जानिए ऐसे इंसान के बारे में जो हिंदू-मुस्लिम दोनों में हैं पूजनीय, गोगाजी ने गौ रक्षा में दे दी अपनी प्राण, जिनके पराक्रम का मिशाल देते हैं मुसलमान

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हिंदू-मुस्लिम दोनों में हैं पूजनीय 

हमारे इतिहास में यह तो पढ़ाया जाता है कि महमूद गजनवी और गौरी जैसे लूटेरों ने भारत की धरती को लूटा, शहरों को तहस नहस किया। मगर यह नहीं बताया जाता हैं कि उसका प्रतिशोध भी लिया गया था और वह भी पूरे राज्य के वीरों ने अपना जीवन देकर लिया था। राजस्थान के वीरों ने गाय, धरती और धर्म की रक्षा हेतु अनेक युद्ध लड़े। उन वीरों के पराक्रम की गाथाओं से इतिहास भरा पड़ा हैं। ऐसा ही इतिहास हनुमान गढ़ के चौहान शासक गोगा बाबा का हैं। जिन्हें आज हिन्दू लोक देवता गोगा जी के रूप में तथा धर्म परिवर्तीत कर चुके चौहान मुसलमान गोगा पीर के रूप में पूजते हैं। 

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 गोगाजी, जाहिर वीर, गुग्गा वीर, जाहर पीर, मण्डलिक आदि नामों से जाने जाते थे 

वीर गोगाजी का जन्म राजस्थान के चुरू जिले में विक्रम संवत् सन 1003 में ददरेवा नामक ग्राम में हुआ था। गोगाजी के पिता का नाम जेवरसिंह था और माता का नाम बाछल देवी था। गोगाजी के जन्म को लेकर ऐसा माना जाता है कि वीर गोगाजी का जन्म गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुआ था। लोकमान्यताओं के आधार पर वीर गोगाजी को साँपो के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। उन्हें लोग गोगाजी, जाहिर वीर, गुग्गा वीर, जाहर पीर, मण्डलिक आदि नामों से पुकारते है। 

गोगाजी का जन्म हिंदी कैलेंडर विक्रम संवत के अनुसार 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गाँव में हुआ था। इनकी पूजा हिन्दू और मुस्लिम यहाँ तक की सिख धर्म के लोग भी करते हैं। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर को बहुत प्रसिद्धि मिली। गोगाजी वीर के राज्य का विस्तार सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था।

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  • राजस्थान और हरियाणा के हर गांव में है इनकी मंदिर 

हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदाय बड़ी श्रद्धा भक्ति से इस जाहर वीर की  पूजा करते हैं। हिन्दू लोक देवता गोगा जी हनुमान गढ़ के चौहान शासक गोगा बाबा के रूप में जाने जाते हैं। राजस्थान और हरियाणा  में शायद ही ऐसा कोई गांव होगा जहां गुगा जी का कोई मंदिर ना हो। हर साल सावन के वक्त यहां मेले लगते हैं, लंगर होते हैं और दंगल भी कराए जाते हैं। गोगा जी में लोगों की बहुत ज्यादा आस्था है। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगाजी की समाधि तथा गोगा पीर व जाहिर वीर के जयकारों के साथ  गुरु गोरखनाथ के प्रति भक्ति की धारा बहती है। भक्तजन गुरु गोरक्षनाथ के टीले पर शीश झुका कर गोगाजी जाहरवीर की समाधि पर ढोक देते हैं। प्रतिवर्ष लाखों लोग गोगा जी के मंदिर में मत्था टेक्ने आते है। यहाँ गोगा जी का एक छड़ी है जिस छड़ी का बहुत महत्त्व होता है और जो साधक छड़ी की साधना नहीं करता उसकी साधना अधूरी ही मानी जाती है क्योंकि जाहरवीर जी छड़ी में निवास करते है। जाहर पीर जी से कोई सच्चे दिल से वरदान मांगे, तो उसी वक्त मुराद पूरी हो जाती है। ऐसे करोड़ों अनुभव लोगों ने किये हैं जहां उन्हें  गोगा जी से मांगने पर सब मिल गया।

गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुआ था जन्म 

गोगाजी महराज के अगर जन्म को देखे, तो इनका भी जन्म एक दैवीय जन्म की तरह हुआ था। गोगाजी के माता पिता निःसंतान थे और उन्हें संतान प्राप्ति के सभी कोशिश करने के बाद भी संतान नहीं हुई थी, ऐसे में वे बहुत ही दुःखी थे तब उन्हें पता चला की भगवान गुरु गोरखनाथ निःसंतान स्त्रियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं जिससे निःसंतान स्त्रियों को संतान प्राप्ति होती है। यही जानकर राजा जेवरसिंह और रानी बाछल देवी संतान प्राप्ति के लिए भगवान गुरु गोरखनाथ जी के शरण में गए। उस समय गुरु गोरखनाथ जी ‘गोगामेड़ी’ के एक टीले पर तपस्या कर रहे थे। तभी से वो उनकी भक्ति और सेवा करने लगी थी। बाछल देवी की सेवा से प्रसन्न होकर  गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया तथा साथ ही उन्हें गुगल नामक एक फल प्रसाद के रूप में खाने के लिए दिया। वह प्रसाद खाकर गोगाजी की माता, रानी बाछल देवी गर्भवती हो गई जिनकी कोख से “वीर गोगाजी” का जन्म हुआ था। गुरु गोरखनाथ जी के नाम के पहले अक्षर से ही गोगाजी का नाम रखा गया।  गोरख का गो और पराक्रमी गऊ रक्षक होने के कारण गाय का गा जिस कारण वो  गोगा जी कहे जाने लगा। उन्होंने तंत्र की शिक्षा गूरू गोरखनाथ से प्राप्त की तथा राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर प्राप्त राजा बने। 

  • योद्धा के साथ-साथ थे बहुत बड़े तांत्रिक 

दूसरी तरफ गोगाजी के शादी का किस्सा भी बहुत दिलचस्प है। जाहरवीर गोगाजी का विवाह कोलूमण्ड की राजकुमारी से तय हुआ था. उनकी पत्नी का नाम रानी केलमदे था. रानी केलमदे पाबूजी के बड़े भाई बुडौजी की पुत्री थी. गोगाजी वीर के शादी के बारे में कहा जाता है कि विवाह के समय उनकी मंगेतर को सर्प ने काट लिया था। इससे क्रोधित होकर गोगाजी ने आग पर कढ़ाई में तेल डालकर मंत्रों का उच्चारण शुरू कर दिया। जिससे संसार के सभी सर्प आकर गर्म कढ़ाई में गिरने लगे। तब सांपो के राजा रक्षक तक्षक नाग ने गोगा जी से माफी माँगी और केमल दे का जहर चूस कर वापिस जिवित किया। साथ ही सर्पो के देवता के रूप में पूज्य होने का आर्शिवाद भी दिया। तभी से इन्हे नागो का देवता भी कहा जाने लगा। 

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गौ रक्षा में दे दी थी अपनी प्राण 
गोगाजी जैसे पराक्रमी वीर की मौत भी एक महान योद्धा की तरह ही हुई। गोगा जी जितना अपने अंदर योगी थे उतने ही बड़े योद्धा वो बाहर से थे। गोगा जी चौहान की मृत्यु महमूद गजनवी के साथ युद्ध करते समय हुई थी।कहानी कुछ ऐसे है की गोगा जी और उनके चचेरे भाई अर्जन सुर्जन के बिच मध्य राज्य को लेकर विवाद था। इस विवाद के चलते एक बार अर्जुन और सुर्जन गोगा जी के राज्य की सारी गायों को हाँक कर ले गए थे। उस समय गजनवी ददरेवा के पास ही था। अर्जुन और सुर्जन उन गायो को ले जाकर महमूद गजनवी के शिविर में छोड़ आए। गोगा जी इस बात से बहुत नराज हुए। अपने राज्यों की गायों की  रक्षा के लिए गोगा जी ने महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया। गौरक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान देने वाले वो इतने बड़े योद्धा थे की गौरक्षा में उन्होंने युद्ध भूमि पर अपने प्राण गँवा दिए। गोगा जी गाँयों को बचाने अपने 47 पुत्रों और 60 भतीजों के साथ ‘चिनाब नदी’ को पार कर के गजनवी से युद्ध करने पहुंचे और यहां तक की गायों को मुक्त भी करवाया। कहते है महमूद गजनवी के साथ नौ बार युद्ध हुआ था। आठ युद्ध में गोगाजी को विजय हासिल हुआ था जबकि नौवें युद्ध में गोगा जी वीरगति को प्राप्त हो गए थे। नौवें युद्ध में गोगाजी महाराज महमूद गजनवी के साथ सतलज के मार्ग की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे। इसी युद्ध में गोगाजी के बेटे भी शहीद हुए थे। युद्ध करते समय गोगाजी का सर ददरेवा (चुरू) में गिरा था इसलिए इन्हें शीर्षमेडी (शीषमेडी) के नाम से जाना जाता हैं तथा गोगाजी का धड़ नोहर (हनुमानगढ़) में गिरा था इसलिए इन्हें धरमेडी, धुरमेडी तथा गोगामेडी के नाम से जाना जाता हैं। गोगाजी का तेज़ और पराक्रम देख कर महमूद गजनवी ने खुद गोगाजी को जाहिर पीर (प्रत्यक्ष पीर) की उपाधि दी थी। 

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