BRICS summit 2026: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शिरकत करने के लिए करीब 7 साल बाद भारत की जमीन पर पहुंचे हैं। दोनों देशों के बीच बीते कुछ सालों में बने कूटनीतिक तनाव के बाद उनके इस दौरे को बेहद अहम माना जा रहा है। दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर जब शी जिनपिंग का विमान उतरा, तो उनके स्वागत के लिए वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद मौजूद थे।
लेकिन जैसे ही तस्वीरें सामने आईं, सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों में एक सवाल तेजी से तैरने लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद चीनी राष्ट्रपति का स्वागत करने एयरपोर्ट क्यों नहीं गए? क्या यह किसी तरह का कूटनीतिक संदेश था या इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय नियमों और प्रोटोकॉल का कोई तय दायरा काम कर रहा था?
द्विपक्षीय और बहुपक्षीय दौरों का बुनियादी फर्क| BRICS summit 2026
इस पूरे मामले को समझने के लिए सबसे पहले द्विपक्षीय (Bilateral) और बहुपक्षीय (Multilateral) दौरों के बीच के अंतर को समझना जरूरी है। जब कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष केवल भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत या विशेष राजकीय दौरे (State Visit) पर आता है, तब कूटनीतिक गर्मजोशी दिखाते हुए प्रधानमंत्री खुद एयरपोर्ट जाकर उनकी अगवानी कर सकते हैं। अतीत में कई खास मौकों पर ऐसा देखा भी गया है।
लेकिन ब्रिक्स जैसा आयोजन एक बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय मंच है। यहां भारत किसी एक देश की नहीं, बल्कि दुनिया के कई प्रभावशाली मुल्कों के नेताओं की एक साथ मेजबानी कर रहा होता है। ऐसे सम्मेलनों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से लेकर ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और पार्टनर देशों के प्रमुख बहुत कम समय के अंतराल पर राजधानी पहुंचते हैं।
संप्रभु समानता का सिद्धांत: किसी को खास तवज्जो नहीं
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सबसे बड़ी बुनियाद ‘संप्रभु समानता’ (Sovereign Equality) के सिद्धांत पर टिकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी बहुपक्षीय मंच पर शामिल होने आए सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों का दर्जा कूटनीतिक नजरिए से बिल्कुल बराबर होता है।
अगर प्रधानमंत्री मोदी खुद शी जिनपिंग या किसी अन्य खास नेता की अगवानी करने एयरपोर्ट पहुंच जाते, तो इसका कूटनीतिक मतलब यह निकाला जाता कि भारत उस विशेष देश को बाकी मेहमानों से ज्यादा तरजीह दे रहा है। कूटनीतिक शिष्टाचार के तहत फिर बाकी सभी देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ भी वैसा ही करना जरूरी हो जाता। व्यस्त शेड्यूल और एक के बाद एक लगातार उतरते विदेशी विमानों के बीच प्रधानमंत्री का हर नेता के लिए खुद एयरपोर्ट जाना न तो व्यावहारिक है और न ही प्रोटोकॉल के तहत उचित माना जाता है।
क्या है ‘मिनिस्टर-इन-वेटिंग’ की व्यवस्था?
ऐसे विशाल आयोजनों के लिए स्वागत का पूरा खाका पहले ही तैयार कर लिया जाता है। प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत रूप से जाने के बजाय हर विदेशी मेहमान के स्वागत की जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्रियों या राज्य मंत्रियों को सौंपी जाती है।
इन्हें कूटनीतिक भाषा में प्रोटोकॉल प्रतिनिधि या ‘मिनिस्टर-इन-वेटिंग’ कहा जाता है। यह परंपरा हर मेहमान देश को पूरा सम्मान देते हुए कूटनीतिक संतुलन बनाए रखती है। ब्रिक्स सम्मेलन में भी ठीक यही व्यवस्था लागू की गई। जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिल्ली पहुंचे, तो उनकी अगवानी विदेश राज्य मंत्री ने की। इसी तय नियम के तहत चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत के लिए भी केंद्रीय राज्य मंत्री जितिन प्रसाद को तैनात किया गया। लिहाजा, इसे किसी तरह की बेरुखी के तौर पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के संतुलित और निष्पक्ष प्रोटोकॉल के रूप में देखा जाना चाहिए।













































