Iran-America War: दुनिया की राजनीति इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां महाशक्तियों के बीच टकराव सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ अमेरिका लगातार ईरान को धमकियां दे रहा है, तो दूसरी तरफ रूस, चीन और ईरान का बढ़ता गठजोड़ वॉशिंगटन के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि बार-बार सख्त चेतावनी देने के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आखिर ईरान पर बड़ा हमला क्यों नहीं कर पा रहे?
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि ईरान ने रूस और चीन के साथ मिलकर ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार कर लिया है, जिसने अमेरिका की कई रणनीतियों को कमजोर कर दिया है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट अब अलग-अलग घटनाएं नहीं मानी जा रहीं, बल्कि इन्हें एक बड़े वैश्विक शक्ति संघर्ष के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप की धमकियां, लेकिन एक्शन नहीं| Iran-America War
हाल के दिनों में ट्रंप ने कई बार कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance ने भी साफ कहा कि ऐसी कोई डील स्वीकार नहीं होगी जिससे ईरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने की छूट मिले। इसके बावजूद अमेरिका अब तक निर्णायक सैन्य कार्रवाई से बचता दिख रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह ईरान की बदली हुई सैन्य और रणनीतिक तैयारी है। पिछले 40 दिनों में जिस तरह ईरान ने जवाबी रणनीति अपनाई, उसने अमेरिका को खुलकर कदम उठाने से पहले कई बार सोचने पर मजबूर कर दिया।
दो मोर्चों ने बढ़ाई अमेरिका की मुश्किल
अमेरिका इस समय एक साथ दो बड़े संकटों से जूझ रहा है। पहला, पश्चिम एशिया में ईरान का बढ़ता प्रभाव और दूसरा, यूक्रेन युद्ध। ट्रंप लगातार यूक्रेन युद्ध रोकने की बात कर रहे हैं, लेकिन न तो व्लादिमीर पुतिन पीछे हटने को तैयार हैं और न ही वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की। यूरोपीय देशों पर भी ट्रंप के दबाव का खास असर नहीं दिख रहा। इससे पहली बार ऐसा माहौल बनता दिख रहा है, जहां कई देश खुले तौर पर अमेरिका की रणनीति से अलग रास्ता अपना रहे हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिकी दबदबे पर सवाल उठने लगे हैं।
रूस-चीन-ईरान का मजबूत गठजोड़
रणनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक इस पूरे संकट के केंद्र में तीन बड़े चेहरे हैं रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin, चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping और ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei। इन तीनों नेताओं ने मिलकर ऐसा रणनीतिक तालमेल तैयार किया है, जिसने अमेरिका के लिए हालात और मुश्किल बना दिए हैं। रूस जहां ईरान को इंटेलिजेंस सपोर्ट दे रहा है, वहीं ईरान रूस को शाहेद ड्रोन उपलब्ध करा रहा है, जिनका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में हो रहा है।
दूसरी तरफ चीन हथियारों और सैन्य उपकरणों के लिए जरूरी पार्ट्स रूस और ईरान दोनों को सप्लाई कर रहा है। इससे दोनों देशों की सैन्य ताकत लगातार मजबूत हो रही है।
पेंटागन रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन की रिपोर्ट्स में भी यह माना गया है कि रूस की ओर से मिली इंटेलिजेंस की मदद से ईरान अब अमेरिकी हमलों के पैटर्न को बेहतर तरीके से समझने लगा है। बताया जा रहा है कि ईरान को यह जानकारी मिल चुकी है कि अमेरिकी लड़ाकू विमान किस रूट से आते हैं, कितनी ऊंचाई पर उड़ते हैं और हमले की रणनीति कैसी होती है। यही वजह है कि अब अमेरिका के लिए किसी बड़े सैन्य ऑपरेशन का जोखिम पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका सीधा हमला करता है तो उसे भारी सैन्य और राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नाटो देशों से भी बढ़ी दूरी
ट्रंप की मुश्किलें सिर्फ ईरान या रूस तक सीमित नहीं हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और कई यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों में भी खटास बढ़ी है। यही वजह रही कि ईरान से जुड़े तनाव में नाटो देशों का खुला समर्थन अमेरिका को नहीं मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति ने कई पुराने सहयोगियों को भी असहज कर दिया है। इससे अमेरिका पहले की तरह मजबूत वैश्विक समर्थन जुटाने में सफल नहीं हो पा रहा।
क्या सच में कमजोर पड़ रहा है अमेरिका?
हालात अब ऐसे बनते दिख रहे हैं जहां दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश खुलकर अमेरिकी नीतियों को चुनौती दे रहे हैं। ईरान के खिलाफ सख्त बयान देने के बावजूद ट्रंप का सैन्य कार्रवाई से बचना इसी बदलते शक्ति संतुलन का संकेत माना जा रहा है। अमेरिका के भीतर भी ट्रंप की नीतियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान संकट के बाद उनकी अप्रूवल रेटिंग में गिरावट देखी गई है।
अमेरिका में कई लोग मानते हैं कि इस टकराव ने ईरान को कमजोर करने के बजाय और ज्यादा आक्रामक बना दिया है। साथ ही Kim Jong Un जैसे नेताओं के हौसले भी बढ़े हैं।
बदल रही है दुनिया की ताकत की तस्वीर
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का कहना है कि यूक्रेन और ईरान के मोर्चे अब अलग-अलग नहीं रहे। पर्दे के पीछे रूस, चीन और ईरान जिस तरह तालमेल के साथ काम कर रहे हैं, उसने अमेरिका की रणनीतिक चुनौती कई गुना बढ़ा दी है।
अब सवाल सिर्फ ईरान पर संभावित हमले का नहीं, बल्कि दुनिया में बदलते शक्ति संतुलन का है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका पहले जैसी ताकत बनाए रख पाएगा या दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।




























