बाबा दीप सिंह जी का गौरवशाली इतिहास, जब मुगलों की नाक के नीचे सिखों ने की स्वराज्य की स्थापना -Baba Deep Singh Ji di History

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 02 जून 2026, 04:58 PM Updated: 02 जून 2026, 04:58 PM
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Baba Deep Singh Ji di History: साल 1739 का समय था, नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया था और न केवल भारी लूटपाट मचाई थी बल्कि मुगलो को भी बुरी तरह से कमजोर कर दिया था। लेकिन तब मुगलो के खिलाफ सिखों को ताकतवर होने का अवसर मिला.. मुगलो के आतंक से परेशान सिखो ने न केवल स्वराज्य की स्थापना का सपना देखा बल्कि एक अल्प समय के लिए राज्य स्थापित भी कर लिया। 1740 में सिखों और जाटों की एक बड़ी सेना जो जालंधर दोआब के जंगलो में छिपी थी, उन्होंने फिर से अपने कदम बढ़ाये और सरहिंद सरकार पर कब्जा कर लिया… और तब सभी ने मिलकर दरानत शाह नामक व्यक्ति को अपना मुखिया बनाकर एक राज्य की स्थापना की.. मुगलो की ताकतवर सेना के नाक के नीचे एक राज्य की स्थापना करने वाले दरातन शाह असल में बाबा दीप सिंह जी थे।

जिन्होंने सिख साम्रज्य की स्थापना करने में दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के एक लड़ाका बंदा सिंह बहादुर का साथ दिया था। जिन्होंने 75 साल की उम्र में स्वर्ण मंदिर को ध्वस्त करने औऱ पवित्र सरोवर में मांस डाल कर अपमान करने वाले अहमद शाह अब्दाली की 10000 की फौज से लोहा लेने का फैसला किया.. जो सिर कटने के बाद भी तब तक लड़ते रहे जब कर अमृतसर की परिधी में पहुंचने की उनकी प्रतीज्ञा पूरी नहीं हुई। अपने इस वीडियो में हम बाबा दीप सिंह जी के बारे में जानेंगे।

बाबा दीप सिंह जी का जन्म 26 जनवरी 1682 को अमृतसर जिले के पाहुविंड गाँव में एक संधू जाट सिख के घर हुआ था। उनके पिता भगता सिंह जी एक किसान थे और उनकी माता का नाम जियोनी था। जब वो 12 साल के हुए तो दसवे गुरु जी की सेवा के लिए आनंदपुर साहिब चले गए थे.. इतना ही नहीं खालसा पंथ से जुड़ने के लिए 1700 में वैशाखी के दिन आनंदपुर साहिब में गुरु साहिब से भी अर्जी की.. उनकी सच्ची भक्ति और निष्ठा को देखकर गुरु साहिब ने अमृत संचार करा खालसा में दिक्षित किया। उसके बाद से बाबा दीप सिंह गुरु साहिब के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताते थे इस दौरान उन्होंने गुरु साहिब से ही शस्त्र चलाना, घुड़सवारी करना और युद्ध कौशल सीखा था।

वहीं उन्होंने भाई मणि सिंह से गुरमुखी पढ़ना-लिखना और गुरुओं के वचनों की व्याख्या करना भी सीखा… यानि की बाबा दीप सिंह दी ने शास्त्र और शस्त्र दोनो विद्यायें सीखी थी। उन्हें पंजाबी, हिंदी, फारसी और अरबी भाषाओं का ज्ञान है। जिसके बाद वो 1702 में अपने गांव लौट आये और सिख धर्म का प्रचार प्रसार शुरु कर दिया था। इसके बाद 1705 में गुरु साहिब ने बाबा दीप सिंह जी को तलवंडी साबो बुलाया था, जहां उन्होंने भाई मणि सिंह की पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियाँ बनाने में सहायता की थी, ताकि गुरु साहिब ग्रंथ को अंतिम गुरू घोषित कर सकें। इतना ही नहीं उन्होंने श्र गुरु ग्रंथ साहिब की अरबी प्रतिलिपी भी तैयार की थी जो इस वक्त बगदाद में है।

