Lost Gurdwaras: पाकिस्तान हो या बांग्लादेश या फिर अफगानिस्तान एक समय ऐसा था जब इनका सिख धर्म से गहरा नाता था पाकिस्तान की धरती पर तो सिख धर्म का जन्म वहीं पहली बार फला फूला था। हालांकि आज पाकिस्तान अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश इस्लामिक देश हो चुके हैं लेकिन इस्लाम के बीच मौजूद है पुरानी जर्जर खंडहरों में तब्दील हो चुकी सिख धर्म की पहचान सिख गुरुद्वारा आजादी से पहले पाकिस्तान के हिस्से में भारत से ज्यादा सिख और उनके गुरुद्वारा मौजूद थे।
तो वहीं बांग्लादेश में भी दिख गुरुओं ने सिख धर्म का प्रचार प्रसार किया, अफ़गानिस्तान सिखो की फतह की कहानी कहता है, लेकिन आज के समय में सिखों के ऐतिहासिक धरोहरों को न केवल तबाह किया गया बल्कि उनकी स्थिति बेहद भयावह हो गई है। अपने इस लेख में हम इन देशों में उन गुरुद्वारों के बारे में बात करेंगे, जो कभी सिख धर्म की विरासत के रूप में खड़े थे, लेकिन आज पूरी तरह खंडहर हो गए है।
शहीद भाई तारु सिंह गुरुद्वारा – Shaheed Bhai Taru Singh Gurdwara
1, इसमें सबसे पहले बात करेंगें शहीद भाई तारु सिंह गुरुद्वारा के बारे में, जहां दिसंबर 2022 में इसे मस्जिद बता कर ताला जड़ दिया गया और इसमें सिखों के आने पर रोक लगा दी गई। 1947 में 160 गुरुद्वारो में से आज केवल मुश्किल से 20 गुरुद्वारे है, जो बचे हुए है। तबाह हुए गुरुद्वारो में शहीद भाई तारु सिंह गुरुद्वारा भी शामिल है, जो कि लाहौर में स्थित है। ये गुरुद्वारा शहीद भाई तारु सिंह की शहीदी के सम्मान में 1747 में बनाया गया था, भाई तारू सिंह मुगलो से लड़ते हुए 1745 में बुरी यातनाओ के कारण शहीद हो गए थे, लेकिन उन्होंने मुगलो के आगे हार नहीं मानी।
लेकिन करीब 277 साल पुराने इस गुरुद्वारे को इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड और कट्टरपंथी मुसलमानों ने गुरुद्वारे को मस्जिद बता कर इस पर ताला जड़ दिया। जिससे यहां सदियों से रोजाना होने वाला गुरू ग्रंथ साहिब का पाठ रूक गया। अल्पसंख्यक संरचन संगठन ने इस मामले में आवाज भी उठाई, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथियो के दवाब के कारण गुरुद्वारे पर ताला जड़ दिया और ये ऐतिहासिक गुरुद्वारा सिखो के हाथो से चला गया।
2, गुरुद्वारा रोरी साहिब – Gurdwara Rori Sahib
पाकिस्तान के तरण तारण जिले में मौजूद है गुरुद्वारा रोरी साहिब। भारत पाकिस्तान सीमा से मात्र करीब 3 किलोमीटर दूर तरणतारण के उलझ दल में आपको एक टीले पर एक खंडहरनुमा संरचना दिखाई देती है। ये संरचना ही कभी ऐतिहासिक गुरुद्वारा रोरी साहिब कहलाता था, जिसे भाई वधवा सिंह ने श्री गुरु नानक देव जी के सम्मान में बनाया था। इस गांव में गुरु साहिब ने कई साल बितायें थे, और पास के ही गाँव डेरा चहल में उनके नाना-नानी रहते थे।
पाकिस्तान के हिस्से में आने के बाद इस्लामिक ताकतो ने यहां हमला करना शुरु कर दिया, लूटपाट मचाई थी, और यहां मुसलमानो कब्जा कर लिया.. जिसके कारण यहां पर सिखों ने आना बंद कर दिया। और ये अब पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। इसे कई बार सरकारी दस्तावेज में गुरूद्वारा घोषित किया गया है लेकिन केवल पिक्चर खिंचने और वीडियो लेने के अलावा इसकी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया जाता है। जिसके कारण ये पूरी तरह से अब खत्म होने के कगार पर है।
