El Nino Impact on GDP: भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी मजबूत घरेलू मांग यानी खपत की कहानी मानी जाती है। लोग लगातार खर्च कर रहे हैं, बाजार में मांग बनी हुई है और इसी वजह से देश की आर्थिक रफ्तार बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भी हाल ही में भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.5% कर दिया है, जबकि कई अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के अनुमान घटाए गए हैं। लेकिन इन सकारात्मक आंकड़ों के बीच कई ऐसे खतरे भी उभर रहे हैं, जो आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं।
वैश्विक तनाव से बढ़ी मुश्किलें |El Nino Impact on GDP
हाल ही में अमेरिका-ईरान तनाव और युद्ध जैसी स्थिति ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर कच्चे तेल, एलपीजी और अन्य जरूरी कच्चे माल की सप्लाई पर पड़ा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई में रुकावट ने बाहर से आने वाली महंगाई का खतरा बढ़ा दिया है। इसका असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर ज्यादा देखने को मिल रहा है।
ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी ने न सिर्फ ईंधन बल्कि लॉजिस्टिक्स और उद्योगों की लागत भी बढ़ा दी है। इससे महंगाई पर दबाव लगातार बना हुआ है।
अब नया खतरा—अल नीनो की वापसी
इसी बीच मौसम से जुड़ा एक बड़ा खतरा सामने आ रहा है अल नीनो। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, एक दशक में सबसे मजबूत अल नीनो बनने की संभावना जताई जा रही है। इसका असर 2026 के दूसरे हिस्से में पूरे एशिया पर पड़ सकता है, जहां मौसम ज्यादा गर्म और सूखा रहने की आशंका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी संकेत दिए हैं कि इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। अनुमान के मुताबिक बारिश लंबी अवधि के औसत का लगभग 92% रह सकती है, जो 2002 के बाद सबसे कम मानी जा रही है।
खेती और खाद्य आपूर्ति पर खतरा
कमजोर मॉनसून का सीधा असर खेती पर पड़ता है। खरीफ फसलें जैसे धान, दालें और तिलहन बारिश पर काफी निर्भर होती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अगस्त-सितंबर में बारिश कम होती है, तो उत्पादन घट सकता है। एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, टमाटर, प्याज और दालों जैसी चीजों की कीमतें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। वहीं आलू पर ज्यादा असर नहीं दिखता, लेकिन प्याज पहले से ही महंगाई में आम लोगों को परेशान करता रहा है।
महंगाई का दबाव और जीडीपी पर असर
ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से महंगाई पर दबाव और बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कमजोर मॉनसून और वैश्विक तनाव साथ आते हैं, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अकेले अल नीनो का जीडीपी पर बड़ा असर नहीं होगा, लेकिन अगर सूखे जैसी स्थिति बनती है तो भारत की ग्रोथ 0.20% से लेकर 0.65% तक कम हो सकती है। IMD के अनुमान के मुताबिक बारिश में 8–10% तक की कमी भी संभव है, जो कृषि उत्पादन पर सीधा असर डालेगी।
तेल और ईंधन की कीमतें सबसे बड़ा फैक्टर
विशेषज्ञ मानते हैं कि अल नीनो से ज्यादा बड़ा असर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का होगा। भारत कच्चे तेल, एलपीजी और LNG का बड़ा आयातक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल का असर तुरंत घरेलू बाजार पर दिखता है। मार्च में थोक महंगाई (WPI) लगभग दोगुनी होकर 3.88% तक पहुंच गई थी, जिसकी मुख्य वजह ऊर्जा लागत और कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी थी।
क्या पेट्रोल-डीजल भी महंगे हो सकते हैं?
अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबा चलता है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर कीमतों में 5-5 रुपये की बढ़ोतरी होती है, तो खुदरा महंगाई (CPI) में 20-25 बेसिस पॉइंट तक का असर देखा जा सकता है। हालांकि सरकार फिलहाल कीमतें बढ़ाने के मूड में नहीं दिख रही है, लेकिन वैश्विक हालात बिगड़ने पर स्थिति बदल भी सकती है।



























