी उम्र में अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए पहला युदध किया था और विजय भी हासिल की थी, जिसके बाद किसी ने भी महाराजा की काबिलियत पर सवाल उठाने की कोशिश नहीं की.. वहीं 1799 में जब अफगानिस्तान का शासक जमान शाह दुर्रानी भारत पर आक्रमण करना चाहता था तब महाराजा ने अपनी नेतृत्व की शक्ति दिखाई और उसे खदेड़ बाहर किया, ऐसे में जब वो 20 साल के हुए तो उन्होंने 12 अप्रैल 1801 में सभी मिसलो को एक करके पहला सिख सम्राज्य की नींव रखी.. और उसे नाम दिया सरकार ए खालसा। महाराजा रणजीत सिंह ने दसवे गुरु गोबिंद सिंह जी के सम्मान में अपनी सेना को खालसा सेना नाम दिया। हम सभी जानते है कि आज अमृतसर में गुरु हरिमंदिर साहिब को स्वर्ण मंदिर कहे जाने के पीछे भी महाराजा रणजीत सिंह का ही हाथ है जिन्होंने हरमंदिर साहिब को 750 किलो सोना दान किया था. इसलिए ही ये गोल्डन टेंमल कहलाता है।
सरकार ए खालसा की कहानी
अपने साम्रज्य को सरकार ए खालसा कहने के पीछे का कारण था कि महाराजा रणजीत सिंह ने कभी भी खुद को ‘राजा’ या ‘बादशाह’ नहीं कहा.. वो हमेशा कहते थे कि वो केवल अपने गुरु के दास या सेवक है, जो उनके बताये मार्ग का अनुसरण करता है। वो खालसा पंथ के एक हुकुमी है। वहीं गुरु के प्रति महाराजा की श्रद्धा ऐसी थी कि उनके समय में छापे गए सिक्कों पर महाराजा के बारे में में बल्कि पहले गुरु नानक देव जी और दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के चित्र अंकित है, जिसमें वो आशिर्वाद की मुद्रा में है। वहीं खालसा फौज सरबत खालसा के मूल सिद्धांतो पर चलती थी, जिसमें पंथ की सामूहिक सभा हुआ करती थी, जो कि एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं थी, यहां कई मूल के सैनिक शामिल थे, जिसमें कश्मीर के डोगरा, अफगान के पठान, पंजाबी और यूरोपीय मूल उंचे प्रशिक्षित अधिकारी शामिल थे।
कुल मिलाकर आप ये कह सकते है कि महाराजा रणजीत सिंह जी ने अपना शासन आध्यात्मिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को मानते हुए किया था, उनका साम्राज्य सिख गुरुओं के बताये सिद्धांतो पर ही कार्य करता था। जहां अन्य शासकों ने अपने राजवंश को चमकाने की कोशिश की, उनकी वाहवाही करने के लिए अपने शासन काल को अपने राजवंश के नाम से पहचान दिलाई तो वहीं महाराजा रणजीत सिंह ने किसी राजवंश को नहीं बल्कि खालसा को महान बना दिया।
उन्होंने बताया कि आखिर क्यों सिखो के लिए उनके गुरु ही सर्वोपरि है। संगतों की सेवा, निस्वार्थ परोपकार ही सबसे पहले है। सिख जो करेंगे वो केवल अपने लिए ही नहीं होगा बल्कि पूरे समाज के भले के लिए होगा, और इसलिए आज भी महाराजा रणजीत सिंह जी की सरकार ए खालसा का शासनकाल सबसे स्वर्णिम शासन काल कहलाता है।





























