अब जेल में नहीं कटेगी पूरी उम्र? सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग और बीमार कैदियों की रिहाई पर दिया बड़ा आदेश| Supreme Court Order

Nandani | Nedrick News Ghaziabad Published: 18 जुलाई 2026, 03:43 AM Updated: 18 जुलाई 2026, 03:43 AM
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Supreme Court Order: देश की जेलों में बंद बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार और अशक्त कैदियों को राहत देने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर ऐसी श्रेणी के कैदियों की समय से पहले रिहाई (Premature Release) के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नीति तैयार कर उसे अधिसूचित करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया तकनीक आधारित और समयबद्ध होनी चाहिए, ताकि किसी भी पात्र कैदी के साथ अनावश्यक देरी या भेदभाव न हो।

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NALSA की याचिका पर सुनाया अहम आदेश| Supreme Court Order

यह निर्देश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए गए। याचिका में मांग की गई थी कि देशभर में 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार, अशक्त और असहाय कैदियों की मानवीय आधार पर समय से पहले रिहाई के लिए पूरे देश में एक समान दिशा-निर्देश बनाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में स्पष्ट नीति और एक जैसी प्रक्रिया होना जरूरी है, ताकि सभी राज्यों में समान मानकों के आधार पर निर्णय लिए जा सकें।

e-Prisons पोर्टल से होगी पूरी प्रक्रिया

अदालत ने इस पूरी व्यवस्था को डिजिटल बनाने पर भी जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि समयपूर्व रिहाई से जुड़े सभी आवेदन e-Prisons पोर्टल के माध्यम से ही किए जाएं। कोर्ट के अनुसार, आवेदन दाखिल होने से लेकर अंतिम फैसले तक की पूरी प्रक्रिया पोर्टल पर डिजिटल रूप से दर्ज होनी चाहिए। इससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी और किसी भी स्तर पर होने वाली देरी या अस्पष्टता को कम किया जा सकेगा।

पोर्टल पर दर्ज होगी हर जानकारी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि e-Prisons पोर्टल पर केवल आवेदन ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। इसमें शामिल होंगे—

  • कैदी द्वारा दाखिल किया गया आवेदन
  • मेडिकल जांच की रिपोर्ट
  • जेल प्रशासन की रिपोर्ट
  • मेडिकल बोर्ड की सिफारिश
  • अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी (UTRC) की राय
  • सक्षम प्राधिकारी का अंतिम निर्णय
  • निर्णय के पीछे दर्ज कारण

अदालत का मानना है कि पूरी प्रक्रिया डिजिटल रिकॉर्ड में रहने से जवाबदेही बढ़ेगी और जरूरत पड़ने पर इसकी समीक्षा भी आसानी से की जा सकेगी।

3 महीने में नीति, 6 महीने में देनी होगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर नई नीति तैयार कर अधिसूचित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) भी दाखिल करना होगा। इस रिपोर्ट में सरकारों को बताना होगा कि—

  • अदालत के निर्देशों के पालन के लिए क्या कदम उठाए गए।
  • नई नीति तैयार करने की क्या स्थिति है।
  • समयपूर्व रिहाई के लिए कितने पात्र कैदियों की पहचान की गई।
  • डिजिटल व्यवस्था लागू करने में कितनी प्रगति हुई।

मानवीय आधार पर लिया गया महत्वपूर्ण फैसला

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन कैदियों के लिए राहत का रास्ता खोल सकता है, जो अधिक उम्र, गंभीर बीमारी, शारीरिक अक्षमता या बेहद खराब स्वास्थ्य के कारण जेल में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी ऐसे कैदियों को स्वतः रिहा कर दिया जाएगा। प्रत्येक मामले की जांच तय मानकों और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का उद्देश्य पूरे देश में समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया को एक समान, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाना है, ताकि पात्र कैदियों के मामलों में अनावश्यक देरी न हो और मानवीय आधार पर लिए जाने वाले फैसलों में स्पष्टता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

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Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

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