बड़ौदा राज्य के वो महाराजा जिसने कोलंबिया में उच्च शिक्षा लेने में की डॉ. अंबेडकर की मदद …

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 25 मार्च 2023, 05:30 AM Updated: 25 मार्च 2023, 05:30 AM
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युवा भीमराव अंबेडकर को विदेश में उच्च शिक्षा के लिए जाना था लेकिन उस वक्त में आर्थिक संकट एक बड़ी समस्या थी.  वो अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कोलंबिया यूनिवर्सिटी से करना चाहते थे. और तब उनकी मदद किसी रजा ने नहीं बल्कि एक महाराजा ने की. आखिर कौन थे वो रजा और कसी राज्य के शासक थे ? ये शायद ही किसी को पता होगा. आज हम आपको बताते हैं उस महाराजा के बारे में, जिसने युवा अम्बेडकर की शिक्षा में इतना बड़ा योगदान दिया? और ये मदद उन्हें एक, दो साल नहीं बल्कि लगातार तीन साल तक दी गयी यानि की ग्रेजुएशन कम्पलीट होने तक . पढाई पूरी करने के बाद जब अंबेडकर वहां से लौटे तो महाराजा से मिले. इसके बाद लंबे समय तक वो उनसे जुड़े रहे. वैसे ये तो तय है कि अगर महाराजा सायाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने उनकी मदद नहीं की होती तो शायद अंबेडकर के लिए वहां तक पहुंचना मुश्किल होता, जहां पर वो थे. इन महाराजा का नाम तो हम आपको बता चुके हैं  वो उस समय भारत के सबसे अमीर राज्यों में एक बडौदा के शासक थे. उन्होंने अपने शासन के दौरान सामाजिक सुधार से लेकर जात-पांत खत्म करने और शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े काम किए.

महाराजा के मदद से हुआ अम्बेडकर का काम आसान

ये बात साल 1913 की है जब भीम राव ने अपनी कोलम्बिया की पढाई के लिए बड़ौदा के महाराजा के यहाँ आर्तिक मदद के लिए आवेदन किया था. और जब ये आवेदन महाराजा के पास पहुंचा तो महाराजा ने इसे बिना हिचकिचाए  मंजूर कर दिया  जिसके जरिए अब अम्बेडकर को अपनी पढाई के लिए सालाना स्कोलेर्शिप मिलने लगी. जिसकी बदौलत  आंबेडकर का विदेश जाकर हायर एजुकेशन करने का सफ़र आसान हो गया. उस समय ये सालाना स्कालरशिप करीब 11.50 पौंड की थी जो की तीन साल तक डॉ भीमराव आंबेडकर को दी जाती थी. कोम्ल्बिया से लौटने वो सबसे पहले आकर राजा से मिले .

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नामवर हस्तियों को मिलता था संरक्षण 

महाराजा गायकवाड़ अपने राज्य में शिक्षा, कला, नृत्य आदि क्षेत्रों से जुड़ी बड़ी हस्तियों के संरक्षण के काम में भी हमेशा आगे रहते थे. उन दिनों कई ऐसी हस्तियां थीं, जिन्हें बड़ौदा के महाराजा सायाजीराव ने फाइनेंसियल सपोर्ट  दी. उसमें ज्योतिबा फुले, दादाभाई नौरोजी, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविंद जैसे बड़ी बड़ी हस्तियां शामिल थी. 

वापस लौटने के बाद बने विधानसभा के सदस्य भी बने

कोलंबिया से पढाई पूरी करके जब आंबेडकर वापस भारत लौटे तो रजा सयाजीराव ने उन्हें जब अंबेडकर लौटे तो महाराजा ने उन्हे राज्य की लेजिस्लेटिव असेंबली का सदस्य बनाया. और एक खास कानून बनाया गया ताकि राज्य में अनुसूचित जाति के लोग भी चुनाव लड़ सकें. बडौदा में जिस तरह पिछड़े वर्ग, महिलाओं के साथ आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों के लिए तमाम योजनाएं चलाई जा रही थीं, उसका असर अंबेडकर पर भी पड़ा, जिसका असर हमे उनके संविधान निर्माण में एकदम साफ़ दीखता है. 

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महाराजा से थे अच्छे संबंध

महाराजा सायाजीराव 1939 में जब तक जिंदा रहे, तब तक उनके डॉक्टर भीमराव अंबेडकर से अच्छे संबंध बने रहे. आपको बता दें कि महाराजा को सायाजीराव को उन दिनों भारतीय रियासतों के शासकों के बीच सबसे बड़ा समाज सुधारक और प्रगतिवादी राजा माना जाता था. और माना भी क्यों नहीं जाता अगर कोई रजा या कोई आम इंसान किसी समाज की अच्छाई के लिए काम करता हो उनकी जरूरतों को समझता हो उनके सम्मान को समझता हो और उनकी हर तरह से मदद करता हो तो बेशक उसे एक प्रगतिशील राजा कहने  में कोई बुराई भी नहीं है और उन दिनों शायद ही कोई राज्य वंचित वर्ग और पिछड़ों की उस तरह मदद के लिए आगे आता था, जिस तरह सायाजीराव करते थे.

पुस्तकालय आंदोलन के जनक तो लड़कियों की शिक्षा के पैरोकार

महाराजा सायाजीराव को भारत में पुस्तकालय आंदोलन का जनक माना जाता है तो वहीँ वो महिलाओं के शिक्षा को लेकर भी कभी पीछे नहीं रहे और उनके लिए हर मोड़ पर जोरो शोरों से काम किया. बड़ौदा राज्य में उन्होंने 1875 से लेकर 1939 तक शासक किया और शासन की बागडोर संभालते ही लड़कियों की शिक्षा के लिए कई स्कूल खोले और प्राइमरी शिक्षा मुफ्त करने के साथ अनिवार्य कर दी.

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बैंक ऑफ़ बड़ौदा की स्थापना 

सयाजीराव ही वो रजा थे जिन्होंने बैंक ऑफ बडौदा की स्थापना की, जो इस समय देश के प्रमुख बैंकों में एक है. तब बडौदा में विधवाओं के पुर्नविवाह का काम शुरू हुआ और दलितों के मंदिर में प्रवेश के लिए उसके दरवाजे खोले गए. महाराजा सायाजीराव को लोग दूरदर्शी और विद्वान राजा के साथ कुशल प्रशासन भी मानते थे.

क्रांतिकारियों से थी सहानुभूति

उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि उनकी सहानुभूति आजादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों के साथ थी. इससे अंग्रेज कुपित भी रहते थे. जब 1911 में किंग जार्ज दिल्ली आए और वहां उनका दरबार सजा, तब महाराजा सायाजीराव साधारण तरीके से गए और शिष्टाचार के खिलाफ होने के बाद भी किंग को पीठ दिखाई, जिस पर ब्रिटेन के मीडिया में बड़ा हो-हल्ला भी मचा. बाद उन्होंने गांधीजी और कांग्रेस की भी मदद की.

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