Uttarakhand Land Scam: उत्तराखंड की नौकरशाही में इन दिनों एक भूमि खरीद मामला चर्चा के केंद्र में है। हरिद्वार नगर निगम की ओर से की गई जमीन खरीद को लेकर सामने आए आरोपों ने प्रशासनिक व्यवस्था के कई स्तरों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला इतना गंभीर माना गया कि जांच रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने एक आईएएस अधिकारी की सेवा समाप्ति की संस्तुति कर दी, जबकि दो अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई का फैसला लिया गया है। इसके अलावा कई अधिकारियों और कर्मचारियों पर निलंबन, मुकदमे और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
आखिर क्या है पूरा मामला? Uttarakhand Land Scam
विवाद की शुरुआत अप्रैल 2025 में हुई, जब हरिद्वार नगर निगम द्वारा एक भूमि खरीद का मामला सामने आया। आरोप लगा कि जिस जमीन की कीमत करीब 14 करोड़ रुपये बताई जा रही थी, उसे लगभग 54 करोड़ रुपये में खरीद लिया गया। कीमत में इस बड़े अंतर ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी। सवाल उठने लगे कि आखिर इतनी बड़ी रकम खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या जमीन की वास्तविक आवश्यकता थी? क्या खरीद प्रक्रिया नियमों के मुताबिक पूरी की गई थी? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की जांच के आदेश दिए।
100 पन्नों की रिपोर्ट ने खोले कई राज
सरकार ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी शासन में सचिव रणवीर चौहान को सौंपी। जांच के दौरान भूमि खरीद से जुड़ी फाइलों, दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों के बयानों की विस्तार से समीक्षा की गई। लंबी पड़ताल के बाद करीब 100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई। बताया जा रहा है कि रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने भूमि खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत किया। इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई का फैसला लिया।
जांच में क्या-क्या सामने आया?
जांच रिपोर्ट के अनुसार, जमीन के मूल्यांकन की प्रक्रिया कृषि भूमि की दरों के आधार पर शुरू हुई थी, लेकिन अंतिम खरीद वाणिज्यिक दरों पर की गई। जांच अधिकारियों को यह सबसे संदिग्ध पहलुओं में से एक लगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इतनी बड़ी भूमि खरीद के लिए आवश्यक लैंड कमेटी का गठन नहीं किया गया। सामान्य तौर पर ऐसी खरीद प्रक्रिया में कई स्तरों पर जांच, परीक्षण और अनुमोदन की जरूरत होती है, लेकिन इस मामले में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को या तो नजरअंदाज किया गया या फिर बेहद तेजी से पूरा किया गया।
जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि भू-उपयोग परिवर्तन से जुड़ी धारा-143 की प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज गति से पूरी की गई। जहां सामान्य परिस्थितियों में इस प्रक्रिया में पर्याप्त समय लगता है, वहीं यहां इसे महज दो से तीन दिनों के भीतर पूरा कर दिया गया। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि तत्कालीन एसडीएम स्तर पर राजस्व संबंधी अभिमत तैयार करने का काम स्टेनो से करवाया गया। यदि यह तथ्य अंतिम रूप से प्रमाणित होता है तो इसे प्रशासनिक नियमों की गंभीर अनदेखी माना जा सकता है।
जमीन के चयन पर भी उठे सवाल
विवाद केवल कीमत तक सीमित नहीं है। जांच रिपोर्ट में भूमि चयन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खरीदी गई जमीन कूड़े के ढेर के पास स्थित थी और उसकी तत्काल आवश्यकता भी स्पष्ट नहीं थी। ऐसे में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर उसी जमीन को खरीदने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई। जांच एजेंसियां अब यह भी देख रही हैं कि क्या जमीन चुनने से पहले अन्य विकल्पों पर विचार किया गया था या नहीं।
किस-किस पर हुई कार्रवाई?
सरकार ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन नगर आयुक्त और आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी के खिलाफ सेवा से बर्खास्त करने की संस्तुति की है। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ मेजर पनिशमेंट की कार्रवाई का फैसला लिया गया है। इसके अलावा तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह के खिलाफ परनिंदा प्रविष्टि दर्ज करने और उनकी तीन वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया गया है। साथ ही 10 अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
इससे पहले सरकार तीनों अधिकारियों को निलंबित भी कर चुकी थी। उस समय इसे उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था में एक बड़ी कार्रवाई माना गया था, लेकिन अब जांच रिपोर्ट के बाद कार्रवाई का दायरा और बढ़ गया है।
अब केंद्र सरकार की भूमिका होगी अहम
चूंकि मामला अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से जुड़ा है, इसलिए अंतिम निर्णय में केंद्र सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राज्य सरकार ने दोनों आईएएस अधिकारियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई के लिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को प्रस्ताव भेजने का फैसला किया है। केंद्रीय स्तर पर समीक्षा के बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी। प्रशासनिक हलकों में इस मामले को उत्तराखंड में हाल के वर्षों की सबसे बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है।
सरकार का क्या है संदेश?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कार्रवाई मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ घोषित ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है। सरकार का कहना है कि सरकारी धन के उपयोग में किसी भी स्तर पर लापरवाही, नियमों की अनदेखी या वित्तीय अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।






























