Bhai Jaita Ji History : ये साल था 1665 का, नवंबर महीने की कड़ाके की ठंड के बीच सैकड़ों लोग एक पालकी को लेकर चल रहे थे। इस पालकी में कोई व्यक्ति सवार नहीं था, बल्कि इस पालकी में रखा था एक सिर। जिसके सजदे में सैकड़ों सिर झुके थे। पालकी को आगे से अपने कंधे पर रखने वाले थे रंगरेटा समुदाय के एक एक महान योद्धा भाई जैता सिंह। जिन्होंने इस सिर के बदले अपने पिता के सिर का बलिदान दिया था और मुगलों की नाक के नीचे से वो इस सिर पूरे सम्मान पूर्वक आनंदपुर साहिब ले कर आए थे। ये सिर था सिख धर्म के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर जी का और सामने खड़े थे उनके 10 साल के बेटे गुरु गोबिंद सिंह जी। जिन्होंने भाई जैता की बहादुरी और बलिदान को देखकर जोर से कहा रंगरेटा गुरु का बेटा। भाई जैता सिंह.. जिन्हे ही मुगलो के अत्यार के बाद शहीद किये गए गुरु तेग बहादुर जी का सिर चांदनी चौक से लाने का गुरु का आदेश नमिला था। उन्हें खुद दसवें गुरु साहिब ने अमृत चखाया और खालसा में शामिल किया था। अपने इस लेख में हम भाई जैता सिंह के बारे में जानेंगे, जो बचपन से गुरु साहिब के सबसे विश्वासपात्र लड़ाकों में से एक रहे है।
जानिए कौन थे अमर योद्धा भाई जैता सिंह?
भाई जैता सिंह का दसवे गुरु से काफी लगाव था, उनकी ही तरह भाई जैता सिंह का जन्म 13 दिसंबर 1661 बिहार के पटना में सदा नंद और माता प्रेमो के घर हुआ था। ये दोनो की सिख पंथ क मानते थे, वो पटना में पले बढ़े और इस दौरान उन्होंने अलग अलग शस्त्रों को चलाना सीखा, युद्ध कलायें सीखी, साथ ही एक सच्चे सिख की ही तरह उन्होंने घुड़सवारी, तैराकी, संगीत और कीर्तन भी सीखा। जब वो छोटे थे तभी सिखों ने वापिस पंजाब की तरफ रूख किया तो उनका परिवार भी पंजाब लौट आया औऱ रामदास गांव लौट कर बाबा बुड्डा के परपोते बाबा गुरदित्ता के यहां रहने लगे। यहीं उनके समर्पण को देखर बाबा गुरदित्ता ने उन्हें सिख धर्म के लिए वो तलवार बनाने का फैसला किया। वो उन्हें प्रशिक्षण देते थे। इस दौरान जब वो 14 साल के हुए तो रामदास गांव में बाबा गुरदित्ता जी के पास बेहद दुखद खबर आई कि मुगल शासक औरंगजेब ने नौवे गुरु तेग बहादुर साहिब को तमाम यातनाये देकर सिर कलम करवा दिया.. वहीं भाई लक्खी शाह बंजारा ने उनके शरीर को किसी तरह से पाया था और उनकी अंतिम संस्कार कर दिया, जहां आज रकाब गंज साहिब गुरुद्वारा मौजूद है।
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एक सिर के बदले पिता का बलिदान
वहीं उनकी सिर अब भी मुगलो के पास ही है। भाई जैता सिंह इस खबर सुन कर गरजते हुए आंनदपुर साहिब पहुंचे.. जहां उन्होंने 10 साल के गुर गोबिंग सिंह से आज्ञा लेने गए कि वो खुद गुरु साहिब का सिर लेकर आयेंगे.. जब ये सब चर्चा चल ही रही थी तो उनके पिता ने आगे आकर सलाह दी कि गुरु साहिब के बदले उनका सिर काट दो और गुरु साहिब के सिर के स्थान पर रख दो.. ताकि मुगलो का भ्रम बना रहे। भाई जैता दिल्ली पहुंचे और अपने पिता का सिर उनके हाथ में था। ये दृष्य किसी का भी सीना छलनी कर जाता लेकिन भाई जैता का लक्ष्य अडिग था। वो तमाम मुश्किलों को पार करते हुए चांदनी चौक के उस हिस्से में पहुंचे जहां गुरु साहिब का सिर अब भी वहीं था। भाई जैता ने मौका पाकर अपने पिता का सिर उनके स्थान पर रखा औक गुरु साहिब का सिर लेकर वहां से निकल गये। पिता को खो देने के दर्द से ज्यादा गुर साहिब की शहादत का फर्क भाई जैता की आंखो में था। एक 14 15 साल के लड़के ने वो कर दिखाया था, जो बड़े बड़े योद्धा नहीं कर सकते थे। पालकी में गुरु साहिब का सिर आनंदपुर लाया गया, पूरे सम्मान के साथ सिखों ने उन्हें अंतिम विदाई दी और गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु साहिब के सिर का अंतिम संस्कार। भाई जैता गुरु साहिब के सबसे प्यारे हो गए .. और उनके साथ रह कर उनकी सेवा में लगे रहते थे।
गुरुद्वारा शहीद बुर्ज साहिब
1699 में जब गुरु साहिब ने बैशाखी के दिन खालसा की स्थापना की थी तब उन्होंने बाई जैता को भी अमृख चखाया था,, और उन्हें नाम दिया भाई जीवन सिंह। वो गुरु साहिब के बच्चों से बेहद लगाव रखते थे..और उनका ख्याल रखते थे। लेकिन 1904 में चमकौर के युद्ध के दौरान वो मुगलो से ल़ड़ते हुए शरीह हो गए थे। भाई जीवन सिंह द्वारा लिखित महान ग्रन्थ श्री गुर कथा में गुरु गोविन्द सिंह के दुखों के बारे में विस्तार से लिखा है। चमकौर के गुरुद्वारा शहीद बुर्ज साहिब में उनकी समाधि बनी हुई है। जहां हर साल गुरुद्वारे में मत्था टेकने वाले सिख संगत भाई जैता की समाधी पर भी अपना मत्था जरूर टेकते है। गुरु साहिब के सबसे विश्वासपात्रों में से एक भाई जत्था ने अंतिम दम तक सिक्खी की रक्षा की… आपको ये विडियो कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।
































