भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का खुलना देश के लिए हो सकती है खतरे की घंटी

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 07 जनवरी 2023, 05:30 AM Updated: 07 जनवरी 2023, 05:30 AM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

कहते हैं जब किसी भी घर का कोई शख्स अच्छी पढाई कर लेता है तो उस घर की आने वाली कई पीढ़ी का भी भविष्य सुधर जाता है. वहीं ये बात सभी देशों पर भी लागू होती है,  कहते हैं देश का एजुकेशन सिस्टम अच्छा है तो देश की छवि सुधर जाती है साथ ही पढ़े-लिखों लोग देश के आगे बढ़ाने में भी मदद करते हैं लेकिन अगर किसी देश में किसी दूसरे देश के लोग पढने के लिए आते हैं या एक देश के लोग दूसरे देश में पढ़ने के लिए जाते हैं तो इसका असर देश की छवि पड़ता है. वहीं अगर एक देश में अगर दूसरे देश के विश्व विद्यालय  खुलते हैं या बनाए जाते हैं तो इसका असर भी उस देश पर पड़ता है.

वहीं इस बारे में डॉ. वेदप्रताप वैदिक  (Dr. Ved Pratap Vaidik) जो भारतव के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं उनका कहना है कि शिक्षा में विदेशी दखल खतरे की घंटी है. 

डॉ. वेदप्रताप वैदिक इस बारे में लिखते हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक जबर्दस्त नई पहल की है। उसने दुनिया के 500 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए हैं। वे अब भारत में अपने परिसर स्थापित कर सकेंगे। इस साल भारत के लगभग 5 लाख विद्यार्थी विदेशों में पढ़ने के लिए पहुंच चुके हैं। विदेशी पढ़ाई भारत के मुकाबले कई गुनी मंहगी है। भारत के लोग अपनी कड़ी मेहनत की करोड़ों डाॅलरों की कमाई भी अपने बच्चों की इस पढ़ाई पर खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। इन लाखों छात्रों में से ज्यादातर छात्रों की कोशिश होती है कि विदेशों में ही रह जाएं और वहां रहकर वे मोटा पैसा बनाएं। भारत से प्रतिभा पलायन का यह मूल स्त्रोत बन जाता है। अब जबकि विदेशी विश्वविद्यालय भारत में खुल जाएंगे तो निश्चय ही यह प्रतिभा-पलायन घटेगा और देश का पैसा भी बचेगा।

Also Read- जानिए क्यों सबसे शांत जैन समुदाय कर रहा है सड़कों पर विरोध प्रदर्शन?

इसके अलावा वि.वि.अ. आयोग की मान्यता है कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा-पद्धतियां भारत में प्रारंभ हो जाएंगी, जिसका लाभ हमारे पड़ौसी देशों के विद्यार्थी भी उठा सकेंगे। इन सब लाभों की सूची तो ठीक है लेकिन क्या हमारे शिक्षाशास्त्रियों ने इस मामले के दूसरे पहलू पर भी विचार किया है? इसके दूसरे पहलू का सबसे पहला बिंदु यह है कि भारत में चल रहे विश्वविद्यालयों का क्या होगा?

ये विश्वविद्यालय पिछले डेढ़-दो सौ साल से अंग्रेजों और अमेरिकियों के नकलची बने हुए हैं? क्या वे ठप्प नहीं हो जाएंगे? जिन माता-पिताओं के पास पैसे होंगे, वे अपने बच्चों को हमारे भारतीय विश्वविद्यालयों में क्यों पढ़ाएगें? वे सब विदेशी विश्वविद्यालयों के पीछे दौड़ेंगे। दूसरा, इन विदेशी विश्वविद्यालयों को शुल्क, पाठ्यक्रम, प्रवेश-नियम और अध्यापकों की नियुक्ति में पूर्ण स्वायत्तता होगी। वे भारत के हित की बात पहले सोचेंगे या अपने देश के हित की बात?

तीसरा, क्या अब हमारे देश में इस नई शिक्षा-व्यवस्था के कारण युवा-पीढ़ी में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं पैदा हो जाएगा? चौथा, हमारे देश की सारी शिक्षा-व्यवस्था क्या तब पूर्ण नकलची बनने की कोशिश नहीं करेगी? पांचवाँ, विदेशी शिक्षा-संस्थाओं में पढ़ाई का माध्यम क्या होगा? क्या वे भारतीय भाषाओं को माध्यम बनने देंगे? कतई नहीं। उसका नतीजा क्या होगा? प्रतिभा-पलायन रूक नहीं पाएगा।

छठा, इस भाजपा सरकार को बने आठ साल हो गए लेकिन नई शिक्षा-नीति किसी कागजी शेर की तरह खाली-पीली दहाड़ मारती रहती है। उसमें किसी भारतीयता या मौलिकता का समावेश अभी तक नहीं हुआ है। जब तक सर्वोच्च अध्ययन और अनुसंधान भारतीय भाषाओं के जरिए नहीं होगा और अंग्रेजी का एकाधिकार समाप्त नहीं होगा, यह नई पहल काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है।

भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का खुलना देश के लिए हो सकती है खतरे की घंटी — NEDRICK NEWS

डॉ. वेदप्रताप वैदिक  (Dr. Ved Pratap Vaidik) भारतव के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं. 

Also Read- Joshimath Sinking: जोशीमठ की तबाही का जिम्मेदार कौन ? 47 साल पहले दी गई चेतावनी को किसने किया नजरअंदाज….

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds