क्या धुलने के बाद दोबारा बिकते हैं लग्जरी होटलों के पुराने तौलिए? जानिए भारत के 7000 करोड़ के एक्सपोर्ट का सच| Hotel Towel Recycling Process

Nandani | Nedrick News Ghaziabad Published: 26 अगस्त 2026, 08:17 PM Updated: 26 अगस्त 2026, 08:17 PM
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Hotel Towel Recycling Process: जब भी आप किसी महंगे या 5-स्टार होटल में ठहरते हैं, तो वहां की लग्जरी फील देने वाली चीजों में सबसे खास होते हैं वहां के एकदम सफेद, मोटे और बेहद मुलायम तौलिए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब यही तौलिए बार-बार धुलने के बाद घिस जाते हैं, पीले पड़ने लगते हैं या उन पर कोई पक्का दाग लग जाता है, तब होटल मैनेजमेंट इनका क्या करता है? क्या इन्हें फेंक दिया जाता है, बाजार में दोबारा बेच दिया जाता है या फिर इनका कोई दूसरा इस्तेमाल होता है? आइए जानते हैं लग्जरी होटलों के इन ‘रिजेक्टेड’ तौलियों के पीछे की पूरी कहानी।

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कब और क्यों रिजेक्ट किए जाते हैं होटल के तौलिए? Hotel Towel Recycling Process

होटल इंडस्ट्री में गेस्ट एक्सपीरियंस और हाइजीन सबसे ऊपर होते हैं। रोजाना के इस्तेमाल और बार-बार गर्म पानी व केमिकल्स से धुलने के कारण एक समय के बाद तौलियों का फैब्रिक पतला होने लगता है। जब उनकी सफेदी कम होने लगे, पानी सोखने की क्षमता (Absorbency) घट जाए या फिर उन पर कोई ऐसा दाग लग जाए जो धोने के बाद भी न छूटे, तो होटल की सख्त क्वालिटी पॉलिसी के तहत उन्हें तुरंत रिजेक्ट कर दिया जाता है।

रिजेक्ट होने के बाद कहां जाते हैं ये तौलिए?

होटल से हटाए जाने के बाद इन तौलियों का सफर खत्म नहीं होता, बल्कि कई अलग-अलग तरीकों से इनका इस्तेमाल जारी रहता है:

  • होटल की इन-हाउस क्लीनिंग में इस्तेमाल: जो तौलिए मेहमानों के रूम में रखने लायक नहीं होते लेकिन उनका कपड़ा ठीक-ठाक होता है, उन्हें होटल अपने ही स्टाफ के काम में ले लेता है। मेरियट (Marriott) जैसी बड़ी होटल चेन्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसे तौलियों को डस्टर, फ्लोर क्लीनिंग क्लॉथ या किचन वाइप्स के तौर पर दोबारा काम में लाया जाता है।
  • डोनेशन और लोकल मार्केट: कुछ होटल्स ऐसे पुराने तौलियों को एनजीओ, शेल्टर होम्स या जरूरतमंद संस्थाओं को दान कर देते हैं। कुछ मामलों में इन्हें थोक में स्क्रैप या कमर्शियल क्लीनिंग एजेंसियों को लोकल मार्केट में बेच भी दिया जाता है।
  • फाइबर रीसाइक्लिंग प्रोसेस: जब कपड़ा पूरी तरह खराब हो जाता है, तो उसे रीसाइक्लिंग यूनिट्स में भेजा जाता है। वहां सबसे पहले तौलिये के टैग और बॉर्डर वाले अलग धागों को छांटा जाता है। इसके बाद उसके कॉटन फाइबर्स (रेशों) को अलग किया जाता है। अच्छी क्वालिटी के फाइबर्स से नए धागे बनाए जाते हैं, जबकि कमजोर रेशों से इंडस्ट्रियल वाइपिंग क्लॉथ, ऑटोमोबाइल पैडिंग या इन्सुलेशन मैटेरियल तैयार किया जाता है।

ग्लोबल मार्केट में भारत का दबदबा: अमेरिका को करता है करोड़ों का एक्सपोर्ट

होटल लिनेन और टॉवल इंडस्ट्री में भारत का नाम दुनिया भर में सबसे आगे है। भारत न सिर्फ अपने घरेलू बाजार की जरूरतें पूरी करता है, बल्कि अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों में भारी मात्रा में कॉटन टॉवल और होम-टेक्सटाइल का निर्यात करता है।

अंतरराष्ट्रीय ट्रेड कैटेगरी (HS 6302.60—टेरी टॉवल व लिनेन) के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में अमेरिका ने भारत से करीब 872 मिलियन डॉलर (लगभग 7,000 करोड़ रुपये) मूल्य के तौलिए आयात किए। अमेरिकी बाजार में इस कैटेगरी के कुल इम्पोर्ट में भारत का हिस्सा 43.3% रहा, जबकि पाकिस्तान 25.5% के साथ दूसरे और चीन 15.1% के साथ तीसरे नंबर पर रहा। यह आंकड़े साबित करते हैं कि दुनिया भर के लग्जरी होटलों में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर कॉटन तौलियों की जड़ें भारत से ही जुड़ी हैं।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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