Bibi Balbir Kaur Story: वो मात्र 22 साल की थी, और उसकी गोद में 2 साल का मासूम बच्चा, जो जिंदगी से भरा हुआ था। जिस उम्र में आँखों में आने वाले खुशहाल जीवन का सपना सजा होना चाहिए था उस उम्र में गुरु की सच्ची बेटी ने सिख भाइयों की सेवा करते हुए मौत को गले लगा लिया। वो चलती रही, अंतिम साँस तक, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं हुई। अपनी ही गोद में अपने बेटे को दम तोड़ते देख कर भी वो टूटी नहीं। ऐसी थी वीरांगना शहीद बीबी बलबीर कौर जी। अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे उस घटना की, जिसने न केवल सिख गुरुद्वारों से महंतो और पुजारियों के वर्चस्व को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई बल्कि खुद ब्रिटिश सरकार ने गुरुद्वारों और सिख धरोहरों की जिम्मेदारी सिखो को दी थी। कौन थी वीरांगना शहीद बीबी बलबीर कौर जी। जिनकी शहादत ने सिखो के आंदोलन में जान फूंक दी।
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जानिए शहीद बीबी बलबीर कौर जी के सर्वोच्च बलिदान
साल 1925 से पहले ब्रिटिश हुकूमत के अधीन जितने भी सिख गुरुद्वारे या उनकी विरासतें थी, उनपर अंग्रेजों ने धोखेबाज निर्मल और उदासी महंतों के संरक्षण में दे दिया था। अंग्रेज जानते थे कि गुरुद्वारे सिखो को एकजुट कर सकते है, उनकी स्वतंत्रता संग्राम की भावना और अंग्रेजी हुकूमत के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी देखते हुए जानबूझ कर सिखो से जुड़े धार्मिक स्थलों का महंतो को दे दिया गया। मगर कहते है न कि बंदर के हाथ में नारियल देंगे तो वो तबाह ही होगा। कुछ ऐसा ही गुरुद्वारों के साथ भी हुआ। महंतो ने गुरुद्वारे को मांस, मदिरा का उपभोग करने और नाचती वेश्याओं का अड्डा बना दिया। ये वो कर्म थे जो सिख गुरुओं के मुताबित सच्चे सिख के लिए पूरी तरह से निषेध थे। महंतो के इस अधर्म ने सिखो में बेहद गुस्सा भर दिया। वो अपने धार्मिक स्थलों को वापिस पाने के लिए उबल उठे, और फिर शुरू हुआ सिखो का वो संग्राम, जो महंतो को गुरुद्वारों से हटा कर ही खत्म हुआ। लेकिन उसके लिए कई सिखों ने अपनी शहादत दी, जिसमें 22 साल की शहीद बीबी बलबीर कौर भी थी।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति
जब अंग्रेजो ने 1849 में पंजाब पर कब्जा किया था, तो उनका पहला मकसद था कि वो सिखों को उनके सिक्खी से दूर करें, उसके लिए ईसाई मिशनरी, हिंदू सुधार आंदोलनों और मुसलमानों के धर्म परिवर्तन जैसे गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया.. जिसके कारण सिख अपनी मूल पहचान औऱ संस्कृति, परंपरा से दूर होने लगे थे। सिखों को अपने धर्म में बने रखने और सच्चे का अर्थ समझाने के लिए 1870 में सिंह सभा आंदोलन शुरु किया गया। आंदोलन का मेन मकसद था सिख धर्म में सुधार करना और अन्य धर्मों में परिवर्तित हो चुके धर्मत्यागियों को सिख धर्म में वापस लाना था। इस आंदोलन के कारण सिखों की आबादी लगभग दोगुनी हो गई, लेकिन अब भी उनकी धरोहर अंग्रेजी हुकुमत के अधीन मंहतो के पास थी। जिसे देखते हुए 15 नवंबर 1920 को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का गठन किया गया। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने सिख धार्मिक स्थलों के सुधार के आंदोलन को एक केंद्र बिंदु की तरह देखा।
अकाली आंदोलन का समर्थन