गुरुद्वारा साहिब एबटाबाद – Gurdwara Sahib Abbottabad
3, अब बात करते है गुरुद्वारा साहिब एबटाबाद की। कुछ समय पहले एक खबर काफी सुर्खियों में थी, पाकिस्तान के खैबरपख्तूनख्वां प्रांत के एबटाबाद में मौजूद गुरुद्वारा साहिब को इवैक्यूई ट्रस्ट प्रोपर्टी बोर्ड के एक अधिकारी ने 1 करोड़ रूपय की रिश्वत लेकर इसे बचने के साथ साथ इमारत को गिराने की भी इजाजत दे दी। जिसके बाद खबर आई कि खरीददार वाहिद बाला ने इल गुरुद्वारे में अपनी दो पत्नियों के लिए बुटिक बनावा शुरु कर दिया था, और गुरुद्वारे की जमीन भी वाहिद की दोनो पत्नियों के नाम से थी। इस खबर के सामने आने के बाद सिख संगठन ने इसे बचाने की भी तमाम कोशिशे की.. लेकिन हैरानी की बात है कि एक ऐतिहासिक गुरूद्वारा बेचा जाता है, उसे ध्वस्त किया जाता है, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पाकिस्तान के अनगिनत गुरुद्वारे है जो अब पूरी तरह से अस्तित्व हीन हो चुके है। जिनके शायद नाम तक किसी को याद न हो।
गुरुद्वारा संगत टोला – Gurdwara Sangat Tola
अब बात करते है गुरुद्वारा संगत टोला की, बांग्लादेश के ढाका में कभी सिख धर्म की शान के रूप में खड़ा गुरूद्वारा संगट टोला नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर के यहां आगमन और सिक्खी की लौ को बढ़ाने का प्रतीक रहा है, इसे 1666-1668 के आसपास गुरु तेग बहादुर ने बनवाया था, लेकिन बंटवारे के बाद से बांग्लादेश एक इस्लामिक देश बन गया, और इस गुरुद्वारे की स्थिति बेहद जर्जर हो गई है, यहां अब सिख संगत न के बराबर आते है।
इसकी देखभाल की जिम्मेदारी अभी भी ‘गुरुद्वारा प्रबंधन समिति, बांग्लादेश के पास है। 350 साल से भी ज़्यादा पुराने इस गुरुद्वारे पर अब इस्लामिक कट्टरपंथियों ने कब्जा कर लिया है, हैरानी की बात है एक ऐतिहासिक इमारत होते हुए भी पुरातात्विक महत्व की इमारतों की सूची में शामिल है और न ही किसी अन्य संरक्षण सूची में। जिसके कारण इसके मरम्मत पर भी कोई ध्यान नही दिया जाता है, और अब ये नष्ट होने कगार पर है।
गुरुद्वारा कार्त परवामॉन साहिब – Gurdwara Kart Parvamon Sahib
5, इसके अलावा अफगानिस्तान में वैसे तो सिखो का इतिहास साहसभरा बहादुरी वाला है, लेकिन सिखो की फतह की कहानी कहने वाले गुरुद्वारों को एक एक करके तबाह कर दिया गया। खासकर 1992 में गृहयुद्ध के बाद काबुल में मौजूद करीब 8 से 10 गुरुद्वारो से निशान साहिब हटाया गया था, ताकि वहां सिख न जाये, लेकिन किसी तरह गुरुद्वार गुरुद्वारा कार्त परवामॉन साहिब बचा था, मगर जून 2002 में इस गुरुद्वारे पर तालिबान के आतंकि हमले के बाद ये गुरुद्वारा पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो गया।
आज सिख समुदाय वहां काफी है और वो इस्लामिक कट्टरपंथियों के आगे बगावत नहीं कर रहे है। जिसके कारण ये गुरुद्वारे तबाह हो गये, पूरी तरह से जर्जर हो गये है। इसके अलावा भी अनगिनत गुरुद्वारे है, जिनका नामों निशान तक मिटा दिया गया। लेकिन उनके बारे मे पूछने वाला भी कोई नहीं है। नष्ट हो चुके गुरुद्वारों के बारे में सुनकर किसी का भी दिल गुस्से से भर जायें.. लेकिन यहीं आज की सच्चाई है।