1708 में दसवें गुरु के सचखंड जाने के बाद उन्होंने बंदा सिंह बहादुर की मुगलो के खिलाफ जंग में साथ देना शुरु कर दिया। 1709 में जब बंदा सिंह बहादुर सधाउरा और छप्पर चिरी के युद्ध में दुश्मनों से लोहा ले रहे थे तब बाबा दीप सिंह ढाल की ही तरह उनके साथ थे। लेकिन जब बंदा सिंह बहादुर शहीद हो गए तब उन्होंने शहीद मिसल, जिसे निहंग मिसल भी कहा जाता था, उसकी स्थापना की औऱ पहले प्रमुख कहलाये, इस दौरान उन्होने दमदमी टकसाल की स्थापना की जो एक रूढ़िवादी खालसा सिख सांस्कृतिक और शैक्षणिक संगठन है। जो कि एक “चलती-फिरती यूनिवर्सिटी” कहलाती है, जिसमें सिख धर्म की विद्या और गुरबाणी संथिया की शिक्षा दी जाती थी, बाबा दीप सिंह सिक्खी की धारा को प्रवाहित करने के लिए जगह जगह यात्राये करते औऱ लोगो को सिख धर्म की मजबूती के बारे में बताते.. वो सिखों को गुरबाणी और शस्त्र विद्या सिखाते थे।

जिससे उनसे काफी लोग जुड़ने लगे, 1739 में जब नादिरशाह ने आक्रमण किया तब उसे बाबा दीप सिह ने अवसर की तरह देखा और जाटो और सिखो के साथ मिलकर हमला कर दिया औऱ सरहिंद सरकार पर कब्जा भी कर लिया। हालांकि 1741 में अज़ीमुल्लाह खान ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए मुगल फौजो को वहां भेज दिया,, जिससे अभी भी बाबा दीप सिंह की कमजोर सेना को संभलने का वक्त नहीं मिला..   औऱ वो पीछे हट गए औऱ जंगलो में चले गए। लेकिन 1757 में जब शहीद मिसल उनके हाथों में थी, तब अहमद शाह दुर्रानी ने चौथी बार भारत पर हमला किया था, और वो काफी महिलाओं को दासी बना कर ले जा रहा था, लेकिन बाबा दीप सिंह ने राज के अँधेरे में अपनी फौज के साथ कुरुक्षेत्र में दुर्रानी की फौज पर हमला कर दिया औप बंदियों को छुड़ाने के साथ दुर्रानी का भारी खजाना भी लूट लिया।

नतीजा ये हुआ कि दुर्रानी ने गुस्से में स्वर्ण मंदिर को ही तबाह करवा दिया और पवित्र सरोवर में जानवरों के आंतो को डाल दिया गया, जो पवित्र गुरुद्वारे और सरोवर का अपमान था। तब तक बाबा दीप सिंह जी 75 साल के हो चुके थे, लेकिन तब भी वो 15 किलो का खंडा अपने हाथों में थाम कर दुश्मनों का सामना करते थे। पवित्र सरोवर का अपमान और गुरुद्वारे की अपमान का प्रायश्चित करने की जिम्मेदारी बाबा दीप सिंह जी ने अपने कंधो पर ली और कसम खाई की उनके प्राण हरमंदिर साहिब के परिधि में ही निकलेंगे। जिसके बाद वो 500 सिखो के साथ अमृतसर की तरफ कूच कर गए.. लेकिन वो जहां से भी गुजरते उस गांव के पुरुष भी बाबा जी के साथ हो लेते, जब वो तरणतारण पहुंचे तो उनकी 500 की सेना 5000 सैनिकों की हो चुकी थी।

उन्होंने लड़ना जारी रखा था, लेकिन इस भीषण युद्ध में बाबा दीप सिंह की गर्दन पर हमला हुए.. और वो धड़ से अलग हो गया.. लेकिन बाबा की प्रतीज्ञा थी कि उनके प्राण हरिमंदिर साहिब की परिधी में ही निकलेंगे। वो एक हाथ में अपना सिर पकड़े दूसरे हाथ से दुश्मनों का सिर धड़ से अलग करते हुए आगे बढ़ते गए औऱ जैसे ही स्वर्ण मंदिर की परिधी में पहुंचे, उनके प्राण निकल गए। ऐसे थे बाबा दीप सिंह जी, जिन्होंने मात्र 12 साल की उम्र से ही गुरु साहिब को अपना जीवन सौंप दिया था.. जिन्होंने सारी उम्र सिख धर्म की रक्षा के लिए काम किया… और अंत में भी वो गुरूद्वारे के सम्मान में शहीद हो गए।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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