जिसने गुरुद्वारो पर अधिकार करना शुरु कर दिया था.. जिसका महंतो ने कड़ा विरोध किया और ब्रिटिश हुकुमत भी सिखों के फेवर में नहीं थे। नतीजा ये हुआ कि नाभा राज्य, जहां राजा रिपुदमन का शासन था, वो एक गुरसिख थे.. जिन्होंने अकाली आंदोलन का समर्थन किया था.. और अंग्रेजी हुकुमत और मंहतो को हटाने के लिए वो लोग विरोध के तौर नाभा राज्य में सिख भाई काली पगड़ी पहनने लगे। उस वक्त केवल नाबा राज्य में ही ऐसा करने की इजाजत थी.. लेकिन अंग्रेजो को लगा कि सिख विद्रोह कर सकते है.. इसलिए वो लोग राजा रिपुदमन को गिरफ्तार कर दिल्ली ले गए,.. ये अकालियों को भड़काने में पेट्रोल का काम कर गया.. राजा के निष्कासण के विरोध में जगह जगह गुरू ग्रंथ साहिब जी का अखंड पाठ शुरु कर दिया गया।
लेकिन अंग्रेजो ने पाठ पूरा होने ही नहीं दिया.. जिसे गुरु और सिख धर्म का अपमान माना गया। सिखों ने अंग्रेजो की इस हरकत को खालसा पंथ की स्वतंत्रता और सम्मान पर हमला माना.. सिखों ने बाधित हुए अखंड पाठ को पूरा करने के लिए साल 1924 में फिर से एक अहिंसक आंदोलन की शुरुआत की.. खालसा ने तय किया कि वो 101 श्री अखंड पाठ पूरा करेंगे.. और अमृतसर श्री अकाल तख्त से हजारों सिखों ने आशिर्वाद लेकर पाठ को पूरा करने के लिए प्राणो का बाजी लगाने का संकल्प लिया। वहीं करीब 500 सिखों ने जैतो का रूख किया। इस जत्थे को शहीद जत्था कहा गया.. इसी जत्थे में थी बीबी बलबीर कौर जी.. जिन्होंने इच्छा जाहिर की कि वो भी जैतो जाना चाहती है औऱ सिख भाईयो की सेवा करना चाहती है।
अंग्रेजो ने ये आदेश जारी किया था कि जो बी शहीद जत्थे को खाने पीने की चीजे देगा वो उनका दुश्मन होगा, लेकिन उनती चेतावनी से सिख शेरों औऱ शेरनियों को कोई पर्क नहीं पड़ा.. वो अपनी सेवा देते रहे.. बीबी बलबीर कौर 22 साल की थी .. और उनकी गोद में 2 साल का बेटा था। जत्थेदार ने उन्हें कई बार मना किया और लौट जाने को कहा लेकिन गुरुसेवा के नाम अपनी जिंदगी कर चुकी बीबी बलबीर कहां मानने वाली थी.. वो भी आगे बढ़ने लगी।
बेटे के साथ शहीद हुई
शहीद जत्था जैतो पहुंचा.. वहां अंग्रेजी हुकुमत के सिपाही पहले से ही बंदूक थामे एक उंचे टीले पर खड़े थे। जत्थेदार ने शहीद जत्थे से कहा कि जिनके पास अकाल तख्त का आदेश है वहीं आगे चले, बाकि लौट जाये, और आने वाले समय में अपनी बारी का इंतजार करें.. ज्यादातर लौट गए, लेकिन बीब बलबीर ने कहा कि उन्हें साथ जाना है.. और वो चल पड़ी.. अंग्रेजो ने गोलियों की बौछारे शुरु कर दी.. लाशे बिछनी लगी.. और एक गोली बीबी बलबीर के सिर पर लगी, दूसरी गोली उनसे बेटे के सिर को चीरते हुए सीने में लगी.. बीबी बलबीर ने गर्व से बेटे को देखा और उन्हें शहीदों के बगल में रख कर कहा वाहेगुरु अपने इस उपहार का ध्यान रखना.. और वो आगे निकल गई.. तभी एक गोली उनके सीने में लगी.. और वो वाहेगुरु बोलते हुए जमीन पर गिर पड़ी.. एक 22 साल की विरांगना.. जिस उम्र में लाखों सपने सजाये जाते है उस विरांगना ने गुरुसेवा करते हुए शहीद होना चुना।
इस घटना ने सिखो के इरादों को और मजबूत कर दिया.. जिसका नतीजा ये हुआ कि 1925 में सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 पारित किया गया.. जिसके बाद गुरुद्वारों और सिख धरोहरों का अधिकार सिखो को मिला था। ये सिखो की सबसे बड़ी जीत में से एक मानी जाती है और बीबी बलबीर कौर जी तो सिखों ने शहीद का दर्ज दिया.. आज भी उनका नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है। सिख पुरुषो ने ही नहीं बल्कि सिख विरांगनाओं ने भी समय समय पर अपनी बहादुरी दिखा कर बता दिया है कि क्यों दसवें पातशान ने उन्हें शेरनियां कहा है।

































